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गुजरात: अनसूचित जनजाति के लिए आरक्षित दाहोद सीट पर क्या होगी कांग्रेस की वापसी?

इस लोकसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा आबादी आदिवासी समाज की है. 2011 की जनगणना के अनुसार, लोकसभा क्षेत्र की कुल आबादी 24,36,636 है. इसमें 91.34% ग्रामीण और 8.66% शहरी आबादी है.

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Dahod Seat
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दधिमति नदी के किनारे बसा दाहोद राज्य का सबसे पिछड़ा इलाका माना जाता है. पिछले चुनाव में यहां से भारतीय जनता पार्टी ने जीत दर्ज की थी, जबकि उससे पहले यह सीट कांग्रेस के खाते में गई थी. अनुसूचति जनजाति (ST) के लिए आरक्षित यह लोकसभा क्षेत्र को गरीबी रेखा में काफी नीचे होने के चलते विशेष राहत पैकेज भी दिए जाते हैं.

राजनीतिक पृष्ठभूमि

इस सीट पर सबसे पहला चुनाव 1962 में हुआ था, उस वक्त यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी. इस चुनाव में स्वतंत्र पार्टी के कुंवरभाई बारिया ने जीत दर्ज की थी. 1967 के चुनाव में यह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित की गई और इस चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर बीआर परमार ने बाजी मारी. 1971 में भी बीआर परमार ने जीत दर्ज की. हालांकि, यह चुनाव उन्होंने कांग्रेस का विघटन होकर बनी नेशनल कांग्रेस (O) के टिकट पर जीता. 1971 का यह चुनाव सामान्य श्रेणी की सीट के तौर पर हुआ.

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1977 और 1980 के चुनाव में यह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित की गई. इन दोनों चुनाव में कांग्रेस और कांग्रेस (I) को जीत मिली. इसके बाद 1984 से 1998 तक लगातार पांच चुनाव में कांग्रेस ने परचम लहराया. भारतीय जनता पार्टी को 1999 में यहां पहली बार जीत मिली, जब खीमाभाई बाबूभाई कटारा ने कांग्रेस को शिकस्त दी. 2004 में भी खीमाभाई फिर से सांसद बने. 2009 में पहली बार इस लोकसभा क्षेत्र को महिला सांसद मिलीं, जब कांग्रेस के टिकट पर डॉ प्रभा किशोर ने चुनाव जीता. हालांकि, 2014 में वह बीजेपी के जसवंत सिंह भाभोर से हार गईं.

सामाजिक ताना-बाना

इस लोकसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा आबादी आदिवासी समाज की है. 2011 की जनगणना के अनुसार, लोकसभा क्षेत्र की कुल आबादी 24,36,636 है. इसमें 91.34% ग्रामीण और 8.66% शहरी आबादी है. जाति के लिहाज से देखा जाए तो अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या करीब 75 फीसदी और अनुसूचित जाति की आबादी 2 फीसदी है. पूरे दाहोद जिले में 96 फीसदी आबादी हिंदू है, जबकि मुस्लिम आबादी करीब 3 फीसदी है.

इस लोकसभा क्षेत्र के तहत आने वाली सात विधानसभा सीट दाहोद और पंच महल जिले में पड़ती हैं. इनमें से 6 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं, जबकि एक सीट सामान्य वर्ग के लिए है. अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में संतरामपुर, लिमखेड़ा, फतेहपुरा, दाहोद, झालोड, गरबादा शामिल हैं. जबकि देवगड बारिया सामान्य वर्ग के लिए है. 2017 के विधानसभा चुनाव में फतेहपुरा से बीजेपी, लिमखेड़ा से बीजेपी, देवगड बारिया से बीजेपी, झालोड से कांग्रेस, दाहोद से कांग्रेस, गरबादा से कांग्रेस और संतरामपुर से बीजेपी को जीत मिली थी. संतरामपुर पंच महल जिले में आती है, जबकि बाकी सभी 6 सीटें दाहोद जिले में आती हैं.

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2014 लोकसभा चुनाव का जनादेश

जसवंत सिंह भाभोर, बीजेपी- 511,111 वोट 56.8%)

डॉ प्रभा किशोर, कांग्रेस- 280,757 (31.2%)

2014 चुनाव का वोटिंग पैटर्न

कुल मतदाता-  14,11,765

पुरुष मतदाता-    7,12,184

महिला मतदाता-   6,99,581

मतदान-  9,00,381 (63.8%)

सांसद का रिपोर्ट कार्ड

50 साल के जसवंत सिंह भाभोर ने बीए और बीएड की पढ़ाई की है. 1995 में पहली बार गुजरात विधानसभा चुनाव जीतने वाले भाभोर 2014 तक पांच बार विधायक बने. उन्हें गुजरात सरकार में मंत्री बनने का भी मौका मिला. 2014 में उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा और पहली बार सांसद बने. 2016 में उन्हें आदिवासी मंत्रालय में केंद्रीय राज्य मंत्री बनाया गया.

लोकसभा में जसवंत सिंह की उपस्थिती 90 फीसदी रही है. जबकि उन्होंने 11 बार संसद की बहस में हिस्सा लिया है. सवाल पूछने में उनका प्रदर्शन औसत से अच्छा रहा है और उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कुल 138 सवाल पूछे हैं.

रामसिंह राठवा ने अपनी सांसद निधि से लगभग 90 फीसदी पैसा खर्च कर दिया. उनकी निधि से कुल 23.67 करोड़ रुपये आवंटित हुए, इनमें से 20.36 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए, जबकि 3.31 करोड़ रुपये बाकी रह गए. एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, जसवंत सिंह भाभोर की कुल संपत्ति 1 करोड़ रुपये से ज्यादा है. इसमें से 73 लाख रुपये की चल संपत्ति है, जबकि 1 करोड़ 22 लाख रुपये की अचल संपत्ति है.

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