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गुजरात के अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में भी राहुल का ‘हाथ’, सॉफ्ट हिंदुत्व के साथ!

बुधवार को राहुल की यात्रा अल्पसंख्यक बहुल इलाके भरूच ज़िले के जम्बूसर की रैली से शुरू की थी. राहुल के आने से पहले ही सभास्थल खचाखच भर गया था. भीड़ देखकर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता था कि उसमें बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक मौजूद थे.

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राहुल गांधी राहुल गांधी

गुजरात चुनाव में इस बार काग्रेस सोच समझ कर ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ का कार्ड खेल रही है और इस रणनीति से टस से मस नहीं होना चाहती. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी खुद भी इस लाइन पर डटे दिखते हैं. गुजरात चुनाव के मद्देनजर राज्य की पहली दो यात्राओं में राहुल कई मंदिरों में दर्शन करते नजर आए तो नवदुर्गा पंडालों में उन्होंने आरती भी की. इसी सिलसिले में 1 नवंबर से राहुल ने गुजरात का फिर दौरा शुरू किया तो उन्होंने अपने अंदाज से साफ कर दिया कि चाहे इलाका अल्पसंख्यक बहुल ही क्यों ना हो, वे ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की लाइन को पकड़े रखेंगे.

बुधवार को राहुल ने तीन दिन के दौरे की शुरुआत भरूच जिले के जम्बूसर से की. ये इलाका अल्पसंख्यक बहुत माना जाता है. राहुल के पहुंचने से पहले ही रैली स्थल भरा हुआ नजर आने लगा था. एक नजर में ही पता चल रहा था कि बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक भी राहुल को सुनने आए थे. कांग्रेस को ये आशंका थी कि गुजरात का ये चुनाव साम्प्रदायिक लाइन पर ना चला जाए और ध्रुवीकरण से कहीं उसका नुकसान ना हो जाए. लेकिन साथ ही कांग्रेस के लिए ये भी सवाल था कि पूरी तरह अल्पसंख्यक इलाके को बिना प्रचार कैसे छोड़ दे. इसी कशमकश में पार्टी ने एक तरीका ईजाद किया.

तय हुआ कि राहुल इस इलाके में सिर्फ एक रैली और एक रोड शो करेंगे. जम्बूसर में राहुल के मंच पर पहुंचते ही एलान हुआ कि क्षेत्र के संत महंत सबसे पहले राहुल को पूजा अर्चना कराएंगे और आशीर्वाद देंगे. आनन फानन में ऐसा किया भी गया. ये अपने आप में देखने वाला था कि जिस रैली में अधिकतर अल्पसंख्यक नजर आ रहे थे, वहां मंच पर राहुल के भाषण से पहले पूजा-अर्चना कांग्रेस और राहुल की सियासत का रुख साफ बता रही थी.

जम्बूसर में रैली के बाद राहुल का काफिला आदिवासी बहुल इलाके के लिए रवाना हुआ. रास्ते में कई जगह अल्पसंख्यक इलाकों में सड़क चौराहों पर उमड़ी भीड़ के बावजूद राहुल सिर्फ अभिवादन करते हुए आगे बढ़ जाते हैं. अमूमन राहुल इस तरह की जगह देख कर जहां ज्यादा लोग इकट्ठा हों तो अपनी बस से माइक निकाल कर कुछ ना कुछ कहते जरूर हैं. लेकिन बुधवार को अल्पसंख्यक बहुल इलाके में उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया. भीड़ के बावजूद राहुल के हाव-भाव से यही लगा कि वे इस इलाके में महज अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर तेजी से आगे बढ़ना चाहते हैं.

कांग्रेस बेशक खुद को धर्म या जात-पांत की राजनीति से दूर बताती है. लेकिन इस बार गुजरात में वो सॉफ्ट हिंदुत्व के कार्ड को मजबूती से सीने से चिपका कर आगे बढ़ने के मूड में है. राहुल गुजरात यात्राओं में मंदिरों या नवदुर्गा पंडालों में जाना जिस तरह नहीं भूल रहे उस तरह वो अल्पसंख्यकों के धर्मस्थलों के लिए नहीं कर रहे.

कांग्रेस की इसी रणनीति के तहत पार्टी के कद्दावर नेता और सोनिया के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल ने गुजरात चुनाव में खुद को पूरी तरह बैकफुट पर रखा हुआ है. गुजरात से ही ताल्लुक रखने वाले अहमद पटेल  राहुल की पहली दो यात्राओं से पूरी तरह दूर रहे. राहुल की तीसरी यात्रा जब अहमद पटेल के गृह जनपद भरूच से शुरू हुई, तो वे नजर आए. लेकिन अहमद पटेल की पूरी कोशिश यही रही कि उन पर कोई फोकस ना आए. इसीलिए इक्का दुक्का जगह पर ही उन्होंने राहुल के मंच से छोटा भाषण दिया, वो भी गुजराती में. ज़्यादातर जगहों पर भले ही वो मंच पर बैठे लेकिन उन्होंने खुद ही भाषण देने से दूरी बनाए रखी. एक जगह तो राहुल ने उनसे गुज़ारिश की तब जाकर उन्होंने महज 5 मिनट का भाषण गुजराती में ही दिया.

राहुल गुजरात के इस दौरे में अल्पसंख्यक बहुल इलाके में प्रचार के ठीक अगले दिन उनायी माता के दर्शन करने जाएंगे. कांग्रेस फूंक फूंक कर कदम आगे बढ़ा रही है. कांग्रेस की पूरी कोशिश है कि बीजेपी को कहीं से भी ये मौका ना मिले कि वो उसके सॉफ्ट हिंदुत्व के कार्ड पर पानी फेरने का प्रयास करे. यही वजह है कि राहुल मंदिरों के दर्शन और परिक्रमा में पूरा जोर लगा रहे हैं.  

कुल मिलाकर कांग्रेस का दांव साफ है कि चुनाव संग्राम में अगर वो बहुसंख्यक मतदाताओं को लेकर  बीजेपी से गुजरात में मुकाबला करने में कामयाब होती है तो अल्पसंख्यक मतदाता तो उसका साथ दे ही देंगे. कांग्रेस की इस रणनीति से यही लगता है कि वो कहीं ना कहीं मानती है कि गुजरात के  पिछले चुनावों में मुस्लिम तुष्टिकरण के इल्ज़ाम के चलते ध्रुवीकरण का शिकार होकर वो हारती रही है. यही वजह है कि कांग्रेस का हाथ गुजरात में सॉफ्ट हिंदुत्व के साथ नजर आ रहा है.

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