
UGC के नए प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026 (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) ने देशभर में बहस छेड़ दी है. 13 जनवरी 2026 को लागू हुए ये नियम भारत के हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी के लिए अनिवार्य हैं और इनका मकसद है कैंपस में जाति-आधारित भेदभाव रोकना और ऐसा माहौल बनाना जहां हर छात्र बराबरी महसूस करे. ये नियम 2012 की उस पुरानी नियमावली को बदलते हैं, जिसे UGC ने तो जारी किया था, लेकिन जो वास्तव में कैंपसों में असर नहीं दिखा पाई.
क्यों लाने पड़े नए नियम?
UGC ने खुद स्वीकार किया है कि पिछले पांच साल में कैंपसों में जाति-आधारित शिकायतें 118 फीसदी बढ़ी हैं.2019–20 में 173 शिकायतें थीं जो 2023–24 में बढ़कर 378 हो गईं. इसी दौरान रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों ने बता दिया कि विश्वविद्यालयों में भेदभाव को रोकने के लिए सिर्फ कागजी नियम काफी नहीं हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी UGC को पुराने नियम मजबूत करने का निर्देश दिया था. इसी पृष्ठभूमि में 2026 की नई नियमावली तैयार की गई. वरिष्ठ वकील अस्था अनुप चतुर्वेदी का कहना है कि UGC के नए नियम किसी तरह का 'नया अधिकार' नहीं देते, बल्कि पहले से मौजूद अधिकारों को अब लागू करवाने की ताकत देते हैं. जो बातें पहले सिर्फ सलाह या दिशा-निर्देश थीं, वे अब पूरी तरह अनिवार्य नियम बन गई हैं और संस्थानों को उनका पालन करना ही होगा.
2012 बनाम 2026
2012 में UGC ने पहली बार भेदभाव रोकने के लिए औपचारिक ढांचा जारी किया था, लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वह सलाहकारी था. विश्वविद्यालयों को कहा गया था कि वे Equal Opportunity Cell (EOC) बनाएं, SC और ST छात्रों की शिकायतें सुनें और कैंपस में समानता का वातावरण बनाएं, लेकिन यह सब 'चाहे तो कीजिए' वाले ढांचे में था. नियम न मानने पर UGC के पास कोई वास्तविक कार्रवाई की शक्ति नहीं थी. न संस्थान पर दंड लगाया जा सकता था, न फंडिंग रोकी जा सकती थी और न ही उसकी मान्यता पर कोई असर पड़ता था.
शिकायतों की प्रक्रिया भी अस्पष्ट थी. न समयसीमा थी, न जवाबदेही थी. कई विश्वविद्यालय शिकायतें महीनों तक दबाए रखते थे. OBC, EWS, दिव्यांग या अन्य वर्गों का उल्लेख भी नहीं था. यही वजह है कि 2012 की नियमावली व्यवहार में कमजोर साबित हुई .

सलाह नहीं, अब कानून
2026 के नियम 2012 के ढांचे को पूरी तरह बदलते हैं. अब यह सलाह नहीं, बल्कि कानून है और हर कॉलेज व यूनिवर्सिटी को इसे मानना अनिवार्य है. जो संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करते, तो UGC फंडिंग रोक सकता है, नए कोर्स की मान्यता रोक सकता है, और जरूरत पड़ने पर संस्थान की मान्यता भी रद्द कर सकता है.
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OBC की पहली बार एंट्री
2012 के नियम सिर्फ SC और ST तक सीमित थे, लेकिन 2026 में पहली बार OBC को भी भेदभाव-रोधी ढांचे में शामिल किया गया. नए नियम भेदभाव की परिभाषा को भी बहुत व्यापक कर देते हैं जिसमें जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान और दिव्यांगता तक शामिल हैं.
कैंपस में पूरी नई संरचना
नई नियमावली में Equal Opportunity Centre (EOC) को अनिवार्य बनाया गया है और इसके भीतर एक Equity Committee होगी जिसमें SC, ST, OBC, महिला और PwD प्रतिनिधि होंगे. VC या प्रिंसिपल इसकी अध्यक्षता करेंगे.इसके साथ ही पहली बार Equity Squads, Equity Ambassadors और 24×7 हेल्पलाइन की व्यवस्था भी अनिवार्य की गई है.अब शिकायत मिलते ही 24 घंटे के अंदर कमेटी की बैठक, 15 दिनों में जांच और 7 दिनों में कार्रवाई अनिवार्य है. पहचान गोपनीय रखनी होगी.
झूठी शिकायत पर दंड क्यों हटाया गया?
2025 के ड्राफ्ट नियमों में यह प्रावधान था कि अगर कोई शिकायत झूठी पाई जाती है, तो शिकायतकर्ता पर दंड लगाया जा सकता है. यह इसलिए जोड़ा गया था ताकि शिकायतों का गलत इस्तेमाल ना हो,लेकिन जनवरी 2026 में जब अंतिम नियम आए, तो यह प्रावधान पूरी तरह हटा दिया गया.
UGC का कहना है कि दंड का डर असली पीड़ितों को शिकायत करने से रोक सकता है.विरोधियों का तर्क है कि इससे गलत आरोप लगाने के मामले बढ़ सकते हैं और कैंपस में तनाव पैदा हो सकता है. यही कारण है कि सोशल मीडिया पर #RollbackUGC ट्रेंड कर रहा है.
क्या पुराने नियम कमजोर थे
2012 के नियम लागू तो थे, पर उनमें ताकत नहीं थी. 2026 के नियम व्यापक हैं, कानूनी रूप से मजबूत हैं और स्पष्ट जवाबदेही तय करते हैं.लेकिन OBC को शामिल करने, परिभाषा को बहुत व्यापक रखने और फर्जी शिकायत पर दंड हटाने जैसे बदलावों ने एक नई बहस छेड़ दी है
ताजा अपडेट ये है कि 2026 को लेकर जारी विवाद के बीच शिक्षा मंत्रालय अब औपचारिक रूप से स्थिति स्पष्ट करने की तैयारी में है.सरकारी सूत्रों के मुताबिक, मंत्रालय जनता के सामने सभी तथ्य स्पष्ट रूप से रखने की तैयारी कर रहा है, ताकि नियमों को लेकर फैल रही गलतफहमियां दूर हो सकें.