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पुण्यतिथि पर विशेषः पढ़ें-कैसे रची गई थी राजीव गांधी की हत्या की साजिश

21 मई 1991 को राजीव गांधी के रूप में देश ने अपने सबसे युवा प्रधानमंत्री रहे नेता को खो दिया. श्रीपेरंबदूर में एक धमाके में राजीव गांधी की मौत हो गई. पढ़ें आज से ठीक 26 साल पहले कैसे रची गई राजीव गांधी की हत्या की इस सबसे बड़ी साजिश और किसने और कैसे दिया अंजाम.

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राजीव गांधी राजीव गांधी

21 मई 1991 को राजीव गांधी के रूप में देश ने अपने सबसे युवा प्रधानमंत्री रहे नेता को खो दिया. श्रीपेरंबदूर में एक धमाके में राजीव गांधी की मौत हो गई. पढ़ें आज से ठीक 26 साल पहले कैसे रची गई राजीव गांधी की हत्या की इस सबसे बड़ी साजिश और किसने और कैसे दिया अंजाम.

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जाफना,श्रीलंका (नवंबर 1990)

घने जंगलों के बीच एक आतंकी ठिकाने में प्रभाकरण बैठा था. उसके साथ बैठे थे उसके चार साथी. बेबी सुब्रह्मण्यम, मुथुराजा, मुरूगन और शिवरासन. एक बड़ी साजिश बन रही थी. घंटों तनाव के बीच चली बैठक. हर आदमी अपना पक्ष रख रहा था. बेहद गोपनीय इस बैठक में तनाव इतना था कि हवा भी बम की आवाज की तरह लग रही थी. उमस और गर्मी के बीच प्रभाकरण बहुत तेजी से सुन और बुन रहा था. आखिर साजिश पूरी हो गई. प्रभाकरण ने राजीव गांधी की मौत के प्लान पर मुहर लगा दी. प्लान को पूरा करने की जिम्मेदारी चार लोगों को सौंपी गई.

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बेबी सुब्रह्मण्यम- लिट्टे आइडियोलॉग, हमलावरों के लिए ठिकाने का जुगाड़.

मुथुराजा- प्रभाकरण का खास, हमलावरों के लिए संचार और पैसे की जिम्मेदारी.

मुरुगन- विस्फोटक विशेषज्ञ, आतंक गुरू, हमले के लिए जरूरी चीजों और पैसे का इंतजाम.

शिवरासन- लिट्टे का जासूस, विस्फोटक विशेषज्ञ, राजीव गांधी की हत्या की पूरी जिम्मेदारी.

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दुनिया के सबसे खूंखार आतंकवादी प्रभाकरण से राजीव की हत्या का फरमान लेने के बाद बेबी सुब्रह्मण्यम और मुथुराजा 1991 की शुरुआत में चेन्नई पहुंचे. इनके जिम्मे था बेहद अहम और शुरुआती काम. बेबी और मुथुराज को चेन्नई में ऐसे लोग तैयार करने थे जो मकसद से अंजान होते हुए भी डेथ स्क्व्यॉड की मदद करें. खासतौर पर राजीव गांधी के हत्यारों के लिए हत्या से पहले रुकने का घर दें और हत्या के बाद छिपने का ठिकाना.

बेबी सुब्रह्मण्यम और मुथुराजा चेन्नई में सीधे शुभा न्यूज फोटो एजेंसी पहुंचे. एजेंसी का मालिक शुभा सुब्रह्मण्यम इलम समर्थक था. शुभा सुब्रह्मण्यम के पास दोनों की मदद का पैगाम बेबी और मुथुराजा के पहुंचने से पहले ही आ चुका था. शुभा को साजिश के लिए लोकल सपोर्ट मुहैया कराना था. यहां पहुंच कर बेबी और मुथुराजा ने अपने अपने टारगेट के मुताबिक अलग-अलग काम करना शुरू कर दिया. बेबी सुब्रह्मण्यम ने सबसे पहले शुभा न्यूज फोटो एजेंसी में काम करने वाले भाग्यनाथन को अपने चंगुल में फंसाया. राजीव हत्याकांड में सजा भुगत रही नलिनी इसी भाग्यनाथन की बहन है जो उस वक्त एक प्रिंटिंग प्रेस में काम करती थी. भाग्यनाथन और नलिनी की मां नर्स थी. नर्स मां को इसी समय अस्पताल से मिला घर खाली करना था. मुश्किल हालात में घिरे भाग्यनाथन और नलिनी को आतंकी बेबी ने पैसे और मदद के झांसे में लिया. बेबी ने एक प्रिंटिंग प्रेस भाग्यनाथन को सस्ते में बेच दिया. इससे परिवार सड़क पर आने से बच गया. बदले में नलिनी और भाग्यनाथन बेबी के प्यादे हो गए. साजिश का पहला चरण था समर्थकों का नेटवर्क बनाना जो शातिर दिमागों में बंद साजिश को धीरे-धीरे अंजाम तक पहुंचाने में मददगार साबित हों पर बिना कुछ जाने.

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एक तरफ बेबी सुब्रह्मण्यम चेन्नई में रहने के सुरक्षित ठिकाने बना रहा था तो मुथुराजा बेहद शातिर तरीके से लोगों को अपनी क्रूर साजिश के लिए चुन रहा था. चेन्नई की शुभा न्यूज फोटो एजेंसी में काम करने वाले इन शैतानों के लिए वरदान बन गए थे. यहीं से मुथुराजा ने दो फोटोग्राफर रविशंकरन और हरिबाबू चुने.

रविशंकरन और हरिबाबू दोनो शुभा न्यूज फोटोकॉपी एजेंसी में बतौर फोटोग्राफर काम करते थे. हरिबाबू को नौकरी से निकाल दिया गया था. मुथुराजा ने हरिबाबू को विज्ञानेश्वर एजेंसी में नौकरी दिलाई. श्रीलंका से बालन नाम के एक शख्स को बुला कर हरिबाबू का शागिर्द बनाया. इससे हरिबाबू को काफी पैसा मिलने लगा और उसका झुकाव मुथुराजा की तरफ बढ़ने लगा. मुथुराजा ने अहसान के बोझ तले दबे हरिबाबू को राजीव गांधी के खिलाफ खूब भड़काया कि अगर वो 1991 के लोकसभा चुनाव में जीत कर सत्ता में आए तो तमिलों की और दुर्गति होगी.

राजीव की हत्या के लिए साजिश की एक एक ईंट जोड़ी जा रही थी. श्रीलंका में बैठे मुरूगन ने इस बीच जय कुमारन और रॉबर्ट पायस को चेन्नई भेजा. ये दोनों पुरूर के साविरी नगर एक्सटेंशन में रुके. यहां जयकुमारन का जीजा लिट्टे बम एक्सपर्ट अरीवेयू पेरूलीबालन 1990 से छिप कर रह रहा था. इन दोनों को श्रीलंका से चेन्नई भेजने का मकसद था अर्से से चुपचाप पड़े कंप्यूटर इंजीनियर और इलेक्ट्रॉनिक एक्सपर्ट अरीवेयू पेरूलीबालन को साजिश में शामिल करना ताकि वो हत्या का औजार बम बना सके. आगे चलकर पोरूर का यही घर राजीव गांधी हत्याकांड के प्लान का हेडक्वार्टर बन गया. यहीं से चलकर पूरी साजिश श्रीपेरंबदूर तक पहुंची थी.

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शातिर सूत्रधार जुड़ने वाले हर शख्स के दिमाग में राजीव गांधी के खिलाफ भीषण नफरत भी पैदा कर रहा था. उन्हें पता था कि भयंकर नफरत के बिना भीषण घिनौनी साजिश अंजाम तक नहीं पहुंचेगी. जब बेबी और मुथुराजा ने अपने अपने चार लोग जोड़ लिए तो साजिश में मुरूगन की एंट्री हुई.

मुरुगन ने चेन्नई पहुंच कर बहुत रफ्तार में साजिश को अंजाम की ओर लाने की कोशिशें तेज कीं. मुरूगन के इशारे पर जयकुमारन और पायस. नलिनि-भाग्यनाथन-बेबी-मुथुराजा के ठिकाने पर पहुंच गए. राजीव गांधी विरोधी भावनाएं लोगों के दीमाग में भरी जाने लगीं. नलिनी राजीव गांधी के खिलाफ पूरी तरह तैयार हो गयी थी. नलिनि जिस प्रिटिंग प्रेस में नौकरी करती थी वहां छप रही एक किताब सैतानिक फोर्सेस ने उसके ब्रेनवॉश में अहम भूमिका निभाई. ब्रेनवॉश के साथ मुरूगन ने हत्यारों की नकली पहचान तैयार करने के लिए जयकुमारन और पायस की मदद से फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस बनवाया.

मुरूगन, मुथुराजा और बेबी ने मिलकर चेन्नई में छिपने के तीन महफूज ठिकाने खोज लिए. अरवियू के तौर पर एक बम बनाने वाला तैयार था. राजीव के खिलाफ नफरत से भरे नलिनी पदमा और भाग्यनाथन की ओट तैयार थी. शुभा सुब्रह्मण्यम जैसा आदमी मुहैया कराने वाला तैयार था. अब शिवरासन को संदेशा भेजा गया. मार्च की शुरूआत में वो समुद्र के रास्ते चेन्नई पहुंचा. वो पोरूर के इसी इलाके में पायस के घर में रुका.

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पोरूर ही राजीव गांधी की हत्या की साजिश का कंट्रोलरूम बन गया. शिवरासन के पोरूर पहुंचते ही जाफना के जंगलों की साजिश का जाल पूरा हो गया. शिवरासन ने कमान अपने हाथ में ले ली. बेबी औऱ मुथुराज को श्रीलंका वापस भेज दिया गया. चेन्नई में नलनी,मुरूगन और भाग्यनाथन के साथ शिवरासन ने मानवबम खोजा पर वो नहीं मिला. शिवरासन ने अरीवेयू पेरुली बालन के बम की डिजायन को चेक किया, शिवरासन खुद अच्छा विस्फोटक एक्सपर्ट था. सारी तैयारी को मुकम्मल देख मानवबम के इतंजाम में शिवरासन फिर समुद्र के रास्ते जाफना वापस गया वहां वो प्रभाकरण से मिला. उसने प्रभाकरन को बताया कि भारत में मानवबम नहीं मिल रहा है. इसपर प्रभाकरन ने शिवरासन की चचेरी बहनों धनू और शुभा को उसके साथ भारत के लिए रवाना कर दिया.

धनू और शुभा को लेकर शिवरासन अप्रैल की शुरूआत में चेन्नई पहुंचा. धनू और शुभा को वो नलिनी के घर ले गया. यहां मुरूगन पहले से मौजूद था. शिवरासन ने बेहद शातिर तरीके से पायस- जयकुमारन-बम डिजायनर अरिवू को इनसे अलग रखा और खुद पोरूर के ठिकाने में रहता रहा. वो समय-समय पर सबको सही कार्रवाई के निर्देश देता था. अब चेन्नई के तीन ठिकानों में राजीव गांधी हत्याकांड की साजिश चल रही थी. शिवरासन ने टारगेट का खुलासा किए बिना बम एक्सपर्ट अऱिवू से एक ऐसा बम बनाने को कहा जो महिला की कमर में बांधा जा सके.

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शिवरासन के कहने पर अरिवू ने एक ऐसी बेल्ट डिजाइन की जिसमें छह आरडीएक्स भरे ग्रेनेड जमाए जा सके. हर ग्रेनेड में अस्सी ग्राम सीफोर आडीएक्स भरा गया. हर ग्रेनेड में दो मिली मीटर के दो हजार आठ सौ स्पिलिंटर हों. सारे ग्रेनेड को सिल्वर तार की मदद से पैरलल जोड़ा गया. सर्किट को पूरा करने के लिए दो स्विच लगाए गए. इनमें से एक स्विच बम को तैयार करने के लिए और दूसरा उसमें धमाका करने के लिए था और पूरे बम को चार्ज देने के लिए 9 एमएम की बैटरी लगाई गई. ग्रेनेड में जमा किए गए स्प्रिंटर कम से कम विस्फोटक में 5000 मीटर प्रतिसेकेंड की रफ्तार से बाहर निकलते यानी हर स्प्रिंटर एक गोली बन गया था. बम को इस तरह से डिजायन किया गया था कि आरडीएक्स चाहे जितना कम हो अगर धमाका हो तो टारगेट बच न सके और वही हुआ भी.

अब शिवरासन के हाथ में बम भी था और बम को अंजाम तक पहुंचाने वाली मानवबम धनू भी. इतंजार था तो बस राजीव गांधी का पर इससे पहले वो अपनी साजिश को ठोक बजाकर देख लेना चाहता था.

आज तक के पास 1991 में आमचुनावों के दौरान चेन्नई के मरीना बीच में हुई रैली का वीडियो है. इस वीडियो में शिवरासन अपने टारगेट राजीव गांधी से महज 25-30 फीट की दूरी पर साफ देखा जा सकता है. जयललिता और राजीव की इस रैली में शिवरासन राजीव की सुरक्षा का जायजा लेने पहुंचा था. यहां उसने राजीव की जनता से खुल कर मिलने और लचर सुरक्षा की खामियों को भांप लिया पर वनआइड जैक शिवरासन यहीं नहीं रुका. इस रैली के अनुभव को पक्का करने के लिए वो एक और सियासी रैली में मानवबम धनू को साथ लेकर पहुंचा.

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12 मई 1991 को शिवरासन-धनू ने पूर्व पीएम वीपी सिंह और डीएमके सुप्रीमो करूणानिधि की रैली में फाइनल रेकी की. तिरुवल्लूर के अरकोनम में हुई इस रैली में धनू वीपी सिंह के बेहद पास तक पहुंची उसने उनके पैर भी छुए. बस बम का बटन नहीं दबाया. पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह की रैली में सुरक्षा का स्तर राजीव की सुरक्षा के बराबर न सही तो कम भी नहीं था पर शिवरासन और धनू के शातिर इरादे कामयाब रहे. इससे शिवरासन के हौसले बुलंद हो गए और उसे अपना प्लान कामयाब होता दिखने लगा.

लोकसभा चुनाव का दौर था राजीव गांधी की मीटिंग 21 मई को श्रीपेरंबदूर में तय हो गई. शिवरासन ने पलक झपकते ही तय कर लिया कि 21 को ही साजिश पूरी होगी. 20 की रात शिवरासन नलिनि के घर रैली के विज्ञापन वाला अखबार लेकर पहुंचा और तय हो गया कि अब 21 को ही साजिश पूरी होगी.

नलिनी के घर 20 मई की रात धनू ने पहली बार सुरक्षा एजेंसियों को चकमा देने के लिए चश्मा पहना. शुभा ने धानू को बेल्ट पहना कर प्रैक्टिस करवाई और श्रीपेरंबदूर में किस तरह साजिश को अंजाम तक पहुंचाना है इसकी पूरी तैयारी मुकम्मल कर ली गई. सभी पूरी तरह शांत और मकसद के लिए तैयार थे. 20 मई की रात को सभी ने साथ मिलकर फिल्म देखी और सो गए. सुबह हुई तो पांच लोग शिवरासन-धनू-शुभा-नलिनी और हरिबाबू साजिश को पूरा करने के लिए तैयार थे.

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श्रीपेरंबदूर में रैली की गहमागहमी थी. राजीव गांधी के आने में देरी हो रही थी. बार-बार ऐलान हो रहा था कि राजीव किसी भी वक्त रैली के लिए पहुंच सकते हैं. पिछले छह महीने से पक रही साजिश अपने अंजाम के बेहद करीब थी. एक महिला सब इंस्पेक्टर ने उसे दूर रहने को कहा पर राजीव गांधी ने उसे रोकते हुए कहा कि सबको पास आने का मौका मिलना चाहिए. उन्हें नहीं पता था कि वो जनता को नहीं मौत को पास बुला रहे हैं. नलिनी ने माला पहनाई, पैर छूने के लिए झुकी और बस साजिश पूरी हो गई.

धमाके के तुरंत बाद शिवरासन चेन्नई की ओर भागा. नलिनी और सुधा उससे चेन्नई में आकर मिले. वहां शिवरासन ने सुधा को बताया कि हरिबाबू तो मारा गया पर उसका कैमरा वहीं पड़ा है. शिवरासन ने सुंदरम को हरिबाबू का कैमरा मौके से उडा़ने की जिम्मेदारी सौंपी. सुंदरम ने काफी कोशिश की पर नाकाम रहा और फिर उस कैमरे के रोल में कैद तस्वीरों ने वो सुराग दिए जिन्होंने राजीव के हत्यारों को जांच दल के शिकंजे तक पहुंचा दिया.

सुरक्षा में खामी थी, ये सच है पर उससे बड़ा सच ये है कि आखिर लिट्टे राजीव गांधी को मारने के लिए इस कदर उतारू क्यों था. इसका जवाब और संकेत आपको बताते हैं.

प्रधानमंत्री बनने के तीन साल के भीतर श्रीलंकाई गृहयुद्ध खत्म करने के लिए राजीव गांधी ने श्रीलंका के राष्ट्रपति जे आर जयवर्धने के साथ एक शांति समझौता किया. इसमें इंडियन पीस कीपिंग फोर्स को लिट्टे औऱ दूसरे तमिल आतंकियों के हथियार डलवा कर शांति बहाल करनी थी पर दांव उलटा पड़ गया. लिट्टे ने समझौते की पीठ पर खंजर भोंक दिया. समझौते की शाम, श्रीलंकाई नौसैनिक विजीथा रोहाना ने राजीव गांधी पर हमला कर दिया. विजीथा ने बंदूक की बट राजीव पर दे मारी. कहा झाड़ू होती तो उससे भी मारता. बाल-बाल बच गए थे राजीव. बंदूक में गोली होती तो शायद उसी दिन राजीव गांधी न बचते. साफ था समझौते ने श्रीलंकाई तमिलों में राजीव गांधी के प्रति नफरत भर दी थी. इसी दौरान 1988 में राजीव गांधी ने मालदीव में तमिल संगठन PLOTE की तख्तापलट कोशिशों को भारतीय सेना भेज नाकाम करवा दिया. तमिल आतंकियों में इसे लेकर भी खासी नाराजगी थी. नतीजा सामने है श्रीलंका से इंडियन पीस कीपिंग फोर्स की 1990 में पूरी वापसी के तुरंत बाद प्रभाकरन ने राजीव गांधी को मरवा दिया. हांलाकि लिट्टे अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार करता आया है.

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कहा जाता है कि बड़ी से बड़ी सुरक्षा वहां खत्म हो जाती है जहां कोई अपनी जान कुर्बान करने पर आमादा हो जाता है. राजीव गांधी हत्याकांड में भी ऐसा हुआ. मानवबम का दांव बेहद बड़ा और गंभीर था. बावजूद इसके आखिर चूक हुई तो क्यों.

भयंकर खतरों से घिरे थे राजीव गांधी. फिर तश्तरी में परोस कर उनकी जान आखिर क्यों आतंकियों के सामने रख दी गई. जांच दल के मुखिया की माने तो केन्द्र सरकार को इल्म ही नहीं था कि राजीव को किसने मार दिया. बावजूद इसके कि चेन्नई और जाफना के बीच चल रहे संदेशों में एक भारतीय नेता की हत्या की साजिश पकड़ ली गई थी. इसके अलावा आईबी और गृह मंत्रालय भी बराबर राजीव की सुरक्षा को लेकर अलर्ट जारी कर रहा था पर राजीव की जान को दिल्ली पुलिस के दो सब इंस्पेक्टरों के भरोसे छोड़ दिया गया था.

1984 में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाले राजीव को 1989 में करारी शिकस्त ने सदमें में डाल दिया था. राजीव को लगता था कि जनता से उनकी दूरी सत्ता से उन्हें दूर कर रही है. लिहाजा वो 1991 के चुनाव में जनता से जुड़ाव को ही अपनी पहचान बना रहे थे. वो ज्याद से ज्यादा जनता के बीच जाते. सुरक्षा जहां आड़े आती उसे फटकार देते.

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कहने वाले तो ये भी कहते हैं कि राजीव गांधी ने यूपी के कुछ पुलिस अधिकारियों का तबादला इस लिए करवा दिया था कि उनकी सुरक्षा कड़ाई से राजीव बेहद नाराज थे. राजीव से जब लोग ऐसे जोखिम न उठाने को कहते तो उनका जवाब होता, 'मैं जनता पर अविश्वास नहीं कर सकता, मैं कब तक सुरक्षा की चिंता करूंगा, मुजे जिंदगी जीनी है.'

पर शायद राजीव ये भूल गए कि जनता के प्यार को पालने पोसने के लिए जिंदा होना पहली और आखिरी शर्त है. राजीव अपनी जिंद पर अड़े रहे, सुरक्षा को धता बता रहे और दुश्मन भी अपनी जिद पर अड़ा रहा.

श्रीपेरंबदूर में हुई राजीव की हत्या भारतीय राजनीति की एक बड़ी विडंबना को सामने लाती है. नेताओं से उम्मीद होती है कि वो जनता के बीच जाएं, उन्हें समझें जाने पर राजीव गांधी का जनता से प्यार ही उनकी मौत की वजह बन गया. सुरक्षा में चूक राजीव की हत्या में सबसे बड़ी वजह मानी गई और ये चूक राजीव के सुरक्षा तोड़ जनता के बीच पहुंचने से हुई.

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