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सावित्री बाई फुले की 6 साल की उम्र में कर दी गई थी शादी

पहले समाज सेवा और अब राजनीति के सहारे लोगों को जागरूक बनाना ही उनकी जिंदगी का सबक है.

Baharaich MP Sadhvi Savitri Bai Phule Baharaich MP Sadhvi Savitri Bai Phule

नरेंद्र मोदी की लहर वाले 2014 के आम चुनाव में बहराइच से सांसद चुनी गईं सावित्री बाई फुले एक ऐसा चेहरा हैं जो देश और खास तौर से महिलाओं के लिए प्रेरणा देने वाली हैं. महज छह साल की उम्र में विवाह के लिए मजबूर फूले की जिंदगी एक घटना से पूरी तरह बदल गई. हालांकि साध्वी कहती हैं, ''शादी हुई जरूर थी, लेकिन विदाई नहीं हुई थी. ''

बाल विवाह के बावजूद फूले छह साल की उम्र से ही समाज सेवा से जुड़ गईं थी, लेकिन राजनैतिक जीवन की शुरुआत आठ साल की उम्र से हुई. हालांकि 16 दिसंबर, 1995 को एक सामाजिक आंदोलन के दौरान पीएसी की गोली उन्हें लग गई और उन्हें लखनऊ जेल ले जाया गया. जेल पहुंचते ही उन्होंने तय कर लिया कि अब सिर्फ समाज सेवा करनी है. जेल से लौटने के बाद फुले ने अपने पिता से बात की और ससुराल पक्ष वालों को बुलाकर अपनी इच्छा जाहिर की. सबकी सहमति के बाद अपनी सगी छोटी बहन की शादी अपने पति से कराकर वे पूरी तरह से संन्यास धारण कर बहराइच के जनसेवा आश्रम से जुड़ गईं. उसके माध्यम से गरीब लड़कियों की शादी कराना, साधुओं का भंडारा, प्रवचन जैसे काम में जुट गईं.

लेकिन राजनीति विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएट फुले की राजनीति में आने की कहानी भी उनकी निजी जिंदगी की तरह ही हिला देने वाली है. वे बताती हैं, ''जब मैंने आठवीं कक्षा पास की तो मुझे सरकारी योजना से 480 रु. का वजीफा मिला था, जिसे स्कूल के प्रिंसिपल और शिक्षक ने जबरन अपने पास रख लिया. मैंने विरोध किया और कहा कि मैंने पढ़ाई की है इसलिए सरकार की ओर से आया वजीफा मुझे मिलना चाहिए.

इस पर स्कूल से मेरा नाम काट दिया गया और तीन साल घर बिठा दिया. मेरी राजनीति की शुरुआत वहीं से हुई. '' राजनीति में आने से पहले समाज सेवा से जुड़ीं फुले के पिता रेलवे में नौकरी करते हैं. फुले के राजनैतिक करियर की शुरुआत 2001 में हुई जब वे पहली बार बहराइच जिला पंचायत की सदस्य चुनी गईं. उसके बाद वे 2005 और 2010 में भी इस पद के लिए चुनी गईं. वे 2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट पर बलहा (सु.) सीट से चुनाव जीतकर पहली बार विधायक और 2014 में पहली बार सांसद बनी हैं. हालांकि 2007 में भी वे चरदा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ी थीं, लेकिन 1,070 वोटों से हार गईं. बहराइच संसदीय क्षेत्र से अपनी जीत में वे महिलाओं की बड़ी भूमिका मानती हैं. उन्होंने सखी संप्रदाय संगठन बना रखा है जिसके जरिए स्थानीय स्तर पर महिलाओं के हित में काम करती हैं.

उनके चुनाव अभियान में इस संगठन की अहम भूमिका रही है. बीजेपी से पहले वे बीएसपी में रह चुकी हैं. लेकिन राजनीति में धन-बल और राजनैतिक संरक्षण के महत्व की बात को वे बड़े दार्शनिक अंदाज में खारिज करती हैं. उनका कहना है, ''पहले जन बल, फिर कोई और बल चुनाव में मायने रखता है. '' वे बताती हैं कि वह किस तरह जीवन में संघर्ष कर आज लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर तक पहुंची हैं. फूले ने जब संन्यास धारण किया तो भी आश्रम में रहकर उन्होंने मजदूरी से लेकर खेतों में फसल की कटाई और घर-घर से भिक्षाटन कर जीवन का निर्वाह किया है.

साध्वी होने की वजह से अध्यात्म की किताबों में रुचि रखने वालीं फूले को खेलकूद में क्रिकेट बेहद पसंद है. लेकिन उनकी जिंदगी की कुछ अलग घटनाओं में नरेंद्र मोदी से मुलाकात है, जिसे वे बड़े चाव से सुनाती हैं. गुजरात विधानसभा चुनाव में जूनागढ़, राजकोट और सूरत प्रचार में गईं थी. वहीं मोदी से पहली मुलाकात हुई थी. वे कहती हैं कि जब लोकसभा चुनाव का समय आया तो उन्होंने मोदी के सामने लोकसभा चुनाव लडऩे की इच्छा जाहिर की, तो मोदी ने उनसे कहा, ''तुम बहराइच से क्यों, गुजरात आ जाओ मैं तुम्हें वहां से भी लड़ा सकता हूं. '' लेकिन फुले कहती हैं कि उन्होंने अपनी जन्मभूमि बहराइच से ही लडऩे का अनुरोध किया.

उनकी इल्तिजा कबूल हुई आगे का; संघर्ष संसद में होगा. लेकिन उनका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर इतना भरोसा है कि वे बेबाकी के साथ कहती हैं, ''मुझे विश्वास है कि मोदी जी मेरी बातों को अक्षरश: सुनेंगे और क्षेत्र में आने वाली समस्याओं को दूर करने में मदद करेंगे. क्योंकि मैं मोदी जी के चुनाव क्षेत्र में जा चुकी हूं और वे मुझे निजी तौर पर भी जानते हैं. ''

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