scorecardresearch
 

IRGC क्यों है ईरान की सबसे ताकतवर फोर्स? बिगड़े हालात में क्यों आई चर्चा में

IRGC की संरचना किसी पूरी सेना से कम नहीं है. इसके पास अपनी अलग थलसेना, नौसेना और वायुसेना है, वहीं विदेशों में गुप्त और सैन्य अभियानों के लिए इसकी एक विशेष यूनिट सक्रिय रहती है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर IRGC और ईरान की नियमित आर्मी के बीच असली फर्क क्या है और दोनों की भूमिका कैसे अलग-अलग तय होती है.

Advertisement
X
 बासिज फोर्स मुख्य रूप से ईरान के भीतर काम करती है (Photo:Reuters)
बासिज फोर्स मुख्य रूप से ईरान के भीतर काम करती है (Photo:Reuters)

ईरान इस समय अपने सबसे नाज़ुक दौरों में से एक से गुजर रहा है. अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व वाली सत्ता के खिलाफ भड़के सरकार-विरोधी प्रदर्शन अब 14वें दिन में प्रवेश कर चुके हैं और हालात लगातार हिंसक होते जा रहे हैं. हालात की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आंतरिक सुरक्षा की कमान अब सीधे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को सौंप दी गई है. बताया जा रहा है कि नियमित सेना और पुलिस भीड़ को काबू में रखने में नाकाम रहीं, जिसके बाद सत्ता को यह बड़ा और सख्त फैसला लेना पड़ा.

IRGC क्या है और क्यों इतनी ताकतवर?

IRGC की स्थापना 1979 की इस्लामी क्रांति के तुरंत बाद हुई थी. इसका मकसद सिर्फ सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि इस्लामी व्यवस्था और सुप्रीम लीडर की सत्ता को सुरक्षित रखना था. यही वजह है कि यह फोर्स सीधे सुप्रीम लीडर को जवाबदेह है, न कि सरकार या संसद को. समय के साथ-साथ IRGC एक ऐसी ताकत बन गई, जिसके सामने ईरान की नियमित सेना भी हाशिये पर जाती दिखने लगी.

आज IRGC के पास अपनी थलसेना, वायुसेना और नौसेना है. इसके अलावा विदेशों में ऑपरेशन चलाने के लिए अलग से यूनिट मौजूद है. जब भी कोई बड़ा सैन्य फैसला होता है फिर चाहे वह इजरायल से जुड़ा हमला हो या क्षेत्रीय टकराव तो जिम्मेदारी अक्सर IRGC को ही दी जाती है, न कि रेगुलर आर्मी को.

Advertisement

क्रांति से सत्ता तक का सफर

ईरान के इस सख्त सैन्य ढांचे की जड़ें 20वीं सदी के मध्य में मिलती हैं. 1941 में मोहम्मद रजा शाह पहलवी सत्ता में आए. उन्होंने देश को आधुनिक बनाने की कोशिश की, लेकिन अमेरिका के साथ करीबी रिश्ते, तेल नीति और धार्मिक मामलों में सख्ती के कारण विरोध बढ़ता गया. इसी दौर में धार्मिक नेता अयातुल्ला रुहुल्लाह खोमैनी उभरे.  1979 में इस्लामी क्रांति के बाद वे सत्ता के केंद्र में आ गए.

क्रांति के बाद IRGC को तीन मुख्य जिम्मेदारियां सौंपी गईं-क्रांति की रक्षा, देश की संप्रभुता बचाना और तख्तापलट की किसी भी कोशिश को नाकाम करना. जल्द ही 1980 में इराक के शासक सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला कर दिया. इसी युद्ध ने IRGC को खुद को साबित करने का मौका दिया और यहीं से इसकी पकड़ और मजबूत होती चली गई.

राजनीति और अर्थव्यवस्था पर पकड़

IRGC सिर्फ हथियारों तक सीमित नहीं है. इसकी मौजूदगी ईरान की राजनीति और अर्थव्यवस्था में भी गहराई तक फैली है. कई राष्ट्रपतियों और बड़े नेताओं का सफर यहीं से शुरू हुआ. अंतरराष्ट्रीय थिंक-टैंक इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के मुताबिक, IRGC के पास करीब ढाई लाख प्रशिक्षित सैनिक हैं, लेकिन असर के मामले में यह संख्या से कहीं आगे है. कंस्ट्रक्शन, डिफेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में इसकी कंपनियों की हिस्सेदारी ईरान की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से पर मानी जाती है.

Advertisement

क्यों चर्चा में है बासिज फोर्स

बासिज फोर्स IRGC की सबसे जमीनी और विवादित यूनिट मानी जाती है. 'बासिज' एक फारसी शब्द है, जिसका मतलब होता है लोगों को संगठित करना. इसकी स्थापना 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद हुई थी, ताकि जरूरत पड़ने पर आम नागरिकों को भी शासन के समर्थन में उतारा जा सके.

बासिज फोर्स मुख्य रूप से ईरान के भीतर काम करती है. सरकार-विरोधी प्रदर्शन, छात्र आंदोलन, महिलाओं के विरोध और दंगों को कुचलने में इसकी भूमिका सबसे आगे रहती है. यही वजह है कि मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों में इस पर ज्यादा सख्ती, हिंसा और दमन के आरोप लगते रहे हैं.

यह कोई पारंपरिक सेना नहीं है, बल्कि अर्धसैनिक और स्वयंसेवी ढांचा है. दावा किया जाता है कि संकट के समय बासिज छह लाख तक लड़ाके जुटा सकती है. चुनावों में डराने-धमकाने और कथित धांधली में भी इसका नाम आता रहा है. कुल मिलाकर, बासिज फोर्स ईरान में सत्ता की 'स्ट्रीट पावर' मानी जाती है.ऐसा कहा जा रहा है मौजूदा प्रदर्शन को दबाने के लिए बासिज फोर्स एक्टिव हो गई है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement