समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को अबकी बार 'यूपी के अपने लड़कों' से खासी उम्मीद थी. इस उम्मीद का क्या हश्र हुआ नतीजे इसकी कहानी बयां करते हैं. लेकिन गठबंधन उन जगहों पर भी औंधे मुंह गिरा जहां राहुल और अखिलेश मिलकर चुनाव प्रचार में उतरे थे. दोनों नेताओं ने कुल 7 इलाकों में रोड शो और रैलियां की थीं. एक नजर इन इलाकों के चुनावी नतीजों पर.
आगरा
पिछली बार आगरा में बीएसपी पहले नंबर पर रही थी. लेकिन इस बार 9 में से 8 सीटें बीजेपी को मिलनी तय हैं. बीएसपी सिर्फ एतमादपुर में आगे है.
मोदी के इस गढ़ में राहुल और अखिलेश यादव ने खास जोर लगाया था. मोदी को चुनौती देने के लिए रोड शो और साझा प्रेस कांफ्रेंस भी की. लेकिन यहां की 8 सीटों में से 6 सीटों पर बीजेपी का परचम बुलंद हुआ है.
इलाहाबाद
एक वक्त था जब ये इलाका कांग्रेस का अभेद्य गढ़ था. लेकिन इस बार यहां की 12 में से 9 सीटें बीजेपी की झोली में गई हैं. पिछली बार इतनी ही सीटों पर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के उम्मीदवारों का कब्जा था.
पिछले चुनाव में यहां की 9 में से 7 सीटें जीतने वाली समाजवादी पार्टी को इसी तरह के प्रदर्शन की उम्मीद थी. लेकिन जनता ने छह सीटों पर बीजेपी उम्मीदवारों को चुना है. मुलायम परिवार की सदस्य अपर्णा यादव भी सीट नहीं बचा पाई हैं.
कानपुर
कानपुर में कुल 10 विधानसभा सीटें हैं. इनमें से 7 बीजेपी के खाते में गई हैं. समाजवादी पार्टी को 2 और कांग्रेस को 1 सीट पर संतोष करना पड़ा है. यहां राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने 5 फरवरी को साझा रैली की थी.
योगी आदित्यनाथ के इस गढ़ में चिल्लूपार सीट पर बीएसपी उम्मीदवार को छोड़ दें तो सभी 9 सीटों पर बीजेपी को जीत हासिल हुई है. यानी राहुल गांधी और अखिलेश यादव की रैली यहां भी बेअसर साबित हुई.
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झांसी
बुंदेलखंड की 19 सीटों पर नजर के साथ यहां भी राहुल गांधी और अखिलेश यादव एक साथ चुनावी मैदान मे उतरे थे. पिछली बार समाजवादी पार्टी यहां बीएसपी के बाद दूसरे नंबर पर रही थी. लेकिन इस बार बीजेपी इस इलाके में क्लीन स्वीप करने में कामयाब रही है.