20 फरवरी 1947 को, ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली की सलाह पर, राजा जॉर्ज VI ने लॉर्ड लुई माउंटबेटन को भारत का अंतिम वायसराय नियुक्त करने का फैसला लिया था. एटली ने उसी दिन हाउस ऑफ कॉमंस में इसकी घोषणा की और एक महीने बाद 23 मार्च को भारत आकर उन्होंने अपना पदभार ग्रहण किया था.
दूसरे विश्व युद्ध में लॉर्ड लुई माउंटबेटन ने दक्षिणपूर्व एशिया मोर्चे पर मित्र देशों के मुख्य कमांडर के रूप में कार्य किया था. उस समय लेबर पार्टी के प्रति उनकी सहानुभूति और महारानी विक्टोरिया के परपोते होने के कारण ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली एटली ने राजा जॉर्ज VI को सलाह दी कि माउंटबेटन को भारत का वायसराय बनाकर भेजा जाए.
इसके बाद 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली की सलाह पर, राजा जॉर्ज VI ने लॉर्ड लुई माउंटबेटन को भारत का अंतिम वायसराय नियुक्त किया और उन्हें ब्रिटेन से भारत को सत्ता हस्तांतरण की देखरेख की जिम्मेदारी सौंपी गई. 20 फरवरी 1947 को प्रधान मंत्री क्लेमेंट एटली ने हाउस ऑफ कॉमन्स में घोषणा की कि माउंटबेटन भारत के अगले वायसराय होंगे. इसके बाद ने स्वयं संयुक्त सेवा स्टाफ कॉलेज में एक भाषण दिया था.
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कहा जाता है कि माउंटबेटन इस पद को स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक थे, क्योंकि उनके पास कोई राजनीतिक अनुभव नहीं था और वे जानते थे कि यह एक कठिन कार्य होगा. माउंटबेटन दंपति 22 मार्च, 1947 को भारत पहुंचे, फील्ड मार्शल विस्काउंट वेवेल के उत्तराधिकारी के रूप में मैंने 23 मार्च, 1947 को नई दिल्ली में अपना पदभार ग्रहण किया.
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माउंटबेटन को ब्रिटिश भारत को स्वतंत्रता दिलाने की प्रक्रिया की देखरेख का दायित्व सौंपा गया था. माउंटबेटन ने आधिकारिक तौर पर भारत के महाराजाओं, रियासतों के शासकों को सूचित किया कि उन्होंने वायसराय के रूप में पदभार ग्रहण कर लिया है. यह भारतीय इतिहास का एक ऐतिहासिक क्षण था.