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जो नहीं दे पाया था 25 रुपये स्कूल की फीस, आज है करोड़ों का मालिक

ये कहानी है 'कॉरपोरेट 360' के संस्थापक और सीईओ वरुण चंद्रन की. उनकी जिंदगी में एक दौर ऐसा भी था जब 25 रुपये की फीस न दे पाने के कारण उन्हें क्लास से बाहर कर दिया गया था और आज वो करोड़ों के मालिक हैं.

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'कॉरपोरेट 360' के संस्थापक और सीईओ वरुण चंद्रन
'कॉरपोरेट 360' के संस्थापक और सीईओ वरुण चंद्रन

बचपन जमीन पर सोकर और आर्थिक तंगी में गुजारने वाले इस बच्चे ने कभी सोचा नहीं होगा कि वो एक दिन मल्टीनेशनल कंपनी का मालिक बनेगा. हम बात कर रहे हैं वरुण चंद्रन की.

एक समय में इनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि उनके पास स्कूल की फीस भरने के भी पैसे नहीं थे. लेकिन कौन जानता था कि महज 25 रुपये फीस न भर पाने की वजह से स्कूल से निकाले जाने वाले वरुण एक दिन करोड़ों के मालिक बन जाएंगे.

कौन हैं वरुण
वरुण चंद्रन का जन्म केरल के कोल्लम जिले में एक जंगल के पास बसे छोटे-से गांव पाडम में हुआ. उनके पिता एक किसान थे और मां घर पर ही किराने की छोटी-सी दुकान भी चलाती थी. इस तरह बड़ी ही दिक्कतों का सामना करते हुए वरुण ने अपना बचपन गुजारा. पिता की मदद के लिए कम उम्र में ही उन्होंने

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पढ़ाई में आईं कई अड़चने
भले ही वरुण के माता-पिता ने केवल पांचवी कक्षा तक ही पढ़ाई की थी लेकिन वे चाहते थे कि वरुण पढ़ाई में आगे निकले. उनका सपना था कि वरुण हायर एजुकेशन हासिल कर एक अच्छी नौकरी करें, ताकि उनकी जिंदगी में उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना न करना पड़े.

पैसों की दिक्कत के कारण अक्सर वरुण को क्लास से बाहर निकाल दिया जाता था. चेहरे का रंग काला होने के चलते कई बार कक्षा में लोग उन्हें 'काला कौआ' भी कहकर चिढ़ाते थे. इस तरह कई बार उन्हें दूसरे के बीच अपमानित भी होना पड़ता था लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी.

फुटबॉल खेलने का था शौक
वरुण को फुटबॉल खेलने का शौक था. हमेशा फुटबॉल ग्राउंड पर बहुत ही अच्छा प्रदर्शन करने के चलते वरुण ने कई पदक और पुरस्कार भी जीते. बता दें कि जूते न होने की वजह से उन्होंने कई दिनों तक नंगे पांव ही फुटबॉल खेला था. कड़ी लगन और मेहनत से जल्द ही वह स्कूल की फुटबॉल टीम के कैप्टन बन गए. धीरे-धीरे लोगों का उनके प्रति नजरिया बदला और लोगों को वरुण में चैंपियन नजर आने लगा.

जिंदगी एक नई दिशा ले ही रही थी कि एक दिन मैदान में फुटबॉल के अभ्यास के दौरान वरुण एक दुर्घटना का शिकार हुए और उनके कंधे की हड्डी टूट गई. इस चोट की वजह से फुटबॉल खेलना बंद हुआ और कॉलेज की पढ़ाई छूट गई.

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मां का आशीर्वाद लेकर बंगलुरु पहुंचे वरुण
मुसीबतों का संकट एक साथ आ पड़ा. ऐसे में उनकी वरुण को दिए और नौकरी या फिर कोई और काम ढूंढने की सलाह दी. इसी के साथ वरुण मां का आशीर्वाद लेकर बंगलुरु चले आए. वहां जाकर बंगलुरु में वरुण के गांव के ही एक ठेकेदार ने उनकी मदद की और अपने मजदूरों के साथ उनके रहने का इंतजाम किया.

कॉल सेंटर में की जॉब
ग्रामीण इलाके से होने के चलते वरुण को अंग्रेजी नहीं आती थी. जिसकी वजह से नौकरी पाने में दिक्कतें आने लगी. धीरे-धीरे उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से अंग्रेजी सीखी और कॉल सेंटर में नौकरी पा ली. इसी बीच उन्हें से नौकरी का ऑफर मिला. इस कंपनी में वरुण को बतौर बिजनेस डेवलपमेंट एग्जीक्यूटिव नौकरी मिली. वहां उनके काम से लोग इतने खुश और संतुष्ट हुए कि उन्हें अमेरिका भेजने का फैसला किया.

पहले साल में ही ढाई लाख डॉलर की आमदनी
आगे चलकर वरुण ने सैप और फिर सिंगापुर में ऑरेकल कंपनी में नौकरी हासिल की. अमेरिका की सिलिकॉन वैली में काम करते हुए वरुण के मन में नए-नए विचार आने लगे. वरुण ने भी फैसला किया कि वे अपना खुद का काम शुरू करेंगे.

वरुण ने काम आसान करने के मकसद से एक सॉफ्टवेयर टूल की कोडिंग शुरू की. इसके बाद उन्होंने अपना किया. वरुण की कंपनी को पहला ऑर्डर 500 डॉलर का ब्रिटेन के एक ग्राहक की ओर से मिला. कंपनी ने ऐसी रफ्तार पकड़ी की पहले ही साल में उसने ढाई लाख डॉलर की आमदनी की.

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एक करोड़ डॉलर की कंपनी बनने का लक्ष्य
वरुण ने अपनी कंपनी का ऑपरेशंस सेंटर अपने गांव के पास पाथनापुरम में स्थापित किया, जहां स्थानीय लोगों को भी रोजगार मिला. आज बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां उनकी क्लाइंट हैं. वरुण का लक्ष्य वर्ष 2017 तक अपनी कंपनी को बनाने का है.

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