दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जब अमेरिका, रूस और दूसरी बड़ी महाशक्तियों के बीच परमाणु बम बनाने की होड़ लग गई तब अमेरिका ने अपना दबदबा दिखाने के लिए एक 'सुपरबम' बनाने की कवायद शुरू की. इसी कड़ी में 31 जनवरी 1950 को राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने हाइड्रोजन बम बनाने की घोषणा की थी. तब इस बम के बारे में बताया गया था ऐसी सूचना फैलाई गई कि यह एक सुपर हथियार है, जो परमाणु बम से भी सैड़कों गुना ज्यादा तबाही ला सकता है.
हाइड्रोजन बम को ऐसा हथियार बताया गया जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान पर गिराए गए परमाणु बमों की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक शक्तिशाली था. ऐसा करने के पीछे सोवियत संघ का परमाणु कार्यक्रम था. क्योंकि, ट्रूमैन की घोषणा से पांच महीने पहले सोवियत संघ ने कजाकिस्तान में अपने परीक्षण स्थल पर परमाणु बम का सफल विस्फोट किया था.
इसलिए संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपनी परमाणु श्रेष्ठता खो दी थी. इसके कुछ हफ्तों बाद, ब्रिटिश और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने चौंकाने वाला निष्कर्ष निकाला कि जर्मन मूल के क्लाउस फुच्स, जो अमेरिकी परमाणु कार्यक्रम में एक उच्च पदस्थ वैज्ञानिक थे, सोवियत संघ के जासूस थे. इन दो घटनाओं और इस तथ्य के कारण कि सोवियत संघ को हाइड्रोजन बम बनाने की प्रक्रिया के बारे में अमेरिकियों की सारी जानकारी थी.
सुपर बम बनाने की लग गई थी होड़
ट्रूमैन ने महाशक्तियों के बीच दुनिया के पहले "सुपरबम" को पूरा करने की होड़ के लिए भारी मात्रा में धन आवंटित करने का निर्णय लिया. 1 नवंबर, 1952 को, संयुक्त राज्य अमेरिका ने प्रशांत महासागर में स्थित मार्शल द्वीप समूह के एनिवेटोक एटोल पर दुनिया के पहले हाइड्रोजन बम, "माइक" का सफल विस्फोट किया.
10.4 मेगाटन के इस थर्मोन्यूक्लियर बम को, जो टेलर-उलम के चरणबद्ध विकिरण विस्फोट सिद्धांतों पर आधारित था, उसने पल भर में पूरे द्वीप को वाष्पीकृत कर दिया और एक मील से अधिक चौड़ा गड्ढा छोड़ दिया. माइक की अविश्वसनीय विस्फोटक शक्ति इसके विशाल मशरूम जैसे बादल से भी स्पष्ट थी - 90 सेकंड के भीतर ही मशरूम बादल 57,000 फीट की ऊंचाई तक पहुंच गया और समताप मंडल में प्रवेश कर गया.
एक मिनट बाद, यह 108,000 फीट की ऊंचाई पर पहुंच गया और अंततः 120,000 फीट की अधिकतम ऊंचाई पर स्थिर हो गया. परीक्षण के आधे घंटे बाद, मशरूम 60 मील तक फैला हुआ था, जिसका आधार 45,000 फीट की ऊंचाई पर तने से जुड़ा हुआ था.
तीन साल बाद, 22 नवंबर 1955 को, सोवियत संघ ने विकिरण विस्फोट के उसी सिद्धांत पर आधारित अपना पहला हाइड्रोजन बम विस्फोट किया. दोनों महाशक्तियों के पास अब "हेल बम" था. क्योंकि कई अमेरिकी इस बम का नाम यही रखा था और दुनिया इतिहास में पहली बार थर्मोन्यूक्लियर युद्ध के खतरे में जी रही थी.