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मैं अरविंद केजरीवाल को वोट नहीं करूंगा, क्योंकि...

दिल्ली में 7 फरवरी को नई सरकार के लिए वोट डाले जाएंगे और मैं इस बार आम आदमी पार्टी या अरविंद केजरीवाल को वोट नहीं दूंगा. उन्हें वोट नहीं देने के लिए मेरे पास कई कारण हैं, जिनमें से 10 ये हैं.

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अरविंद केजरीवाल
अरविंद केजरीवाल

दिल्ली में 7 फरवरी को नई सरकार के लिए वोट डाले जाएंगे और मैं इस बार आम आदमी पार्टी या को वोट नहीं दूंगा. उन्हें वोट नहीं देने के लिए मेरे पास कई कारण हैं, जिनमें से 10 ये हैं.

1. विवादों के 49 दिन
अपने 49 दिन के कार्यकाल में अरविंद केजरीवाल की सरकार विवादों में घिरी रही. उन्होंने कुछ उपयोगी फैसले जरूर लिए, लेकिन सरकार चलाते हुए एक प्राकृतिक सहजता का अभाव उनके कार्यकाल में दिखा. उन्होंने जनता दरबार बुलाया, वो फ्लॉप हो गया. उन्हें सचिवालय में मीडिया की एंट्री पर रोक लगानी पड़ी. फिर मुख्यमंत्री रहते हुए उनका धरने पर बैठना भी कई लोगों को रास नहीं आया.

2. अनुभवी को क्यों न चुनें?
अरविंद केजरीवाल का कम राजनीतिक अनुभव भी एक वजह है. उन्हें राजनीति में आए अभी दो साल से थोड़ा ही ज्यादा वक्त हुआ है. उसमें भी सरकार चलाने का अनुभव महज 49 दिन का है. ऐसे में हम अपना प्रदेश चलाने के लिए कोई अनुभवी प्रतिनिधि क्यों न चुनें.

3. आरोप लगाओ की राजनीति काबिल-ए-तारीफ है कि केजरीवाल का आंदोलन मूल रूप से भ्रष्टाचार के खिलाफ रहा. लेकिन कई बार उनकी मुहिम सिर्फ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस और आरोप लगाने तक ही सीमित क्यों रह जाती है.

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4. विचारधारा क्या है?
आम आदमी पार्टी की राजनीतिक विचारधारा को लेकर कार्यकर्ताओं और लोगों में भी स्पष्टता का अभाव है. उनके नारों में 'भारत माता की जय' और 'इंकलाब जिंदाबाद' शामिल हैं, लेकिन उनका रुझान न राष्ट्रवादी नजर आता है और न ही वामपंथी. ऐसे में नीतियों को लेकर एक अस्पष्टता बनी हुई है.

5. पार्टी पर किसका कब्जा?
क्या कारण है कि AAP से अलग हुए ज्यादातर नेता पार्टी में अंदरूनी लोकतंत्र का अभाव बताते हैं? ऐसा लगता है कि पार्टी पर अरविंद केजरीवाल का एकाधिकार है. हालांकि बीजेपी और कांग्रेस में भी चुनिंदा लोगों की ही चलती है. लेकिन AAP तो हमेशा बीजेपी-कांग्रेस से अलग नैतिक मानकों पर चलने का दावा करती रही है. क्या AAP को भी वही रोग लग गया?  

6. मिला हुआ मौका गंवाया
महज 49 दिनों के बाद आया अप्रत्याशित इस्तीफा एक बड़ी वजह है. केजरीवाल लाख माफी मांग लें, आप लाख कोशिश करें इस तथ्य को भुलाने की, लेकिन यह गलती अब भी आम आदमी पार्टी के गले की हड्डी बनी हुई है. सरकार में टिके रहने को लेकर अब भी उनकी विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है. राजनीति में गंवाए हुए मौके बार-बार नहीं मिलते और अरविंद एक जरूरी मौका खो चुके हैं.

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7. किस आर्थिक नीति के पक्षधर वित्तीय मसलों पर आम आदमी पार्टी की राय अभी खुलकर सामने नहीं आई है. मसलन, उनकी आर्थिक नीति नव-उदारवादी है या समाजवादी? उसने किराना क्षेत्र में एफडीआई का विरोध तो किया, लेकिन क्या वह पूरी तरह एफडीआई की अवधारणा के खिलाफ है? निवेश के मुद्दे पर वह किस पाले में खड़ी है?

8. नई नौकरियां पैदा कर पाएंगे?
बहुत सारे युवा कहते हैं कि अरविंद केजरीवाल की नीयत तो साफ हैं, लेकिन उनकी क्षमताओं पर संशय है. मसलन अगर वह सत्ता में आए तो किस तरह नई नौकरियां और अवसर पैदा करेंगे? कर भी पाएंगे या नहीं?

9. बड़बोलापन
अरविंद जिन राजनीतिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, वे लोकप्रियतावादी लगते हैं. गोभी जब 35 और 40 रुपये किलो बिक रही थी, तब भी वे चुनाव प्रचार के दौरान उसे 60 रुपये किलो बता रहे थे. एक किस्म का बड़बोलापन उनके स्वभाव में है.

10. 20 हजार कहां से लाएं?
आम आदमी पार्टी भले ही फंडिंग का हिसाब-किताब वेबसाइट पर डालती है. लेकिन उसने ऐसी डिनर पार्टियों से फंड जुटाया है जहां 20 हजार रुपये की थाली मिलती है. जाहिर है, आम आदमी 20 हजार रुपये की थाली नहीं खरीद सकता. इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि अगर मैं केजरीवाल से मिलना चाहूं तो मेरी जेब में 20 हजार रुपये होने चाहिए. आर्थिक मजबूरियां भले ही हों, पर आम आदमी के नेता के लिए यह अच्छी बात नहीं है.

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