जम्मू-कश्मीर के कठुआ में हुए गैंगरेप की घटना के बाद बकरवाल समाज भी सुर्खियों में है. बताया जा रहा है कि नाबालिग पीड़िता बकरवाल समुदाय से ताल्लुक रखती थीं. बता दें कि पहले भी बकरवाल समाज के लिए कई काम किए गए हैं और अब उनकी शिक्षा के लिए अनोखे कदम उठाए जा रहे हैं.
बता दें कि बकरवाल समाज घुमंतू होता है और इस समाज के लोग समय-समय पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पलायन करते रहते हैं, जिससे उनके बच्चे पर्याप्त शिक्षा से वंचित रह जाते हैं. इन्हें आवश्यक शिक्षा देने के लिए अब प्रदेश में कई स्कूल भी उन लोगों के साथ ही पलायन करेगी.
अब करीब 25 स्कूल इन खानाबदोश लोगों के साथ मोबाइल स्कूल के रूप में काम करेगी और उनके साथ ही यात्रा करेगी और बच्चों को शिक्षा दी जाएगी. बता दें कि अभी इन स्कूलों में 801 विद्यार्थी हैं, जिसमें 410 लड़के और 391 लड़कियां शामिल हैं.
इन स्कूलों के साथ 45 शिक्षक भी साथ चलेंगे, जो बच्चों को पढ़ाई करवाएंगे. बताया जा रहा है कि जल्द ही आवश्यक संगठनों और अधिकारियों से इस बारे में बात कर जल्द ही प्लान तैयार किया जाएगा.
प्रवक्ता का कहना है कि पलायन से पहले बच्चों को किताबें और यूनिफॉर्म बांट दिए जाएंगे. साथ ही बच्चों को खेलने की भी सुविधा दी जाएगी.
कौन हैं बकरवाल समाज: जम्मू-कश्मीर में बकरवाल समुदाय के 3 से साढ़े तीन लाख परिवार रहते हैं. ये घुमंतू समुदाय होता है, जो कि साल में अलग-अलग स्थानों पर रहते हैं. अक्टूबर से अप्रैल वे कठुआ, हीरानगर, जम्मू, अखनूर, सांबा, आरएसपुरा, बिशनाह में रहते हैं. वहीं अप्रैल से अक्टूबर तक वे अपने घोड़े, भेड़, बकरी और कुत्तों के साथ जंगल के क्षेत्रों में चले जाते हैं.
उनके पास कोई पक्का घर नहीं होता है और वे जहां भी जाते हैं वहां अपना ढ़ीरा या कच्चा घर बना लेते हैं. साथ ही जब वो वहां से जाते हैं तो मिट्टी या घास के अपने घर को तोड़ देते हैं. कई रिपोर्ट्स के अनुसार गुज्जर और बकरवाल मूल रूप से राजपूत हैं, जो अलग-अलग कारणों से गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र से कश्मीर में चले गए थे.
उन्हें साल 1991 में केंद्र सरकार की ओर से एसटी का दर्जा दिया गया था और उन्हें राज्य-केंद्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण मिलता है. इन्हें 10 राज्य सरकार की नौकरियों में 10 फीसदी और केंद्र की नौकरियों में 7 फीसदी फायदा मिलता है. यह भारतीय सेना के लिए जासूस का काम करते हैं. वे चीन और पाकिस्तान के सीमा से जुड़े इलाकों में भारतीय सेना को सूचना देना का काम करते हैं. कारगिल वार के दौरान बकरवाल समुदाय के लोगों ने ही भारतीय सेना को सूचना दी थी कि पाकिस्तानी सेना के जवान भारत की सीमा में घुस रहे हैं.
हाल ही में राज्य सरकार ने इस समुदाय के लिए 110 मोबाइल स्कूल खोलने की योजना बनाई है ताकि उनके बच्चों की पढ़ाई करवा सके. इनमें अधिकतर लोग अनपढ़ होते हैं और वो अपनी बच्चियों को स्कूल नहीं भेजते हैं क्योंकि वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं. वे जब मैदानी इलाकों में रहते हैं, तब 6 महीने पढ़ाई करते हैं.