बंबई का ताज होटल. उस दिन वहां वकीलों की एक कांफ्रेंस होने वाली थी. चालीस साल का एक शख्स अपने कुछ साथियों के साथ कमरे में बैठा था तभी लॉबी में कुछ हलचल सुनाई देने लगीं. रिसेप्शन के पास चल रहे टीवी के सामने छोटा सा हुजूम जुट गया. अचानक आसपास के रेडियो की आवाज़ें तेज़ हो गईं. ख़बर बंबई से 1400 किमी. दूर इलाहाबाद हाईकोर्ट से आ रही थी जहां देश भर के रिपोर्टरों का मजमा लगा था. हर कोई उस वकील का बयान लेने को आतुर था, जो अपने दोस्तों के साथ ताज होटल के कमरे में बाहरी दुनिया से बेखबर बैठा था.
ताज होटल के रिसेप्शन पर घंटी बजने लगी... हैलो, ताज़ होटल... आपके यहां वकीलों की कांफ्रेंस होने वाली है ना, वो लोग जहां भी हैं मुझे उनसे तुरंत बात करनी है, इट्स अर्जेंट.
रिसेप्शनिस्ट ने कॉल को वकीलों से भरे उस रूम में ट्रांसफर कर दिया.
एक वकील ने फोन उठाया और बोला- शांति सर... आपके लिए फोन है.
हेलो..
हेलो, शांति सर, बधाई हो, केस जीत गए आप. इंदिरा गांधी को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दोषी ठहरा दिया. अब छह साल तक चुनाव नहीं लड़ सकतीं. ‘नामी गिरामी’ में सुनने के लिए क्लिक करें.
इलाहाबाद में उन दिनों भारत छोड़ो आंदोलन उरूज़ पर था. शहर के कई नेता अब तक जेल में थे और कई आंदोलन की कमान संभाले थे. ठीक इसी वक्त आज़ादी की लड़ाई से दूर उसी शहर में 18 साल का एक लड़का अपने पिता से ज़िद्द कर रहा था. वो पिता की ही तरह वकालत पढ़ना चाहता था. पिता बार-बार समझाते - शांति, तुम बीएससी में अच्छा कर रहे हो तो फिर ये वकालत क्यों, अगर मैं वकील हूँ, इसका मतलब ये नहीं कि तुम भी वकालत करो.
मगर पिता की बातों को नजरअंदाज कर रहे उस लड़के का एक ही जवाब होता- पापा, मुझे कोर्ट के अंदर जाना, वहां दलीलें सुनना पसंद है. बस इसीलिए मुझे वकालत करनी है.
लड़के की हठ देख कर वकील साहब उसे अपने दोस्त और देश के सबसे मशहूर वकीलों में एक तेज बहादुर सप्रू के पास ले गए. सोचा कि सप्रू समझाएंगे तो शायद लड़का ज़िद्द छोड़ दे. तेज बहादुर सप्रू को सारा माज़रा बताया गया. बहुत सोच विचार के बाद सप्रू साहब ने लड़के को बुलाया और पूछा- शांति, तुम्हारा मन क्या सच में वकालत करने का है.
शांति का जवाब हां था. इतना सुनते ही सप्रू साहब अपनी जगह से खड़े हुए, पिता की तरफ देखा और बोले- तो बस तय हो गया. अगर शांति का मन वकालत करने का है तो ये वकालत ही करेगा, बीएससी नहीं. कल से ही तुम मेरे अंडर अपनी ट्रेनिंग शुरू करोगे शांति.
इस घटना के कई दशको बाद देश ने शांति नाम के इस लड़के को वकील शांति भूषण के नाम से जाना जिसने अपने करियर के शीर्ष समय में प्रधानमंत्री तक का सिंहासन हिला दिया. ‘नामी गिरामी’ में सुनने के लिए क्लिक करें.
इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे शांति भूषण शुरुआती दिनों से ही सहयोगियों के बीच काफी लोकप्रिय थे. इसका कारण थी उनकी वाकपटुता.
उन्हीं दिनों का एक किस्सा शांति भूषण ने अपनी आत्मकथा में बताया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तय किया था कि जजों और वकीलों के बीच हर साल एक मैच कराया जाएगा. 1953 के मैच में सतीश चंद्रा नाम के वकील विकेटकीपिंग कर रहे थे. गेंद लपकने की कोशिश में दस्तानों से गेंद फिसली और उनके जबड़े पर जा लगी. जबड़ा टूट गया. सब उन्हें ले कर अस्पताल भागे. मरहम पट्टी के बाद पता चला कि अगली रोज़ सतीश चंद्रा को एक केस की हियरिंग में जाना है. अब घायल सतीश तो हियरिंग में जाने से रहे. एक ही रास्ता था कि केस को टालने की अपील की जाए. एक वकील ने कहा- अरे सुनो... शांति भूषण के पास चलो, वो सतीश के केस के लिए लिए कोर्ट से वक्त मांग लेगा . शांति तक ये बात पहुंची तो उनका सबसे पहला सवाल था- आखिर मैं ही क्यों...
एक साथी का जवाब था- क्योंकि तुम सतीश चंद्रा की तरफ से दलील बेहतर ढंग से रखोगे. बस इसलिए.
शांति तैयार हो गए. अगले दिन शांति चीफ जस्टिस के सामने खड़े हुए और बोले- माय लॉर्ड. अनफॉर्चूनेटली कल एक दुखद घटना घटी. क्रिकेट खेलते वक्त वकील सतीश चंद्रा चोटिल हो गए. इसलिए ये मेरी आपसे प्रार्थना है कि इस केस को एक हफ्ते के लिए टाल दें.
सामने बैठे सारे जज उस मैच में मौजूद थे, और कल की घटना से वाकिफ भी, बावजूद इसके जस्टिस मलिक ने कहा- ओह, तो क्या कल मिस्टर सतीश चंद्रा विकेटकीपिंग कर रहे थे. हमें बहुत बुरा लगा ये सुन कर. हम उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना करते हैं और इस केस को दो हफ्ते के लिए अडर्जन करते हैं.
हियरिंग के बाद जब ये घटना शांति ने अपने साथियों को बताई तो वो ठहाके मार मार कर हंसने लगे. इसी तरह की एक घटना है शांति भूषण से जुड़ी हुई जो उन्होंने अपनी किताब Courting Destiny: A Memoir में बताई थी..
शांति भूषण ने अपनी आत्मकथा में लिखा था कि वो जब मिनिस्टर ऑफ अफेयर्स थे तो एक बुजुर्ग उनसे मिलने आए. उनकी पत्नी का इंतकाल हो गया था काफी सालों पहले. उन्होंने शांति भूषण से कहा कि मैंने आपके बारे में सुना कि आप अफेयर्स के मिनिस्टर हैं. शांति को ये सुन कर बड़ा अजीब लगा तो उन्होंने कहा कि आपको क्या काम है ये बताइए.. तो वो बुजुर्ग ने गुस्साई नज़रों से शांति भूषण को घूरा और बोले- अगर आप मिनिस्टर ऑफ अफेयर्स संभाल रहे हैं तो मेरे अफेयर्स की ज़िम्मेदारी कौन लेगा. मैं कई सालों से अकेला हूँ और मेरा अफेयर भी नहीं हो रहा.
शांति जी ने जब ये सुना तो हंस पड़े, फिर उन्होंने उनकी शंका दूर की कि ये वो मिनिस्टर ऑफ अफेयर्स नहीं है जो सोच रहे हैं. इसके बाद जब वो उन्हें कोसते हुए वहां से गए थे कि शांति जी ने उनका काम नहीं कराया
ये समय कांग्रेस के भीतर पनप रहे आंतरिक मतभेदों का भी था. इंदिरा को प्रधानमंत्री बनाने वाले कामराज खुद उनके खिलाफ़ हो गए थे. प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा पाले बैठे मोरारजी देसाई इस मौके का फायदा उठाना चाहते थे, उन्होंने इंदिरा के खिलाफ बिगुल फूंक दिया. पार्टी के कई बड़े नेता इंदिरा को सर्वेसर्वा मानने से इंकार करने लगे. इस विरोध ने पार्टी में टूट का रूप ले लिया. कांग्रेस दो धड़ों में बंट गई. एक थी कांग्रेस- आई, जिसकी कमान इंदिरा के हाथों में थी. दूसरी थी मोरारजी देसाई की कांग्रेस ओ. इसी धड़े में एक नाम शांति भूषण का भी था. इंदिरा ने राष्ट्रपति वीवी गिरी से लोकसभा भंग कर 1971 के शुरुआती महीनों में चुनाव कराने का आग्रह किया. ऐसा ही हुआ. 1971 का मार्च लोकसभा चुनाव लिए चुना गया. इंदिरा गांधी ने रायबरेली से पर्चा भरा. कांग्रेस ओ किसी भी सूरत में इंदिरा को जीतते हुए देखना नहीं चाहती थी. पार्टी ने तय किया कि इंदिरा के खिलाफ मैदान में राज नारायण को उतारा जाए, एक नेता जिसने आज़ादी की लड़ाई को करीब से देखा था. राज नारायण को यकीन था कि इंदिरा उनके सामने नहीं टिकने वालीं, मगर जब नतीजे आए तो सब हैरान. राज नारायण इंदिरा से एक लाख से भी ज्यादा वोटों के अंतर से हार गए थे. राज नारायण ने खुले तौर पर इस हार से असहमति जताई और इंदिरा को चेताया- जिस दिन न्याय हुआ, तुम्हें कुर्सी छोड़नी होगी.
वो तुरंत शांति भूषण के पास गए. घंटों चर्चा के बाद तय हुआ कि इंदिरा गांधी के खिलाफ़ राज नारायण इलाहाबाद हाई कोर्ट का रूख करेंगे और इस केस की कमान शांति भूषण के हाथ होगी. याचिका दायर की गई कि इंदिरा ने चुनाव में नौकरशाहों की मदद ली है, कलेक्टर समेत कई सरकारी कर्मचारियों ने इंदिरा के पक्ष में काम किया है. याचिका स्वीकार कर ली गई. इन्हीं दिनों बाज़ार में एक कांस्पिरेसी भी फैली. कहा जाने लगा कि इंदिरा गांधी ने रूस से केमिकल बैलेट पेपर मंगवाए हैं जिसमें उनके चुनाव चिन्ह पर पहले से वोट का निशान छपा है, किसी और चुनाव चिन्ह के सामने वोट का ठप्पा यदि लगाओ भी तो वो थोड़ी देर बाद मिट जाता है. इन्हीं सब हवाबाज़ी के बीच कोर्ट की सुनवाई शुरु हुई. इंदिरा का मुकदमा एस.सी खरे लड़ रहे थे. उन्होंने इंदिरा का बचाव करते हुए सारे आरोपों को फर्जी बता दिया, लेकिन तभी शांति भूषण ने कोर्ट के सामने ब्लू बुक का मुद्दा छेड़ दिया. ब्लू बूक... एक ऐसी किताब जिसमें पीएम की सुरक्षा से जुड़ी गाइडलाइन रहती हैं. शांति भूषण ने कहा कि इंदिरा ने ब्लू बूक के नियमों का उल्लंघन किया है और मैं ये साबित कर सकता हूँ. मेरी सरकार से अपील है कि ब्लू बुक के दस्तावेजों को कोर्ट के सामने पेश करें. मगर ऐसा करने से सरकार ने इंकार कर दिया. सरकार के इस रवैये ने शांति भूषण को एक और मौका दे दिया. उन्होंने कोर्ट से कहा- माय लार्ड क्या इंदिरा गांधी खुद को अदालत से भी ऊपर समझती हैं. किसी केस में क्या करना है.. ये फैसला सिर्फ चीफ जस्टिस ले सकते हैं ना कि सरकार.
शांति भूषण की दलील काम कर गई. कोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी कर दिया और हू-ब-हू वही बात कही जो शांति ने कही थी.
ब्लू बूक इंदिरा के लिए काल साबित होने वाली थी जिसकी ख़बर खुद इंदिरा तक को नहीं थी. ‘नामी गिरामी’ में सुनने के लिए क्लिक करें.
शांति भूषण के कहने पर जब सरकार ने ब्लू बूक पेश की तो मालूम चला कि उसमें इंदिरा गाँधी ने बदलाव किए थे. नेहरू के वक्त उसमें ये प्रावधान था कि डीएम प्रधानमंत्री की हर विजिट की तैयारी का जिम्मा लेगा लेकिन सिर्फ चुनाव में वो प्रधानमंत्री की किसी भी विजिट का जिम्मा नहीं लेगा और न ही उनके लिए काम करेगा. मगर ये नियम इंदिरा के वक्त उस रूल बुक में था ही नहीं. इंदिरा के वकील एस सी खरे ने इंदिरा गांधी को कोर्ट में विटनेस के तौर पर पेश करने की इजाजत मांगी. शांति को लगा कि एस सी खरे ऐसा कोर्ट पर दवाब बनाने के लिए कर रहे रहें, लेकिन उनके पास भी एक ही रास्ता था कि वो इंदिरा गांधी को क्रॉस एग्जामिन करें. 18,19 और 20 मार्च को इंदिरा को कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया गया. क्रॉस एग्जामिन के वक्त जब शांति भूषण ने इंदिरा से पूछा कि ये जो चेजेंज दिख रहे है ब्लू बूक में वो क्या आपके आदेश पर हुए हैं, तो इंदिरा गांधी को लगा कि अगर उन्होंने ना कहा तो केस उनके खिलाफ हो जाएगा, इसलिए उन्होंने हां कह दिया. और उनके इस हां ने शांति भूषण की दलील को साबित कर दिया कि इंदिरा ने चुनाव जीतने के लिए सरकारी नौकरशाही की मदद ली थी.
लेकिन ये तो बस शुरुआत थी क्योंकि शांति भूषण का अगला दांव इंदिरा के लिए और भारी साबित होने वाला था. शांति इंदिरा के सामने गए और सवाल किया- प्रधानमंत्री जी, क्या आप कोर्ट को बताएँगी कि आपने राय बरेली से अपना पर्चा कब भरा था
इंदिरा का जवाब था- फरवरी 1971 तक मैं श्योर नहीं थी कि मैं रायबरेली से लड़ूंगी या नहीं तो मिड फरवरी के बाद ही मैंने वहां के लिए पर्चा भरा.
शांति भूषण ने कोर्ट से तारीख नोट करने के लिए कहा और अगले दिन की सुनवाई का इंतज़ार करने लगे. शांति भूषण ने कोर्ट के सामने एक सरकारी दस्तावेज पेश किया और इंदिरा को दिखाते हुए बोले- मैडम प्राइम मिनिस्टर क्या ये दस्तखत आपके हैं
जी... इंदिरा ने जवाब दिया
तो फिर आपने इसे पढ़ा भी होगा
इंदिरा ने वापस से हां में जवाब दिया.
तो इस दस्तावेज की ये लाइन पढ़ें. इतना कहते ही शांति भूषण ने फाइल इंदिरा को थमा दी.
इंदिरा ने वो लाइन पढ़नी शुरु की और एक जगह आकर अटक गईं जहां लिखा था कि पार्टी ने 29 जनवरी 1971 को ही तय कर दिया था कि इंदिरा रायबरेली से चुनाव लड़ेंगी जिसपर उन्होंने दस्तखत भी कर रखा था.
इंदिरा के इतना कहते ही शांति ने तुरंत कहा- मैडम प्राइम मिनिस्टर क्या आप कोर्ट को बताएंगी कि आपने जो तारीख कल कोर्ट में कही वो सही तारिख थी या फिर जो इस दस्तावेज में दर्ज है वो तारीख सही है.
इंदिरा हड़बड़ा गईं. शांति भूषण ने कहा- माय लार्ड मैडम प्राइम मिनिस्टर ने कोर्ट के सामने झूठ बोला है. इसी तरह इनकी कही कई बातें झूठी ही होंगी.
इंदिरा ने कुछ नहीं कहा. 12 जून 1975 को फैसला आया. इंदिरा केस हार चुकी थीं. कोर्ट ने उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बने रहने को कहा लेकिन छह साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया. इंदिरा अपनी शक्तियों का छिन जाना बर्दाश्त न कर सकीं और इस फैसले के 12 दिन बाद इमरजेंसी का ऐलान हो गया. करीब दो साल बाद इमरजेंसी हटी. चुनाव हुए. जनता पार्टी की सरकार बनी, जिसके कानून मंत्री थे... शांति भूषण. ‘नामी गिरामी’ में सुनने के लिए क्लिक करें
6 साल बाद 1986 में शांति भूषण ने बीजेपी का साथ छोड़ दिया. इसके बाद राजनीति से भी दूरी बना ली. हालांकि इसके बाद अलग अलग केसेज़ को लेकर वो हमेशा चर्चा में बने रहे, इनमें से ही एक केस था 1993 बंबई बम ब्लास्ट का जब 1994 में शांति भूषण ने दो आरोपियों का केस अपने हाथ में लिया था. इसके बाद अन्ना आंदोलन से उनके जुड़ाव ने उन्हें और उनके बेटे प्रशांत भूषण को चर्चा का केंद्र बनाया. आम आदमी पार्टी से भी वो जुड़े रहे लेकिन कुछ साल बाद ही उनका केजरीवाल से मोह भंग हो गया, आज तक से बातचीत के दौरान इसपर उन्होंने अपनी बात रखी थी. ‘नामी गिरामी’ में सुनने के लिए क्लिक करें