झारखंड विधानसभा की 81 सीटों पर सुबह 8 बजे से मतगणना शुरू हो जाएगी. इस अहम चुनाव में कई दिग्गजों की किस्तम का फैसला होना है. दिलचस्प ये है कि झारखंड राज्य भी सियासी अंधविश्वास से अछूता नहीं है. झारखंड के सियासी गलियारों में कहा जाता है कि जो भी नेता विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा, वह चुनाव हार गया. अब ऐसे में क्या झारखंड विधानसभा के स्पीकर दिनेश उरांव ये मिथक तोड़ेंगे.
सिसई सीट से हैं उम्मीदवार
दिनेश उरांव सिसई सीट से भाजपा उम्मीदवार है. उनका मुकाबला झारखंड मुक्ति मोर्चा के जिग्गा मुंडा से है. इस सीट पर पिछले चुनाव में दिनेश उरांव ने जेवीएम के जिग्गा सुसारन होरो को मात दी थी.
झारखंड को नया राज्य बने 19 साल हो चुके हैं. 22 नवंबर, 2000 को झारखंड विधानसभा का गठन हुआ था, तबसे लेकर आज तक यह सदन तमाम उठापटक देख चुका है और समय के साथ सदन में तमाम परिवर्तन होते रहे हैं. यह अंधविश्वास जिस बिना पर कायम हुआ है, वह तथ्य झारखंड की सियासत का ऐतिहासिक सच है.
राज्य में अब तक 3 बार चुनाव हुए
राज्य में इसके पहले अब तक 3 बार ( 2005, 2009 और 2014) चुनाव हुए हैं. विधानसभा में जो भी नेता अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा, इन तीनों चुनावों में उसकी हार हुई. राज्य के 19 सालों के इतिहास में अब तक विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने वाले किसी भी व्यक्ति को चुनावी सफलता नहीं मिली.
2005 में जब झारखंड में पहली बार चुनाव हुआ तो इसके पहले एमपी सिंह विधानसभा अध्यक्ष थे. जमशेदपुर पश्चिम से सरयू राय के चुनाव लड़ने के कारण एमपी सिंह को टिकट नहीं मिला. नाराज विधानसभा अध्यक्ष ने राजद के टिकट पर चुनाव लड़ा और हार गए.
इसी तरह 2009 के चुनाव में आलम गीर आलम सिटिंग विधानसभा अध्यक्ष के रूप में पाकुड़ से चुनाव लड़े, लेकिन उन्हें भी हार नसीब हुई और यहां से झामुमो चुनाव जीत गया. इस चुनाव में कांग्रेस, राजद और झामुमो का गठबंधन नहीं हुआ था. इसके बाद 2014 के चुनाव में भी तीनों पार्टियां अकेले ही मैदान में उतरीं और इस चुनाव में भी सिटिंग स्पीकर शशांक शेखर भोक्ता देवघर की सारठ सीट से चुनाव हार गए.