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सेक्स पर फिल्म बिना सेक्स दिखाए बनाना, साजिद को इस शर्त पर मिली थी Dr Arora

Dr Arora Series: सेक्स पर बनी सीरीज लेकिन सेक्स न दिखाना? यह एक डायरेक्टर के लिए कितना चैलेंजिंग हो सकता है, बता रहें खुद साजिद अली. इसके अलावा साजिद ने बातचीत के दौरान सीरीज से जुड़ी कई दिलचस्प किस्से भी शेयर किए हैं.

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डॉ अरोड़ा
डॉ अरोड़ा

पिछले दिनों रिलीज हुई सीरीज डॉ अरोड़ा की सोशल मीडिया पर जबरदस्त चर्चा है. क्रिटिक्स समेत दर्शकों की भी खूब तारीफ मिल रही है. फिल्म के डायरेक्टर साजिद अली इस फिल्म की मेकिंग का जिक्र करते हुए कहते हैं, इम्तिजाय ने उन्हें कुछ शर्तों पर फिल्म के डायरेक्शन का भार सौंपा था. 

डॉक्टर अरोड़ा के डायरेक्टर साजिद अली आजतक डॉट इन से बातचीत करते हुए बताते हैं,इसके रिप्रेजेंटेश को लेकर केवल एक ही बात जेहन में थी कि कुछ ऐसा करते हैं, जिसका सब्जेक्ट ही सेक्स है. सेक्स का एक पहलू होता है, जहां रोमांस की बात होती है, वहीं दूसरा पहलू प्रॉब्लम होता है. तो हमारा सीरीज सेक्स से जुड़े प्रॉब्लम के बारे में बात करता है. हमारा देश पॉप्युलैशन में तेजी से बढ़ता जा रहा है. जिस वॉल्यूम में जनसंख्या बढ़ती जा रही है, वहीं दूसरी ओर इससे कई प्रॉब्लम्स भी निकल कर आ रहे हैं. विडंबना यह है कि हम इन प्रॉब्लम के बारे में बात करने से हिचकते हैं. हमारे यहां सेक्स के बारे में बात करना टैबू है. कहानी का ताना-बाना 90 दशक पर रखा गया है. जरा सोचे उस दौर में अगर किसी को कुछ समस्या है, तो सोसायटी उसे लेकर क्या राय रखती होगी और कैसे जज करती होगी. 

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साजिद आगे कहते हैं, अक्सर आस-पास में लगी होर्डिंग्स व ऐड्स जहां गुप्त रोग का जिक्र किया जाता है, देखकर हम हंस देते हैं. दोस्तों के बीच गॉसिप का मुद्दा भी बनाते हैं. कभी किसी ने सीरियसली तो लिया नहीं होगा. पर कभी सोचा है कि उनकी दुनिया कैसी होती होगी. ये डॉक्टर्स कितनी अनाम जिंदगी जीते होंगे. जब इस सब्जेक्ट के साथ हमने टाइम स्पेंड किया, तो मुझे हमदर्दी होने लगी, न केवल पेशेंट के साथ बल्कि उन डॉक्टर्स के लिए भी बुरा लगने लगा. हम उनके काम का मजाक उड़ाते हैं. आपको पता है वो केवल डॉक्टर नहीं होते हैं, वो बल्कि साइकॉलजिस्ट का भी काम करते हैं. 

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 इस सीरीज की मेकिंग पर साजिद कहते हैं, मेरे भाई इम्तियाज अली को यह सब्जेक्ट का आइडिया आज से 30 साल पहले आया था. वो जब भी जमशेदपुर से दिल्ली या मुंबई सफर किया करते थे, तो उस दौरान कई बार ट्रेन में लगे पोस्टर या खिड़की किनारे दूर दिवारों पर छपे इनकी ऐड देखा करते थे. उस समय वो सोचते थे कि आखिर इनकी कैसी दुनिया होती होगी. वो इस दुनिया को जानना चाहते थे. आप देख लें, ये कितने सालों से उनके जेहन में घर कर चुका था. उन्होंने राइटिंग के जरिए इसे एक्स्प्लोर भी किया. लिख कर छोड़कर कहीं सालों बाद यह कहानी आखिरकार अब स्क्रीन पर आई है. लॉकडाउन के दौरान इस सोच ने स्क्रिप्ट का रूप लिया था. 

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इम्तियाज ने इसे डायरेक्ट न कर, साजिद को क्यों सौंपा, इसके जवाब में साजिद कहते हैं, इम्तियाज और भी कहानियां लिख रहे हैं और उन्हें बताना चाहते हैं. इसलिए उन्होंने इस कहानी को डायरेक्ट करने के लिए मुझे चुना. हालांकि इम्तियाज ने मेकिंग के दौरान मुझे कुछ चैलेंज भी दे दिया था. उन्होंने कह दिया था, कि कहानी पूरी सेक्स के बारे में बात करती है लेकिन तुम्हें इसमें सेक्स को नहीं दिखाना है. आपको अपनी बातें सटल तरीके से रखनी है, किसी को उत्तेजित नहीं करना है. आपको उन चीजों के बारे में डिटेल से समझाना है जिसे न देख सकते हैं और न ही दिखा सकते हैं. जो मेरे लिए यह काफी चैलेंज था. इसके अलावा एक किरदार है वाघला नाम का, उसका कैरेक्टर बहुत ही वोलेटाइल है. उसके किरदार को मैं समझ ही नहीं पाया हूं. उसके रिप्रेजेंटेशन का मेरे लिए बहुत ही चैलेंजिंग रहा. इस सब्जेक्ट या कह लें टैबू के प्रति रिस्पेक्टफुल होना और वही रिस्पेक्ट दर्शकों के दिलों में जगाना, ये ऑब्जेक्टिव चैलेंज रहे. 

लैला मजनू दो दिन में उतार दी गई थी 
बता दें साजिद की पहली डायरेक्टोरियल डेब्यू लैला मजनू रही थी. साजिद कहते हैं, मेरी फिल्म 2018 में रिलीज हुई थी, दो दिन भी थिएटर पर आने के बाद उतार दी गई. एक हफ्ते में फिल्म का नामो-निशां तक मिटा हुआ था. यहां मुझे खुद से ज्यादा उन लोगों के लिए बुरा लगता था, जिन्होंने मुझ पर विश्वास किया था. मेरी वजह से उनको बहुत नुकसान हुआ था. आज जब लोगों को अपनी उस फिल्म की तारीफ करता सुनता हूं, तो सुखद एहसास होता है. कुछ लोग हैं, जो आज भी आकर मुझसे फिल्म, अविनाश की एक्टिंग, गानों की तारीफ करते हैं. उनकी तारीफ मुझे स्ट्रेंथ देता है कि अपने आगे प्रोजेक्ट को और बेहतर तरीके से करूं. 

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