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बिजली, पानी और सड़क नहीं, बंदर है यहां चुनावी मुद्दा

बिजली, पानी और सड़क ही चुनावी मुद्दे नहीं हो सकते, बल्कि बंदर भी चुनावी मुद्दा हो सकते हैं. चुनावों में नेतागण मतदाताओं को रिझाने के लिए तरह- तरह के वादे करते हैं और वोट पाने के लिए हर समस्या का समाधान देते हैं. बिहार के सहरसा जिले के दो विधान सभा क्षेत्रों में चुनावी मुद्दे से जुड़ा एक अनोखा मामला सामने आया है.

बंदरों से बेहाल हुए किसान बंदरों से बेहाल हुए किसान

बिजली, पानी और सड़क ही चुनावी मुद्दे नहीं हो सकते, बल्कि बंदर भी चुनावी मुद्दा हो सकते हैं. चुनावों में नेतागण मतदाताओं को रिझाने के लिए तरह- तरह के वादे करते हैं और वोट पाने के लिए हर समस्या का समाधान देते हैं. बिहार के सहरसा जिले के दो विधान सभा क्षेत्रों में चुनावी मुद्दे से जुड़ा एक अनोखा मामला सामने आया है.

कोई बंदरों से बचाए
यहां लगभग दो दर्जन गांवों के मतदाताओं ने चुनाव में बिजली, पानी और सड़क की नहीं बंदरों के आतंक से मुक्ति की मांग की है. यहां के लोगों को पिछले 15 साल से बंदरों ने परेशान कर रखा है. बंदरों ने सहरसा और बख्तियारपुर के गांवों में तबाही मचा रखी है.

15 साल से बंदरों का कहर
लाठी- डंडा लेकर गांव के लोग हर रोज किसी दुश्मन से निपटने के लिए नहीं, बल्कि बंदरों से अपनी फसल बचाने के लिए तैयार होते हैं. 15 साल से हजारों बंदर किसानों की फसल बर्बाद करते रहे हैं. इन बंदरों के रहते लोगों को बाहर आने- जाने और खाने- पीने की चीज लाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है.

10 हजार किसान हैं प्रभावित
गांव के एक आदमी ने बताया कि बंदरों ने लगभग 10 हजार किसानों की फसल बर्बाद की है. इस समस्या को प्रशासन और बिहार सरकार के सामने उठाया गया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. चुनाव शुरू होते हैं और खत्म भी हो जाते हैं, पर कुछ नहीं बदलता. चुनाव के दौरान प्रत्याशी वादा करते हैं कि चुनाव जीत कर, उनकी सहायता करेंगे. सारे वादे खोखले साबित होते हैं.

वोट देने गए, तो बंदर आ जाएंगे
यहां के मतदाताओं की कोई मांग नहीं है, वे सिर्फ बंदरों से निजात पाना चाहते हैं. गांव के लोगों का कहना है कि अगर वे वोट देने जाएंगे, तब तक बंदर उनकी फसल बर्बाद कर देंगे. यहां की हालत इतनी खराब हो गई है कि बच्चों को स्कूल भेजने की बजाय फसलों की रखवाली के लिए खेत भेजा जाता है. गांव की महिलाएं बच्चों को खेलने के लिए भी कहीं नहीं जाने देती हैं.

वोटिंग का बहिष्कार
कई सालों से बंदरों का कहर चुनावी मुद्दा बना हुआ है. इस बार भी सहरसा में 5 नवंबर को होने वाले चुनाव में यही चुनावी मुद्दा है. नेताओं के झूठे वादों से पस्त मतदाताओं ने वोटिंग का बहिष्कार करने का फैसला किया है.

गाय के बाद बंदर
इस चुनाव में गाय के बाद बंदर ही सुर्खियों में रहे हैं. चुनाव के तीसरे चरण के दौरान बख्तियारपुर में बंदरों ने मतदाताओं को काफी परेशान किया था. बीजेपी उम्मीदवार आलोक रंजन ने कहा है कि वे इस क्षेत्र के लोगों को बंदरों से निजात दिला देंगे.

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