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पुण्यतिथि: ज्योति बसु की ये इच्छा ताउम्र नहीं हो पाई पूरी

ज्योति बसु की आज पुण्‍यतिथि है. 17 जनवरी 2010 को उनकी मृत्‍यु कोलकाता में हुई थी. 23 साल तक पश्चिम बंगाल में बतौर मुख्‍यमंत्री काम करने वाले बसु के बारे में कभी ये कहा जाता था कि वे भारत के प्रधानमंत्री बन सकते थे.

प्रतीकात्मक फोटो प्रतीकात्मक फोटो

ज्योति बसु की आज पुण्‍यतिथि है. 17 जनवरी 2010 को उनकी मृत्‍यु कोलकाता में हुई थी. 23 साल तक पश्चिम बंगाल में बतौर मुख्‍यमंत्री काम करने वाले बसु के बारे में कभी ये कहा जाता था कि वे भारत के प्रधानमंत्री बन सकते थे. बसु का जन्म पूर्वी बंगाल (यानी अब का बांग्लादेश) में 8 जुलाई 1914 को हुआ. उन्होंने कलकत्ता के कैथोलिक स्कूल से पढ़ाई की. फिर सेंट जेविर्यस कॉलेज में पढ़े.

फिर वकालत की पढ़ाई करने लंदन चले गए. 1930 में उन्‍होंने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की सदस्यता ली. जल्‍द ही वे पार्टी में अहम पदों पर पहुंचे और फिर पश्चिम बंगाल के मुख्‍यमंत्री बने. बसु की सरकार ने राज्य में कई महत्‍वपूर्ण काम किए. ज्योति बसु की अधिकृत जीवनी लिखने वाले सुरभि बनर्जी ने अपनी किताब में इस बात का जिक्र किया है कि ज्‍योति बसु हमेशा प्रधानमंत्री बनना चाहते थे.

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हालांकि बसु ने खुद दो बार ये ऑफर ठुकराया था. पर 1996 में तीसरी बार उन्‍हें प्रधानमंत्री बनने का ऑफर मिला. इस बार वो प्रधानमंत्री बनने को तैयार थे. उन्‍होंने कहा था कि अगर पार्टी अनुमति देगी तो वे PM बनेंगे. लेकिन उन्‍हें धक्‍का तब लगा जब पार्टी ने उन्‍हें इसकी इजाजत नहीं दी. दरअसल केंद्र में किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला था और मिली-जुली सरकार बननी थी. पर बसु की पार्टी में इसके लिए एकमत नहीं बन सका.

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बसु ने काफी कोशिश की उनकी पार्टी केंद्र सरकार का हिस्‍सा बन जाए, पर पार्टी ने उनकी एक नहीं सुनी. पार्टी के कई सदस्‍य इस बात पर तैयार नहीं थे कि कांग्रेस समर्थन वाली केंद्र सरकार का हिस्‍सा बना जाए. बाद में ज्‍योति बसु ने कई इंटरव्‍यू में नाराजगी भी जताई थी और कहा था कि पार्टी का ये फैसला राजनीतिक द्वंद का परिणाम था. बाद में ये भी कहा गया कि माकपा की केंद्रीय कमेटी के कई सदस्यों ने पहले ही तय किया था कि बसु को प्रधानमंत्री बनने से रोकना है. खबरें आती रहीं कि पार्टी के इस फैसले से बसु काफी दुखी रहा करते थे.

बता दें कि इससे पहले 1989 लोकसभा चुनाव के बाद भी बसु को प्रधानमंत्री बनने का ऑफर दिया गया था. ये ऑफर उन्‍हें चंद्रशेखर और अरूण नेहरू ने दिया था. दूसरा मौका 1990 में मिला जब केंद्र में वीपी सिंह सरकार गिर गई थी. राजीव गांधी की नजर में तब ज्योति बसु भी थे. पर बसु ने मना कर दिया था.

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