इस्लाम में तीन तलाक के बाद अब मुता विवाह और मिस्याही विवाह के खिलाफ मांग उठने लगी है. हैदराबाद के रहने वाले मौलिम मोहसिन बिन हुसैन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मुसलमानों में प्रचलित मुता और मिस्यार निकाह को अवैध और रद्द घोषित करने की मांग की है. इसी बीच जानते हैं क्या है मुता निकाह जिसके खिलाफ लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं.
मुता विवाह एक निश्चित अवधि के लिए साथ रहने का करार होता है और शादी के बाद पति-पत्नी कॉन्ट्रेक्ट के आधार पर एक अवधि तक साथ रह सकते हैं. साथ ही यह समय पूरा होने के बाद निकाह खुद ही खत्म हो जाता है और उसके बाद महिला तीन महीने के इद्दत अवधि बिताती है.
हैदराबाद के व्यक्ति ने याचिका दाखिल कर शिया मुसलमानों में प्रचलित मुता और सुन्नी में प्रचलित मिस्यार निकाह को अवैध और रद्द घोषित करने की मांग की है. बता दें यह निकाह अवधि खत्म होते ही खुद ही खत्म हो जाता है.
इरशाद अहमद वानी की किताब द सॉशियोलॉजी के अनुसार मुता निकाह की अवधि खत्म होने के बाद महिला का संपत्ति में कोई हक नहीं होता है और ना ही वो पति से जीविकोपार्जन के लिए कोई आर्थिक मदद मांग सकती है. वहीं सामान्य निकाह में महिला ऐसा कर सकती है.
बता दें कि सामान्य निकाह शिया और सुन्नी दोनों में करवाया जाता है. जबकि यह शादी सिर्फ शिया ही करवाते हैं जबकि सुन्नी मुसलमान ऐसा नहीं करते हैं.
इस शादी में तलाक का कोई ऑप्शन नहीं होता है और तय अवधि के बाद शादी खत्म मानी जाती है. वहीं सामान्य निकाह करने पर तलाक के लिए एक प्रक्रिया होती है, जिसके आधार पर ही पति-पत्नी अलग हो सकते हैं.
मुता विवाह में पत्नी के पास मेहर की रकम लेने का कोई अधिकार नहीं होता है, जबकि सामान्य निकाह के बाद अलग होने पर ये रकम ली जा सकती है. बता दें कि मेहर की रकम शादी के वक्त तय की जाती है और यह घरवालों की आर्थिक स्थिति के आधार पर आपस में तय होती है.
बताया जाता है कि मुता विवाह में तय हुई शादी की अवधि के दौरान पैदा होने वाले बच्चे को पिता की संपत्ति में शेयर भी दिया जाता है. हालांकि लोगों को मानना है कि इस विवाह से पैदा हुए बच्चे को उतनी इज्जत नहीं दी जाती है.
किताब के अनुसार मुता विवाह में महिलाएं सिर्फ मुस्लिम पुरुष से ही शादी कर सकती है, जबकि मुस्लिम पुरुष ईसाई, यहूदी और पारसी से भी शादी कर सकते हैं.