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कोर्ट-कचहरी में पुरुषों का वर्चस्व, इंडिया में केवल 15.3% लेडी वकील, सरकार ने दिए आंकड़े

आंकड़ों के मुताबिक मेघालय (59.3%) और मणिपुर (36.3%) में सबसे ज्यादा महिला वकील एनरोल्ड हैं. वहीं सबसे बड़े हाईकोर्ट यूपी में सबसे कम केवल 8.7% महिला वकीलों की संख्या है. वहीं दिल्ली सहित 8 राज्य उच्च न्यायालयों का कोई डेटा उपलब्ध नहीं है. देश में जज से लेकर वकील तक महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है.

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Women Advocates in India:
Women Advocates in India:
स्टोरी हाइलाइट्स
  • सबसे बड़े हाईकोर्ट यूपी में सबसे कम केवल 8.7% है महिला वकीलों की संख्या
  • मेघालय (59.3%) और मणिपुर (36.3%) में एनरोल्ड हैं सबसे ज्यादा महिला वकील

अदालतों में न्याय दिलाने की महत्वपूर्ण कड़ी वकील होते हैं. भारत जैसे देश में जहां तकरीबन हर क्षेत्र में पुरुषों का दबदबा है, वहां न्यायालयों में भी जज से लेकर वकील तक महिलाओं की संख्या या यूं कहें कि भागीदारी बेहद कम है. खुद सरकार ने संसद में ये आंकड़े दिए हैं जो बताते हैं कि महिला-पुरुष का अनुपात न्यायिक सेवा में किस हद तक चिंताजनक है.

देश भर में सिर्फ 15.3 फीसदी महिला वकील हैं. संसद के समक्ष जवाब में कानून मंत्रालय ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से दी गई जानकारी के आधार पर ये आंकड़े बताए. इन आंकड़ों के मुताबिक मेघालय (59.3%) और मणिपुर (36.3%) में सबसे ज्यादा  महिला वकील एनरोल्ड हैं. वहीं सबसे बड़े हाईकोर्ट यूपी में सबसे कम केवल 8.7% महिला वकील हैं. दिल्ली सहित 8 राज्य उच्च न्यायालयों का कोई डेटा उपलब्ध नहीं है. 

हालात इसलिए भी चिंताजनक हैं क्योंकि भले ही जज और वकालत के पेशे में महिलाओं की संख्या कम हो लेकिन महिला अपराधों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. देश में बलात्कार सहित अन्य यौन अपराधों, घरेलू हिंसा के आंकड़े दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं. कहा जा सकता है कि न्यायालय की चौखट पर न्याय मांगने जाने वालों में महिलाओं की संख्या किसी भी सूरत में पुरुषों से कम नहीं है लेकिन न्याय देने और दिलाने वालों में उनकी भागीदारी नाममात्र की है.

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एक और तथ्य स्थिति की गंभीरता को बताने के लिए काफी है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या का अनुपात न्यायिक सेवाओं में उतना भी नहीं है जितना कि कानून की पढ़ाई करने वाले छात्रों और छात्राओं का है. कहने का अर्थ है कि लॉ कॉलेजों में एडमिशन या पढ़ाई के मामले में छात्राएं छात्रों से उतना पीछे नहीं हैं जितना कम न्यायिक सेवाओं में उनका अनुपात है. इससे साफ है कि महिलाओं की एक बड़ी आबादी न्यायिक सेवाओं में जाना तो चाहती है, उसकी पढ़ाई भी करती है लेकिन जब बात जज या वकील बनने की आती है तो वे पीछे छूट जाती है.

प्रतीकात्मक फोटो (File Photo: India Today)
प्रतीकात्मक फोटो (File Photo: India Today)

वरिष्ठ अधिवक्ता अलका अग्रवाल भी मानती हैं कि न्यायिक सेवाओं में पुरुषों का ही वर्चस्व है. वो इसकी वजह भी बताती हैं. उनके मुताबिक ये एक वक्त देने वाला पेशा है. ऐसे में महिला वकील अगर शादीशुदा है और उसे अपने घर को भी वक्त देना है तो उसके लिए इस पेशे में अपनी जगह बनाना पुरुषों की तुलना में काफी मुश्किल हो जाता है. कई अदालतों में अब क्रैच खुल गए हैं, लेकिन ऐसा सभी जगहों पर नहीं है. इससे भी उन वकीलों के लिए काम करना मुश्किल हो जाता है जो मां भी हैं.

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दिल्ली में वकालत करने वाली हुमा कौसर का कहना है कि लोगों की खराब सोच भी इसके पीछे है. आज भी समाज में लोग सोचते हैं कि अगर हमारी बहू वकील बनकर आएगी तो ना जाने आगे क्या करेगी. झूठे केस न लाद दे, ब्लैकमेल ना करने लगे या ना जाने और क्या करे.

पश्चिम यूपी में वकालत करने वाली एडवोकेट मोनिका त्यागी कहती हैं कि लॉ के लिए आप इंटर के बाद पांच साल या ग्रेजुएशन के बाद तीन साल कानून की पढ़ाई करेंगे. उसके बाद भी जब हम पेशे में आ जाते हैं तो कोई आमदनी नहीं होती. आप किसी के साथ दो-तीन साल जूनियरशिप करेंगे. यानी इस पेशे में सैटल होने के लिए लंबा समय चाहिए. हमारा सामाजिक तानाबाना ऐसा है कि परिवार अपनी बेटियों को इतना समय देने की बजाय उसे बी.एड आदि करने का दबाव डालता है.

प्रो. मेघ राज, लॉ फैकल्टी, दिल्ली यूनिवर्सिटी कहते हैं कि इसके पीछे समाज का पूरा ढांचा एक मुख्य वजह है. मसलन वकालत के पेशे में पुरुष ज्यादा टाइम दे पाते हैं. साथ ही मेल से मिलने के लिए सीमित समय नहीं होता, वो हर समय उपलब्ध रह सकते हैं. जैसे प्रैक्टिीस के दौरान थाने से रिपोर्ट की बात हो तो उसमें महिला वकील को समस्या आ जाती है. फिर भी मैं कहूंगा कि काफी महिलाएं अच्छा काम कर रही हैं.  प्रो मेघ राज कहते हैं कि अगर लड़कियों को वहां मैटरनिटी लीव, चाइल्ड केयर लीव, क्रैच, जेंडर सेंसेटिव माहौल जैसी सुविधाएं दी जाएं तो उनकी भागीदारी बढ़ेगी. 

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जामिया मिलिया इस्लामिया के फैकल्टी ऑफ लॉ प्रो एम असद मलिक कहते हैं कि एनरोल्ड वकीलों में लड़कियों की कम संख्या होने के कई कारण हैं. दो तीन साल पहले बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने डेटा दिया था, जिसमें कहा था कि कुल एनरोल्ड वकीलों में 30 फीसदी ही प्रैक्टिस कर रहे हैं, बाकी कुछ अलग काम कर रहे हैं. वो शायद वोट देने या अन्य अवसरों पर ही आते हैं. लड़कियों की बात करें तो कम ही बड़े नाम हैं जो प्रैक्टिलस में आते हैं, वर्ना लड़कियां लॉ पढ़कर भी टीचिंग में ज्यादा जाती हैं.

इसकी एक वजह कोर्ट की कंडीशन है. यदि बड़े शहरों को हटा दें तो लोअर कोर्ट की जो कंडीशंस और स्ट्रक्चर हैं वो महिलाओं के काम करने के लिहाज से अच्छे नहीं कहे जा सकते. उन्होंने बताया कि जब मैंने लॉ किया था 1998 में तब मेरी क्लास में बामुश्किोल 10 लड़कियां थीं. टीचर के तौर पर आज मेरी क्लास में 50:50 अनुपात है. अब इसका असर आने वाले समय में जरूर दिखेगा.

 

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