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'चाइनीज हावर्ड'... जिसने असली Harvard को कर दिया फेल! कैसे बनी नंबर वन यूनिवर्सिटी?

हावर्ड यूनिवर्सिटी को लंबे समय से दुनिया की सबसे बेहतरीन यूनिवर्सिटी माना जाता रहा है. हालिया वैश्विक यूनिवर्सिटी रैंकिंग में बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जहां हावर्ड यूनिवर्सिटी कुछ रिसर्च आधारित मापदंडों पर पिछड़ती नजर आई है.  

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हावर्ड यूनिवर्सिटी को पछाड़ चीन की झेजियांग और शंघाई जिओ टोंग दुनिया की पहली और दूसरी सबसे टॉप यूनिवर्सिटी बनी है. (Photo: Instagram/ @tsinghua_uni)
हावर्ड यूनिवर्सिटी को पछाड़ चीन की झेजियांग और शंघाई जिओ टोंग दुनिया की पहली और दूसरी सबसे टॉप यूनिवर्सिटी बनी है. (Photo: Instagram/ @tsinghua_uni)

हावर्ड यूनिवर्सिटी को दशकों से दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित और भरोसेमंद यूनिवर्सिटी माना जाता रहा है, लेकिन अब वैश्विक शिक्षा की तस्वीर तेजी से बदल रही है. हालिया अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में एक चौंकाने वाला बदलाव सामने आया है. पढ़ाई, रिसर्च और प्रतिष्ठा के मामले में हार्वर्ड का नाम सबसे ऊपर लिया जाता था. लेकिन अब हाल की वैश्विक रैंकिंग में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. अब चीन की तीन यूनिवर्सिटियां – झेजियांग यूनिवर्सिटी, शिंघुआ यूनिवर्सिटी और पेकिंग यूनिवर्सिटी रिसर्च के मामले में हार्वर्ड को कड़ी टक्कर दे रही हैं.

किस रैंकिंग ने सबका ध्यान खींचा?
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, हालिया ग्लोबल यूनिवर्सिटी रैंकिंग में हावर्ड कुछ रिसर्च से जुड़े मापदंडों पर करीब 30वें स्थान पर पहुंच गया है. वहीं, दूसरी ओर, चीन की ये तीन यूनिवर्सिटियां टॉप रैंक में शामिल हो गई हैं.

किस आधार पर मिलती है रैंकिंग
विश्व यूनिवर्सिटी रैंकिंग इन मुख्य आधारों पर तय की जाती है.

रिसर्च पेपर की संख्या
किसी यूनिवर्सिटी से हर साल कितने रिसर्च पेपर अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित होते हैं.

1. उद्धरण (Citations)
उन रिसर्च पेपर्स को दुनिया के दूसरे वैज्ञानिक और शोधकर्ता कितनी बार अपने काम में इस्तेमाल करते हैं.

2. वैज्ञानिक रिसर्च का कुल आउटपुट
यूनिवर्सिटी कुल मिलाकर साइंस, टेक्नोलॉजी, मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में कितना शोध कर रही है.

3. रिसर्च का प्रभाव (Impact)
किया गया शोध समाज, तकनीक और भविष्य की नीतियों पर कितना असर डाल रहा है.

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4. अंतरराष्ट्रीय सहयोग
यूनिवर्सिटी कितनी विदेशी संस्थाओं और शोधकर्ताओं के साथ मिलकर काम कर रही है.

जिन रैंकिंग सिस्टम में रिसर्च की संख्या और citations को ज्यादा महत्व दिया जाता है, वहां चीनी यूनिवर्सिटीज आगे निकल रही हैं, जबकि हार्वर्ड का रिसर्च आउटपुट स्थिर रहने के कारण उसकी रैंकिंग नीचे आई है.

चीनी यूनिवर्सिटी क्या अलग कर रही हैं?
चीन की सफलता अचानक नहीं आई है. इसके पीछे लंबे समय की योजना और भारी निवेश है. आपको बता दें कि पिछले 20 सालों में चीन ने उच्च शिक्षा और रिसर्च में अरबों डॉलर लगाए AI, इंजीनियरिंग, मेडिकल, एनर्जी और साइंस जैसे क्षेत्रों पर खास फोकस किया. प्रोफेसरों की प्रमोशन और फंडिंग को रिसर्च पेपर से जोड़ा. इसका नतीजा यह हुआ कि चीनी यूनिवर्सिटीज से हर साल बड़ी संख्या में अंतरराष्ट्रीय रिसर्च पेपर प्रकाशित होने लगे.

क्या हार्वर्ड कमजोर हो गया है?
विशेषज्ञों के मुताबिक, आज भी पढ़ाई की गुणवत्ता, नए विचारों और दुनिया भर में पहचान के मामले में हार्वर्ड आगे है. लेकिन जहां हार्वर्ड का रिसर्च काम लगभग उसी स्तर पर बना हुआ है, वहीं चीनी यूनिवर्सिटी का रिसर्च बहुत तेजी से बढ़ा है. कई मामलों में वे अमेरिकी यूनिवर्सिटीज से हर साल 2 से 3 गुना ज्यादा रिसर्च पेपर प्रकाशित कर रही हैं.

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अमेरिका को क्यों हो रही है परेशानी?
रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी यूनिवर्सिटी को कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. रिसर्च के लिए मिलने वाले पैसों को लेकर अनिश्चितता है, इमिग्रेशन के नियम सख्त हो गए हैं और विदेशी यूनिवर्सिटीज के साथ मिलकर काम करना भी मुश्किल हुआ है. इन वजहों से रिसर्च की रफ्तार धीमी पड़ी है और इसका असर रैंकिंग में साफ दिखाई दे रहा है.

छात्रों के लिए इसका क्या मतलब है?
इस बदलाव का मतलब यह है कि अब अच्छी शिक्षा और रिसर्च के लिए सिर्फ अमेरिका ही एकमात्र विकल्प नहीं है. चीन तेजी से वैश्विक शिक्षा का नया केंद्र बन रहा है. छात्रों और रिसर्चर्स को अब नए देशों में भी बड़े मौके मिल रहे हैं. हार्वर्ड की प्रतिष्ठा अभी भी मजबूत है, लेकिन रिसर्च आधारित रैंकिंग में चीनी यूनिवर्सिटीज आगे निकल रही हैं. दुनिया की उच्च शिक्षा व्यवस्था बदल रही है. आने वाले वर्षों में चीन की यूनिवर्सिटीज वैश्विक शिक्षा और रिसर्च में और बड़ी भूमिका निभा सकती हैं.

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