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कौन था वो हत्यारा, जिसे कहा जाता है ग्रीनलैंड का असली मालिक! क्यों दिया था ये नाम

ग्रीनलैंड को लेकर अभी घमासान मचा हुआ है. अमेरिका बार-बार इसपर कब्जा करने की धमकी दे रहा है. इसके विरोधस्वरूप पूरा यूरोप एक होता दिखाई दे रहा है. क्योंकि, यह डेनमार्क का एक स्वायत्त हिस्सा है. ऐसे में डेनमार्क पर दावे के बीच जानते हैं आखिर दुनिया का सबसे बड़े द्वीप को किसने खोजा था और इसका पहला मालिक कौन था.

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सबसे पहले ग्रीनलैंड पर एक निर्वासित वाइकिंग योद्धा का था कब्जा (Photo - AP)
सबसे पहले ग्रीनलैंड पर एक निर्वासित वाइकिंग योद्धा का था कब्जा (Photo - AP)

बर्फ की चादरों और ऊबड़-खाबड़ टुंड्रा से ढका ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है. उत्तरी अटलांटिक के ठंडे पानी में स्थित और आर्कटिक सर्कल से होकर गुजरने वाला यह विरल आबादी वाला भूभाग लंबे समय से भू-राजनीति और इतिहास के हाशिये पर शांति से बसा हुआ प्रतीत होता है. लेकिन, ग्रीनलैंड का इतिहास हमारी सोच से कहीं अधिक जटिल है. क्योंकि, ग्रीनलैंड का स्वामित्व किसके पास है, यह प्रश्न इतिहास भर में गूंजता रहा है. 

संभवतः इसकी शुरुआत वाइकिंग युग से हुई थी. लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से, ग्रीनलैंड के स्वामित्व का जियोपॉलिटिक्स  महत्व लगातार बढ़ता रहा है. सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस द्वीप पर हमेशा से अमेरिका की नजर रही है और अब उसने इस पर कब्जा करने की अपनी मंशा को काफी तेजी से अमलीजामा पहनाने की कोशिश कर रहा है. 

ग्रीनलैंड सदियों से रणनीतिक महत्व का दावा कर सकता है; यह वाइकिंग्स से लेकर शीत युद्ध की महाशक्तियों तक , कई इतिहासों से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने इस पर अपनी-अपनी विचारधारा थोपने की कोशिश की। इतिहास में ग्रीनलैंड पर किसका अधिकार रहा है, और यह द्वीप रणनीतिक महत्व का क्यों बन गया है?

ग्रीनलैंड का मालिक कौन है?
ग्रीनलैंड आधिकारिक तौर पर एक देश नहीं है. ग्रीनलैंड डेनमार्क के स्वामित्व में है, लेकिन यह एक स्वायत्त और स्वशासित क्षेत्र है. इस द्वीप को औपचारिक रूप से 1953 में डेनिश साम्राज्य में शामिल कर लिया गया था, लेकिन तब से यह अपने संप्रभु राज्य से तेजी से अलग होकर अपना स्वायत्त स्वरूप विकसित कर रहा है. यहां ऐसे कानून पारित किए हैं जिनसे इसके अपने शासन की जिम्मेदारी बढ़ गई है. जब बात ग्रीनलैंड पर हक की आती है, तो सबसे पहले सवाल ये उठता है कि अतीत में इस द्वीप पर किसका नियंत्रण था? ग्रीनलैंड पर मालिकाना हक का इतिहास वाइकिंग युग से शुरू होता है. 

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प्रागैतिहासिक काल के बाद हजारों वर्षों तक एस्किमो लोगों की ग्रीनलैंड के विशाल शिकारगाहों तक पहुंच थी.  लेकिन इनके लिए जीवित रहना एक निरंतर चुनौती थी. यहां रहने के लिए बर्फ की परिवर्तनशीलता का ज्ञान और आर्कटिक मौसम चक्रों की जानकारी होना जरूरी था. यही वजह है कि ग्रीनलैंड कम से कम 4,500 वर्षों तक इसी अवस्था में मौजूद रहा और यहां से गुजरने वाली छोटी-छोटी आबादी को आश्रय प्रदान करता रहा.  जब तक कि 982 और 985 ईस्वी के बीच एरिक द रेड के कदम यहां नहीं पड़े. 

इस जिद्दी वाइकिंग योद्धा ने ग्रीनलैंड को बनाया घर 
एरिक द रेड एक जिद्दी वाइकिंग योद्धा था, जो ग्रीनलैंड के विषम और चुनौतीपूर्ण मौसम में भी यहां टिका रहा.  एरिक द रेड वो पहला शख्स था जो यहां अस्थायी तौर पर नहीं, बल्कि बस्ती बसाकर रहने का फैसला किया.  एरिक द रेड को हत्या करने के आरोप में आइसलैंड से निर्वासित कर दिया गया था. इसके बाद एरिक पश्चिम की ओर रवाना हुआ और नई धरती की खोज में भटक गया. जब वह ग्रीनलैंड पहुंचा तो उसने इस धरती को अपना घर बनाने के फैसला किया.

इस द्वीप को यह नाम- ग्रीनलैंड, एरिक द रेड ने ही दिया था. यहां आकर बसने वाले लोगों को आकर्षित करने के प्रयास में उसने इसका नाम भ्रामक रूप से रखा. ग्रीनलैंड का नाम सुनकर कोई भी इसे एक हरा-भरा प्रदेश समझ सकता है, जबकि वास्तविक में ये इसके विपरीत है. यहां चारों तरफ पथरीली भूमि और बर्फ ही बर्फ है. एरिक की  यह रणनीति कारगर साबित हुई. द्वीप पर लोग आने लगे और  दक्षिण-पश्चिमी तट पर छोटी-छोटी बस्तियां बस गईं. सदियों तक, ये निवासी खेती और यूरोप के साथ व्यापार के माध्यम से अपना जीवन यापन करते रहे, यहां तक कि वे हिमयुग की बढ़ती ठंड से भी जूझते रहे.

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यह भी पढ़ें: जब अमेरिका से टकराया था ग्रीनलैंड ... क्या है 1000 साल पुरानी 'वाइकिंग्स' की कहानी

ये वाइकिंग ग्रीनलैंडवासी इतने प्रसिद्ध थे कि वे अपनी ही एक गाथा - 'ग्रीनलैंडवासियों की गाथा' का विषय बन गए . बीबीसी के हिस्ट्रीएक्स्ट्री पॉडकास्ट के मुताबिक, इस गाथा में बताया गया है कि कैसे एरिक के बेटे, लीफ एरिकसन, ग्रीनलैंड से पश्चिम की ओर रवाना हुए और विनलैंड पहुंचे - जिसे अब न्यूफ़ाउंडलैंड के नाम से जाना जाता है. यह गाथा एरिक की बेटी फ्रेयडिस एरिक्सडॉटिर की नाटकीय कहानी भी बयां करती है , जिसके साहसी और क्रूर कारनामों ने वाइकिंग लोककथाओं में उसका स्थान पक्का कर दिया है.

नॉर्स लोग ग्रीनलैंड को अपनी दूरस्थ चौकी मानते थे, लेकिन यह वास्तव में कभी भी पूरी तरह से उनका नहीं रहा. 15वीं शताब्दी तक, वाइकिंग युग के पतन के साथ, द्वीप पर नॉर्स बस्तियां जलवायु परिवर्तन, अलगाव और बदलते व्यापार मार्गों की वजह से लुप्त हो गईं.

डेनमार्क का ग्रीनलैंड पर दावा
पहले मालिक की कहानी के बाद भी ये सवाल उठता है कि आखिर ग्रीनलैंड पर डेनमार्क का नियंत्रण कैसे हुआ. इसकी शुरुआत साहसी सोच वाले डेनिश-नॉर्वेजियन धर्म प्रचारक हंस एगेडे न होते, तो ग्रीनलैंड शायद यूरोपीय मानचित्रों से ही लुप्त हो गया होता. 1711 में, डेनमार्क के धर्म प्रचारक एगेडे ने ग्रीनलैंड की अपनी यात्रा के लिए अभियान शुरू किया. इसका उद्देश्य द्वीप पर बचे हुए नॉर्स निवासियों (जिनके बारे में उनका मानना ​​था कि वे अभी भी द्वीप पर निवास कर रहे हैं और संभवतः नॉर्स मूर्तिपूजा की ओर लौट रहे हैं) को ईसाई धर्म में परिवर्तित करना था.

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सन् 1721 में कुछ जहाजों के साथ एगेडे ग्रीनलैंड पहुंचे. उन्होंने पाया कि वहां इनुइट समुदाय उनकी अपनी दुनिया से और उनकी अपेक्षाओं से बिलकुल अलग दुनिया में रह रहे थे. इसके बावजूद, एगेडे ग्रीनलैंड में ही रुके रहे.  जहां उन्हें नॉर्स आबादी मिलने की उम्मीद थी, वहां उनकी गैरमौजूदगी थी और उनकी जगह ग्रीनलैंड के इनुइट कलाल्लिट लोग मिले. इस मिशन ने ग्रीनलैंड पर डेनमार्क के आधुनिक दावे की शुरुआत को चिह्नित किया, और एगेडे ने द्वीप पर अपने समय के दौरान द्वीप की राजधानी गोधैब की स्थापना की, जिसे अब नुउक के नाम से जाना जाता है.

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