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एजुकेशन

मां ने बनाई रोटियां, पिता ने लगाया ठेला, बेटा इस तरह बना IPS अफसर

मां ने बनाई रोटियां, पिता ने लगाया ठेला, बेटा इस तरह बना IPS अफसर
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देश के यंगेस्ट आईपीएस अफसर बने साफीन हसन उन लोगों के सामने मिसाल हैं जो हालात के सामने घुटने टेक देते हैं. उनको पढ़ाने के लिए पिता ने मजदूरी से लेकर इलेक्ट्रीशियन और ठेला लगाने का काम तक किया. वहीं मां ने बेटे के लिए शादी-पार्टी के आयोजनों में कई कई घंटे रोटियां बेली. वहीं साफीन कठिन परिस्थितियों में भी बिना डिगे तैयारी करते रहे और पहले ही अटेंप्ट में आईपीएस अफसर बन गए. आइए जानें- क्या थी स्ट्रेटजी, कैसे पहले ही अटेंप्ट में आईपीएस बना गुजरात का ये युवा.
मां ने बनाई रोटियां, पिता ने लगाया ठेला, बेटा इस तरह बना IPS अफसर
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साफीन का बचपन गुजरात के सूरत जिले में बीता. उनके माता-पिता हीरे की एक यूनिट में नौकरी करते थे. उन्होंने एक वीडियो इंटरव्यू में बताया कि किस तरह प्राइमरी स्कूल में देखा था कि कलेक्टर सर आए तो लोगों ने इज्जत दी.
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वो कहते हैं घर आकर मैंने मौसी से पूछा तो उन्होंने बच्चे की तरह समझाया कि कलेक्टर किसी जिले का राजा होता है. मैंने पूछा कि कैसे बनते हैं तो उन्होंने बताया कि कोई भी अच्छी पढ़ाई करके बन सकता है. मैंने तभी ठान ली कि अब अफसर ही बनूंगा.
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अपने पारिवारिक संघर्ष के बारे में बताया कि साल 2000 में जब उनका मकान बन रहा था तो माता-पिता दिन में मजदूरी करते थे और रात में घर बनाने में ईंट ढोते थे. मंदी के चलते दोनों की नौकरी चली गई थी.
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मैंने मां-बाप का जो हाल देखा तो सोचा कि जिस तरह माता-पिता मेहनत कर रहे हैं, मैं इनके लिए करूंगा. पापा हमें पढ़ाने के लिए आसपास बन रहे घरों में इलेक्ट्रीशियन का काम करते थे. रात में ठेला लगाकर उबले अंडे और ब्लैक टी बेचते थे.
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वहीं मां नौकरी छूटने के बाद बड़े आयोजनों में रोटियां बनाती थीं. वो कई कई घंटे चपाती बेलती थीं. इसके बाद भी वो बस का किराया और अन्य खर्च निकालने के लिए आंगनबाड़ी में एक्स्ट्रा काम करती थीं. वो कहते हैं कि मैं अपने माता-पिता का ये संघर्ष देखकर उनसे हमेशा सीखता रहा.
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उन्होंने बताया कि वो बचपन में पढ़ाकू स्टूडेंट थे, लेकिन साथ में अन्य गतिविधियों में हिस्सा लेते थे. उन्होंने प्राइमरी पढ़ाई गांव के सरकारी स्कूल में गुजराती मीडियम से की. 10वीं में 92 प्रतिशत आए तो साइंस स्ट्रीम में एडमिशन लेने की सोची, लेकिन घरवालों के पास इतना पैसा नहीं था.
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वो बताते हैं कि उसी साल उनके जिले में प्राइवेट स्कूल खुल रहा था. जिसकी बहुत ज्यादा फीस थी. लेकिन जब हमलोग उनसे मिले तो उन्होंने काफी फीस माफ कर दी. इस तरह वो 11वीं से पब्लिक स्कूल में आए जहां पहली बार मैकडी सुना, बर्गर क्या होता है ये जाना. उन्होंने इस माहौल में अंग्रेजी बोलना भी सीखा.
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टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में साफीन ने बताया था कि वो अपनी मां नसीम बानो को सर्दियों में भी पसीने से भीगा हुआ देखते थे. उस वक्त वो किचन में पढ़ाई किया करते थे. मां सुबह 3 बजे उठकर 20 से 200 किलो तक चपाती बनाती थी. इस काम से वो हर महीने पांच से आठ हजार रुपए कमाती थीं. साफीन के मुताबिक कई दिन उन्हें भूखा भी सोना पड़ता था.
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साफीन अपने हॉस्टल खर्च के लिए छुट्टियों में बच्चों को पढ़ाते थे. उनका परेशानियों ने कभी पीछा नहीं छोड़ा. जब वो यूपीएससी का पहला अटेंप्ट देने जा रहे थे तभी उनका एक्सीडेंट हो गया. फिर भी वो परीक्षा देने गए और एग्जाम देने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा.

(सभी फोटो: Facebook )