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झारखंड की राजनीति में क्या फिर दिखेगा शिबू सोरेन का कमाल?

झारखंड के सबसे बड़े नेताओं में गिने जाने वालों में शिबू सोरेन का नाम भी शामिल है. झारखंड से तीन बार मुख्यमंत्री पद संभाल चुके शिबू सोरेन को आदिवासी समुदाय के बड़े नेता के रूप में  को जाना जाता है. सोरेन दुमका से 2019 में चुनाव लड़ रहे हैं. आम चुनाव 2019 में सातवें और आखिरी चरण में दुमका लोकसभा सीट के लिए मतदान होगा.

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शिबू सोरेन
शिबू सोरेन

झारखंड के सबसे बड़े नेताओं में गिने जाने वालों में शिबू सोरेन का नाम भी शामिल है. झारखंड से तीन बार मुख्यमंत्री पद संभाल चुके शिबू सोरेन को आदिवासी समुदाय के बड़े नेता के रूप में जाना जाता है. सोरेन तीनों ही बार लोकसभा के सदस्य रहते हुए ही मुख्यमंत्री बने हैं. झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक शिबू सोरेन यूपीए-1 की सरकार में कोयला मंत्री के पद पर भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. साल 2006 तक वे केंद्र सरकार में कोयला मंत्री रहे. अब 2019 के लोकसभा चुनाव में सोरेन दुमका लोकसभा सीट से चुनावी मैदान में खड़े हैं.

निजी जीवन

11 जनवरी 1944 में जन्मे शिबू सोरेन के पिता की महाजनों ने हत्या कर दी थी. इसके बाद शिबू सोरेन ने लकड़ी बेचने का काम भी शुरू किया. इनकी पत्नी का नाम रूपी है. वहीं इनके तीन बेटे और एक बेटी हैं.

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राजनीतिक जीवन

1970 के दशक में शिबू सोरेन ने आदिवासियों के नेता के तौर पर राजनीति में एंट्री की. कहा जाता है कि 1975 में उन्होंने गैर-आदिवासी लोगों को निकालने के लिए एक आंदोलन की शुरुआत भी की. इस दौरान हिंसा में 7 लोगों की मौत की बात सामने आई और शिबू सोरेन पर हिंसा को भड़काने के आरोप भी लगे. 1977 में सोरेन ने पहला लोकसभा चुनाव लड़ा. हालांकि सोरेन इस चुनाव में जीत दर्ज नहीं कर पाए और उन्हें हार का सामना करना पड़ा. लेकिन 1980 में सोरेन चुनाव में जीत हासिल कर लोकसभा पहुंच गए. इसके बाद शिबू ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और उन्होंने 1989, 1991 और 1996 के लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की. इसके बाद साल 2002 में शिबू राज्यसभा भी पहुंचे. वहीं सोरेन झारखंड के तीन बार मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. पहले 2005 में 10 दिनों के लिए, दूसरी बार 2008-09 में 4 महीने 22 दिनों के लिए तो तीसरी बार 5 महीने के लिए 2009-10 में सीएम पद पर रहे.

विवादों से भरा राजनीतिक जीवन

शिबू सोरेन की जिंदगी का विवादों से भी काफी नाता रहा है. मनमोहन सिंह की सरकार में कोयला मंत्री रहने के दौरान दिल्ली की एक अदालत ने उन्हें अपने सचिव शशि नाथ की हत्या का दोषी माना था. यह चर्चित हत्याकांड 1994 में सामने आया था. इसके अलावा चिरुधि केस में वह 69 दूसरे लोगों के साथ 10 लोगों की हत्या के मुख्य आरोपी थे. इस केस में उनके खिलाफ अरेस्ट वॉरंट जारी हो गया था और उन्हें मनमोहन सरकार में कोयला मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा. शुरुआत में वह अंडरग्राउंड हो गए थे, लेकिन बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया था. शिबू सोरेन को 1 महीने न्यायिक हिरासत में रहने के बाद जमानत मिल गई थी.

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