हिमाचल विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन की तारीख खत्म हो चुकी है. सूबे की 68 सीटों के लिए 561 उम्मीदवार मैदान में किस्मत आजमा रहे हैं. बीजेपी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने सभी 68 सीटों पर प्रत्याशी उतारे हैं. कांग्रेस और बीजेपी दोनों की राह में अपनी नेता सिरदर्द बन गए हैं. हिमाचल में हर पांच साल पर सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड रहा है. यह ऐसा राज्य जहां जीत और हार के बीच का अंतर अक्सर कुछ वोटों का होता है. ऐसे में कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए बागी चिंता का सबब बन गए हैं.
बीजेपी के सिरदर्द बने बागी नेता
हिमाचल चुनाव में करीब 18 सीटों पर बीजेपी को अपने ही नेताओं की बगावत झेलनी पड़ रही है जबकि कांग्रेस को करीब 10 पर अपनों से चुनौती मिल रही. बीजेपी को बगावत का सामना इसीलिए करना पड़ रहा है, क्योंकि कुछ सीटों पर मौजूदा विधायकों के टिकट कटने के कारण परेशानी खड़ी हुई है तो कुछ पर टिकट के चाहने वालों के निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर ताल ठोक देने से.
कांग्रेस से टिकट चाहने वालों के उम्मीदवारों पर पानी फिरने के बाद निर्दलीय के रूप में उतर गए हैं, जिसके चलते पार्टी के लिए सत्ता में वापसी की राह कांटों भरी हो गई. कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियां अपने-अपने बागी नेताओं को मनाने में जुटी हैं ताकि चुनावी नुकसान न उठाना पड़े.
बीजेपी उम्मीदवारों की लिस्ट में सुरेश भारद्वाज सहित दो वरिष्ठ मंत्रियों की विधानसभा सीटों को बदल दिया. इसके अलावा बीजेपी ने अपने 11 मौजूदा विधायकों के टिकट नहीं दिए. शिमला शहर से चार बार विधायक रहे भारद्वाज की जगह शिमला से संजय सूद को टिकट दिया था जबिक भारद्वाज को कसुम्पटी से प्रत्याशी बनाया. हालांकि, नाराजगी को देखते हुए बीजेपी ने अपने घोषित दो उम्मीदवारों के टिकट बदलने पड़े हैं.
बीजेपी ने चंबा सीट पर पहले इंदिरा कपूर के स्थान पर नीलम नैयर को प्रत्याशी बनाया है. कुल्लू सदर सीट पर महेश्वर सिंह का टिकट काटकर उनकी जगह नरोतम ठाकुर को बीजेपी ने प्रत्याशी बनाया है. ऐसे में महेश्वर सिंह और उनके बेटे हितेश्वर सिंह निर्दलीय मैदान में कूद पड़े हैं. कुल्लू सदर से बीजेपी के एक अन्य नेता राम सिंह ने भी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन दाखिल कर रखा है. बीजेपी के एसटी मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष विपिन नैहरिया और अनिल चौधरी टिकट नहीं मिलने से पार्टी छोड़ दी और निर्दलीय चुनावी मैदान में कूद पड़े हैं.
मुख्यमंत्री के जिले में सबसे ज्यादा बगावत
मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का गृह जनपद मंडी और कांगड़ा जिला में बीजेपी को सबसे ज्यादा बगावत का सामना करना पड़ रहा है. कांगड़ा की 10 विधानसभा सीटों में से 5 और मंडी की 10 सीटों में से 5-6 सीटों पर बीजेपी को अपने ही नेताओं की बगावत झेलनी पड़ी है. नूरपुर से कैबिनेट मंत्री राकेश पठानिया को फतेहपुर सीट भेजा है, लेकिन यहां से पूर्व प्रत्याशी कृपाल परमार बागी हो गए हैं और निर्दलीय चुनाव लड़ रहे. इंदौरा से विधायक रीता धीमान को फिर से टिकट मिला है, लेकिन यहां से पूर्व विधायक मनोहर धीमान निर्दलीय किस्मत आजमा रहे.
जवाली सीट पर अर्जुन सिंह का टिकट काटा है और संजय गुलेरिया को प्रत्याशी बनाया है, लेकिन अब समर्थकों के दबाव में अर्जुन सिंह भी चुनाव मैदान में उतर गए हैं. धर्मशाला में विशाल नेहरिया की जगह राकेश चौधरी को दिया है, जिसके बाद वो बागी हो गए हैं. निर्दलीय उम्मीदवारों के रूप में नामांकन दाखिल करने वाले असंतुष्ट बागियों में मंडी सदर के भाजपा नेता प्रवीण शर्मा, जो पार्टी के मीडिया प्रभारी थे. ऐसे ही नालागढ़ के विधायक केएल ठाकुर और हमीरपुर जिला परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष नरेश दारजी शामिल हैं. केएल ठाकुर की जगह बीजेपी ने कांग्रेस के बागी एल एस राणा को नालागढ़ से टिकट दिया है.
हिमाचल के जल शक्ति मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर के परिवार में कलह देखने को मिली है. जब उनके बेटे रजत ठाकुर को उनके पिता के स्थान पर सोलन जिले के धर्मपुर से बीजेपी उम्मीदवार बनाया गया, तो उनकी बेटी वंदना गुलेरिया बागी हो गईं. उन्होंने भाजपा छोड़ दी है और निर्दलीय चुनाव लड़ रही हैं. इसी तरह करसोग और दरंग के बीजेपी विधायकों, हीरालाल और जवाहर ठाकुर निर्दलीय मैदान में हैं. इसी तरह भाजपा के छह बार के विधायक रूप सिंह ठाकुर के बेटे अभिषेक ठाकुर निर्दलीय किस्मत आजमा रहे हैं.
बीजेपी की हिमाचल में बढ़ती नाराजगी का एक प्रमुख कारण हाल ही में कांग्रेस को छोड़कर पार्टी में शामिल हुए नेता को टिकट देना भी है. ऐसे में बीजेपी के नेता निर्दलीय चुनावी मैदान में कुद पड़े हैं, जिसके चलते पार्टी के लिए चिंता बढ़ गई है. मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर बीजेपी के बागियों से भी खुद संपर्क कर रहे हैं. इसी के तहत उन्होंने करसोग सीट पर हीरालाल और अन्य दावेदारों को मना लिया है, इसी तरह शिमला की कुसुम्पटी सीट पर विजय ज्योति सेन से भी बात की गई है.
कांग्रेस के लिए अपने ही बने चुनौती
हिमाचल की सत्ता में वापसी का सपना देख रही कांग्रेस के लिए उसके ही नेता चुनौती बन गए हैं. कांग्रेस के नाराज नेताओं ने 10 सीटों पर पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव मैदान में कूद पड़े हैं. कांग्रेस को सबसे ज्यादा खतरा युवा ब्रिगेड से बना हुआ है. पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह के गृह क्षेत्र रामपुर में कांग्रेस ने बीजेपी के कौल नेगी को प्रत्याशी बनाया तो पार्षद विशेषर लाल बागी हो गए हैं. चौपाल सीट पर कांग्रेस के 2 बार के विधायक डॉ. सुभाष मंगलेट निर्दलीय नामांकन पत्र भरा है.
कांगड़ा जिला के सुलह सीट पर पूर्व विधायक जगजीवन पाल पार्टी से बागी हो गए हैं. इन्होंने भी पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी जगदीश सिपहिया के खिलाफ नामांकन भरकर चुनावी ताल ठोक दी है. ठियोग सीट पर विजय पाल खाची और इंदू वर्मा निर्दलीय मैदान में है. अर्की सीट से होली लॉज के करीबी राजेंद्र ठाकुर निर्दलीय नामांकन भरा हैं. पच्छाद में कांग्रेस ने पूर्व में बीजेपी नेत्री रही दयाल प्यारी को टिकट दिया है, जिसके पूर्व विधायक गंगू राम मुसाफिर बागी हो गई हैं. चिंतपूर्णी में पार्टी के लिए बागी चुनौती बन गए हैं. आनी विधानसभा सीट से कांग्रेस ने बंसी लाल को टिकट दिया है, जिससे परसराम ने निर्दलीय नामांकन दाखिल कर दिए हैं.
हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस छह दशक में पहली बार वीरभद्र सिंह के बगैर चुनाव लड़ रही है. रूठे हुए और नाराज नेताओं को मनाने में वीरभद्र सिंह का कोई सानी नहीं था, लेकिन अब कांग्रेस को उनकी कमी खल रही है. हालांकि, कांग्रेस की कमान उनकी पत्नि प्रतिभा सिंह संभाल रही हैं, लेकिन अपने गृहक्षेत्र में बगावत को नहीं संभाल पा रही है. ऐसे में कांग्रेस की ओर से दावा किया जा रहा है कि बागी नेताओं को मना लिया जाएगा?