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'आई सेड, यू शट अप एंड गेट आउट....पहली बार चिल्लाकर बोली थी मैं' डीयू टीचर की ये पोस्ट चर्चा में

भय, सामाजिक संरचना और परिवेश उन्हें खुलकर बोलने की इजाजत नहीं देता, लेकिन कई बार जब मन भीतर से टूटता है तो ये चीख बनकर निकलता है. दिल्ली यूनिवर्सिटी की श‍िक्ष‍िका डॉ सविता पाठक ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अपने बचपन की एक ऐसी ही घटना साझा की है, जो लड़कियों के लिए एक बड़ा मैसेज है. 

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डॉ सविता पाठक (Photo by Special Permission)
डॉ सविता पाठक (Photo by Special Permission)

टीन एज में लड़कियां कभी न कभी छेड़खानी या किसी परिचित द्वारा शारीरिक मानसिक प्रताड़ना का श‍िकार होती हैं. ऐसा बहुत कम होता है जब बच्च‍ियां इस पर मुखर विरोध कर पाएं. जो लड़कियां विरोध नहीं कर पातीं, कई बार जिंदगी भर उन्हें ये पीड़ा मन ही मन सालती रहती है. भय, सामाजिक संरचना और परिवेश उन्हें खुलकर बोलने की इजाजत नहीं देता, लेकिन कई बार जब मन भीतर से टूटता है तो ये चीख बनकर निकलता है. दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज में अंग्रेजी की श‍िक्ष‍िका व लेखि‍का डॉ सविता पाठक ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अपने बचपन की एक ऐसी ही घटना साझा की है, जो लड़कियों के लिए एक बड़ा मैसेज है. आप भी पढ़ें उनकी पोस्ट...  

आई सेड यू शट अप एंड गेट आउट फ्राम हीयर.... ये पहला अंग्रेजी का वाक्य था जो मैंने स्कूली प्रश्नोत्तर के अलावा कहीं और बोला था. हुआ यूं कि दीवाली नजदीक आ गई थी. पूरी कॉलोनी में रंग-बिरंगी झालर लगी थी. हमारे घर झालर तो थी लेकिन इलेक्ट्रिशयन के पास आने का समय नहीं था. मैंने अपनी कॉलोनी के एक भइया से कहा कि वो हमारे यहां झालर लगा दें. शायद तब मैं दसवीं में पढ़ती थी. भइया आए और उन्होंने झालर लगाया और कुर्सी पर बैठ गए, मैंने पानी दिया. मम्मी बाज़ार गई थीं और भाई बहन बैकग्राउंड में कहीं थे. भइया बार-बार उंगली से कुछ इशारा कर रहे थे मुझे बहुत खराब लगा. फिर उन्होंने कुछ कहा तो मैंने उसी समय चिल्लाकर कहा-आई सेड यू शट अप एंड गेट आउट फ्राम हीयर. वो घबरा कर कुर्सी छोड़ कर भागे और कई दिन नज़र नहीं आये. छेड़खानी की घटना मेरे जीवन में पहली नहीं थी लेकिन पहली बार मैं चिल्लाई थी..

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कई बार हम संकोच के चलते कुछ बोल नहीं पाते. हमारे दिमाग में उम्र, शारीरिक विकलांगता से लेकर कई कई खांचे बने होते हैं और हम भूल जाते हैं कि पारम्परिक तौर पर एक औरत और बच्चे को दुनिया का कमज़ोर से कमज़ोर मर्द भी अपने से नीचे ही समझता है. वो उनकी कोमल भावनाओं का फायदा उठाता है. कई बार दूसरी तरफ के आदमी का आभामंडल इतना प्रबल होता है कि लगता है कि हम ही कुछ गलत सोच रहे हैं. लेकिन जरूरी है कि हम सिडक्शन यानि अपने पद प्रतिष्ठा आभा मंडल का फायदा उठाकर बरगलाने वाले लोगों की प्रवृति समझें. 

कई बार हमें हमें लगता है कि इस तरह के स्पर्श के बाद झापड़ रसीद कर देना चाहिए था या फिर अगले की मिट्टी पलीद कर देनी चाहिए थी. लेकिन हमारे भीरू संस्कार हमें रोक लेते हैं वो उस समय  हमारे दिमाग को सुन्न कर देते हैं. कई बार लड़कियां घरों में, आफिस में कुछ महसूस कर रही होती हैं. वो मुहल्ले में कुछ महसूस कर रही होती है, सभा गोष्ठियों, शादी ब्याह, समूह संगठनों में कुछ गलत महसूस कर रही होती हैं लेकिन वो घुटती रहती हैं. उस वक्त कुछ पलट कर नहीं बोलती. वो हैप्टिक्स यानि स्पर्श की भाषा को समझती हैं लेकिन उसको पब्लिकली कह नहीं पाती है. क्या होता है जब हम पलट कर नहीं बोलते हम अपने हिस्से में घुटन लेकर आते हैं वही घटना तरह तरह से खुद पर दुहराते हैं दूसरे जो अपराधी है उसका मन बढता है. हम उसका मन बढ़ाने के जिम्मेदार हो जाते हैं. इस तरह से कुल मिला कर एक संभावित अपराध की पूर्वपीठिका के सहायक बन जाते हैं. 

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औरत को एक ऑब्जेक्ट समझना उसकी मर्जी अनि‍च्छा को कुछ नहीं समझना ही हमारे समाज में लड़कों की ट्रेनिंग है. कई बार वह ऊपरी तौर पर बहुत बड़े विचारों के वाहक हो सकते हैं लेकिन भीतर से वो अपनी महानता के दंभ, सामंती या पिछड़े संस्कारों के चलते खुद को अल्फा मेल समझते हैं और बाकि स्त्रियों को बंदरिया. शरीफ दिखने वाले तमाम लोगों को यू शट अप एंड गेट आउट फ्राम हीयर हिन्दी या किसी अन्य भाषा में भी बोलकर देखिये असर वही होगा क्योंकि बात सिर्फ भाषा की नहीं है बात उन्हें बताने की है कि आप उनकी बकवास सह नहीं सकती हैं...यू शट अप बोलने की प्रैक्टिस खूब करनी चाहिए. शुरू में डर लगेगा बोलने में. फिर साहस आ जाएगा. यकीन मानिये बोलकर देखिए ढ़ेरों घुटन से मुक्ति मिलेगी. बेवकूफ होकर सहने से अच्छा है बदतमीज बन जाइए. 

 

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