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1 करोड़ फीस, मनपसंद स्पेशलिटी... आखिर क्यों NEET-PG में खाली रह जाती हैं हजारों सीटें?

अक्सर देखने को मिलता है कि नीट पीजी में हजारों सीटें खाली रह जाती हैं और इसके बाद कट-ऑफ काफी कम हो जाती है. तो जानते हैं किस कारणों से सीटें खाली रहती हैं.

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नीट पीजी में इस साल 18000 सीटें खाली रह गई हैं. (Photo: Pexels)
नीट पीजी में इस साल 18000 सीटें खाली रह गई हैं. (Photo: Pexels)

नीट पीजी 2025 परीक्षा इन दिनों चर्चा में हैं. परीक्षा के चर्चा में आने की वजह है एडमिशन के लिए जारी की गई कट-ऑफ. दरअसल, हाल ही में जो कट-ऑफ लिस्ट जारी की गई है, उसमें रिजर्व्ड कैटेगरी के कट-ऑफ माइनस 40 नंबर है. इसके बाद से इसे लेकर बवाल हो रहा है और लोग सिस्टम पर सवाल उठा रहे हैं. बताया जा रहा है कि इस बार 18000 सीटें खाली हैं, जिन पर एडमिशन नहीं हुआ है. इस वजह से कट-ऑफ काफी कम चली गई है. ऐसा पहली बार नहीं है कि कॉलेज की सीटें खाली पड़ी हैं और ये हर साल होता है, जिसके बाद कट-ऑफ को कम किया जाता है. 

लेकिन, सवाल ये है कि आखिर नीट-पीजी में हर साल  इतनी सीटें  खाली क्यों रहती है और क्यों इतनी कम कट-ऑफ होने के बाद भी एडमिशन नहीं लेते हैं. तो जानते हैं सीटें खाली रहने की वजह क्या है और किस वजह से कट-ऑफ इतनी कम रहती हैं... 

प्राथमिकताओं का है पंगा

हजारों सीटों पर एडमिशन नहीं होने का मतलब ये नहीं है कि उम्मीदवार एडमिशन लेना ही नहीं चाहते हैं. दरअसल, हर कोई चाहता हैं कि उसे अपने हिसाब से कॉलेज और कैटेगरी मिली. जब एडमिशन शुरू होते हैं तो काउंसलिंग में सबसे पहले कट-ऑफ काफी ज्यादा रहती है. इसमें लोग सबसे ज्यादा सरकारी कॉलेज लेना चाहते हैं और अपने पसंद की स्पाइलेजेशन की डिमांड करते हैं. जैसे- Dermatology, Radiology, Ophthalmology की काफी डिमांड रहती है और सबसे पहले इनकी सीट भर जाती है.

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कुछ स्पेशलिटी में ज्यादा डिमांड रहती है और बाकी स्पेशलिटी की सीटें अक्सर खाली रहती हैं. ऐसे में जिनका इन स्पेशलिटी में एडमिशन नहीं होता, वो दूसरे स्पेशलिटी में एडमिशन नहीं लेते हैं. 

प्राइवेट कॉलेज से बनाते हैं दूरी

जब भी नीट पीजी के बाद एडमिशन शुरू होते हैं तो अधिकतर उम्मीदवार सरकारी कॉलेज की डिमांड करते हैं और प्राइवेट कॉलेज से दूरी बनाते हैं. इस अहम वजह होती है प्राइवेट कॉलेजों की फीस. कई प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाई के लिए 1 करोड़ से भी ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ जाते हैं. ऐसे में उम्मीदवार इन कॉलेजों की तरफ नहीं जाते हैं और सीट होने के बाद भी वहां एडमिशन नहीं हो पाते हैं.

इसके अलावा नजदीकी कॉलेज ना मिलने की वजह से भी सीटें खाली रह जाती हैं. हाल ही में एक प्राइवेट कॉलेज की खबर आई थी कि उसमें 1026 सीटें खाली रह गई थीं. ऐसे ही कई प्राइवेट कॉलेजों का हाल है कि उनमें कई सीटें खाली हैं.

इसके अलावा कई सरकारी कॉलेज कठोर सर्विस बॉन्ड रखते हैं,  जिससे कई सालों तक गांवों में रहना होता है. इस वजह से भी कई छात्र इन सीटों में एडमिशन लेने से बचते हैं और इनकी सीट भी बच जाती है और तीसरे राउंड तक एडमिशन नहीं हो पाता है.

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कौन-सी सीटें ज्यादा खाली रहती हैं?

कुछ high-demand स्पेशलिटी जैसे Dermatology, Radiology, Ophthalmology में सीटें जल्दी भर जाती हैं, लेकिन कई अन्य स्पेशलिटी (विशेषकर non-clinical विषय और कुछ clinical branches) में उम्मीदवार कम रुचि दिखाते हैं, जिससे वे खाली रह जाती हैं. देखने को मिलता है कि ऐसा पिछले साल से ही देखा गया है कि non-clinical विषयों में सीटें अक्सर खाली रहती हैं. इस स्थिति में Anaesthesiology, Pathology, Pediatrics जैसे स्पेशलिटी सब्जेक्ट की सीटें खाली रहती हैं. 

रिपोर्टिंग नहीं करते उम्मीदवार

छात्र सीट पाते हैं पर रिपोर्ट नहीं करते, जिससे बैठने वाली सीटें रिटर्न होकर वैकेंसी बन जाती हैं. कुछ राज्यों में ऐसी सीटें हजारों तक पहुंच चुकी हैं. छात्रों के रिपोर्ट ना करने के पीछे कई वजह हैं. 
 

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