जब भारत और पाकिस्तान को बांटने वाली लकीर खींची गई, तो इसने सिर्फ देश का विभाजन नहीं किया, बल्कि कई परिवारों को भी बांट दिया था. बंटवारे का ऐसा ही सितम दो सगे भाईयों पर भी टूटा, जिसने उन्हें जंग के मैदान में एक-दूसरे के सामने खड़ा कर दिया था.
भारत और पाकिस्तान को बने अभी कुछ ही महीने हुए थे. अगस्त 1947 के जश्न का दौर खत्म हो चुका था. अब ऊंचाई वाले इलाकों में तोपखाने की गोलाबारी का दौर चल रहा था और दोनों नए राष्ट्रों के बीच पहला युद्ध शुरू हो चुका था. उस संघर्ष क्षेत्र में एक तरफ भारतीय सेना के मेजर यूनुस खान तैनात थे. वहीं उस पार पाकिस्तानी सेना के मेजर साहिबजादा याकूब खान मौजूद थे. दोनों सगे भाई थे जो रामपुर में एक ही घर में पले-बढ़े थे. उन्होंने साथ में प्रशिक्षण लिया.फिर युद्ध में एक-दूसरे का सामना किया.
सरहदों में बंटने से पहले
ये दोनों भाई रामपुर रियासत के एक प्रमुख व्यक्ति सर अब्दस समद खान के बेटे थे. उस समय के कई कुलीन परिवारों की तरह, वे ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हुए, जो उस समय दुनिया की सबसे पेशेवर और विशाल सैन्य ताकतों में से एक थी.
यूनुस को गढ़वाल राइफल्स में कमीशन मिला. वहीं याकूब, जिनका जन्म 1920 में हुआ था. 1940 में 18वीं किंग एडवर्ड्स ओन कैवलरी में शामिल हुए थे. एक ही तरह के प्रशिक्षण, एक ही तरह के आचार संहिता और एक ही तरह की रेजिमेंटल परंपराओं ने उन्हें आकार दिया. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, दोनों ने ब्रिटिश राजशाही के अधीन सेवा की.
याकूब ने उत्तरी अफ्रीका में लड़ाई लड़ी और 1942 में टोब्रुक के पास बंदी बना लिए गए. उन्होंने कई वर्ष युद्धबंदी के रूप में बिताए और 1945 में रिहा हुए. इस अनुभव ने उन पर गहरा प्रभाव डाला और बाद में एक सैनिक और राजनयिक दोनों के रूप में अपनी भूमिका अदा की. युद्ध के बाद जब याकूब घर लौटे, तो जिस साम्राज्य की उन्होंने सेवा की थी, वह अपने अंत के कगार पर था.
जब 1947 में सेना भी विभाजित हुई
1947 में भारत का विभाजन केवल क्षेत्रीय नहीं था, बल्कि संस्थागत भी था. डोमिनिक लैपियर और लैरी कॉलिन्स द्वारा लिखित "फ्रीडम एट मिडनाइट" के अनुसार, ब्रिटिश सेना की वापसी असाधारण गति से हुई. राजनीतिक वार्ताएं तेजी से आगे बढ़ीं, लेकिन उनके पीछे एक जटिल और कठिन प्रक्रिया छिपी थी. ब्रिटिश भारतीय सेना को भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित करना.

रेजिमेंटों को विभाजित किया गया. उपकरणों का बंटवारा किया गया. अधिकारियों से निष्ठा चुनने को कहा गया. युनुस और याकूब खान के लिए वह क्षण निर्णायक रूप से आया. एक तरफ जहां यूनुस ने भारत की सेवा करने का विकल्प चुना. वहीं याकूब ने पाकिस्तान को चुना. कागजों पर तो यह एक नौकरशाही प्रक्रिया थी, लेकिन इसके परिणाम युद्ध के मैदान में सामने आने वाले थे.
जब दोनों देशों के बीच हुआ पहला युद्ध
अक्टूबर 1947 में जम्मू और कश्मीर को लेकर लड़ाई छिड़ गई. कबायली लड़ाके रियासत में घुस गए. महाराजा द्वारा विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत ने जवाबी कार्रवाई की. इसके बाद पहला भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हुआ, जो 1947 और 1948 के दौरान दुर्गम पहाड़ी इलाकों में लड़ा गया.तब तक दोनों भाई अपनी-अपनी सेनाओं में मेजर के पदों तक पहुंच चुके थे.
विभाजन के इतिहास में दर्ज एक असाधारण घटना
एक मुठभेड़ के दौरान मेजर यूनुस खान ने पाकिस्तानी चौकी के खिलाफ भारतीय सैनिकों का नेतृत्व किया और एक अधिकारी को घायल कर दिया. बाद में उन्हें पता चला कि घायल व्यक्ति उनका छोटा भाई मेजर याकूब खान था.उनके बीच हुई बातचीत संक्षिप्त और नियंत्रित थी. दोनों के बीच कोई नाटकीय टकराव नहीं हुआ. बस दोनों पक्षों ने कर्तव्य निर्वाह की स्वीकृति व्यक्त की.
विभाजन की मानवीय कीमत
यूनुस और याकूब खान की कहानी कोई एक अलग घटना नहीं है. यह विभाजित जीवन की एक व्यापक गाथा का हिस्सा है. आंचल मल्होत्रा द्वारा लिखित 'रेम्नैंट्स ऑफ ए सेपरेशन' में 1947 के विभाजन से बिखर गए परिवारों के व्यक्तिगत अनुभवों को सावधानीपूर्वक दर्ज किया गया है. मौखिक इतिहास और संरक्षित पारिवारिक धरोहरों के माध्यम से यह पुस्तक दर्शाती है कि कैसे भाई-बहन, माता-पिता और पूरे परिवार अचानक कठोर हो चुकी सीमा के विपरीत छोर पर आ गए थे.
इसमें जिन वृत्तांतों का उल्लेख किया गया है उनमें यूनुस खान और याकूब खान जैसे मामले शामिल हैं, जो भाई भारत और पाकिस्तान की सेनाओं में सेवा करने गए थे. मल्होत्रा का काम राजनीतिक नेताओं से हटकर निजी स्मृतियों पर केंद्रित है, यह दर्शाता है कि विभाजन ने न केवल भूमि को विभाजित किया बल्कि व्यवसायों, निष्ठाओं और पारिवारिक संबंधों को भी तोड़ दिया.इस लिहाज से, खान बंधुओं की कहानी एक साझा अतीत के अलग-अलग राष्ट्रीय भविष्य के रूप में परिवर्तन के तौर पर सामने आती है.
1948 के युद्ध के बाद दोनों भाईयों का क्या हुआ
जनवरी 1949 के युद्धविराम ने संघर्ष को रोक दिया, लेकिन इससे जो हो चुका था वह मिट नहीं गया. याकूब खान का करियर पाकिस्तान में निरंतर प्रगति करता रहा. अंततः वे लेफ्टिनेंट जनरल बने और फिर कूटनीति के क्षेत्र में कदम रखा, जहां उन्होंने पाकिस्तान के राजदूत और बाद में विदेश मंत्री के रूप में कार्य किया. अपनी बौद्धिक क्षमता और शांत स्वभाव के लिए जाने जाने वाले वे पाकिस्तान के सबसे सम्मानित राजनेताओं में से एक रहे.
यूनुस खान ने भारतीय सेना में अपनी सेवा जारी रखी और विभाजन से पहले जिन पेशेवर मूल्यों ने उन्हें आकार दिया था, उन्हीं पर आधारित अपना करियर बनाया. उन्होंने सार्वजनिक जीवन से दूर रहकर उत्कृष्ट प्रतिष्ठा के साथ सेवानिवृत्ति ली. कई वर्षों बाद, याकूब की आधिकारिक यात्राओं में से एक के दौरान दोनों भाई दिल्ली में फिर मिले. उन्होंने एक-दूसरे को गले लगाया, लेकिन खबरों के अनुसार उन्होंने युद्धकालीन घटना का जिक्र नहीं किया. क्योंकि, कुछ चुप्पी जानबूझकर बरती जाती है.
यह एक युद्ध कथा से कहीं अधिक है
विभाजन को अक्सर आंकड़ों के रूप में याद किया जाता है. लाखों विस्थापित हुए, सैकड़ों हजारों लोग मारे गए. फ्रीडम एट मिडनाइट जैसी पुस्तकें 1947 की राजनीतिक तात्कालिकता और प्रशासनिक अराजकता को बखूबी दर्शाती हैं. आंचल मल्होत्रा जैसी रचनाएं उस उथल-पुथल में मानवीय भावनाओं को गहराई से उजागर करती हैं.
इन दो दृष्टिकोणों के बीच, इतिहास के विशाल क्षितिज और परिवारों की मौन गवाही के बीच, यूनुस और याकूब खान की कहानी छिपी है. जब उनका जन्म हुआ था तब वे प्रतीक नहीं थे. ट्रेनिंग के दौरान वे एक-दूसरे के विरोधी नहीं थे. वे दोनों इसलिए बने क्योंकि इतिहास की यही मांग थी.1947 में उन्होंने अलग-अलग देशों को चुना. 1948 में, युद्ध में उनका आमना-सामना हुआ. ऐसा करके, वे विभाजन के सबसे प्रभावशाली अनुस्मारकों में से एक बन गए.सीमाएं, मानचित्रों पर खींची जाती हैं, लेकिन उन्होंने इस विभाजन को परिवारों में जिया है.