AI के पसारते पैर ने बड़े-बड़े धुरंधरों को डरा दिया है. मिलेनियल्स को हमेशा से सबसे मजबूत पीढ़ी के रूप में देखा जाता है. उन्होंने 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के समय नौकरी की दुनिया में कदम रखा. उस दौर में भर्ती रुकी हुई थी, सैलरी बढ़ नहीं रही थी और नौकरियां स्थिर नहीं थीं. इसके बाद उन्होंने स्टार्टअप्स के बंद होने, बड़े पैमाने पर छंटनी और फिर कोरोना जैसी बड़ी महामारी का सामना किया. जब वर्क फ्रॉम होम आम नहीं था, तब भी उन्होंने उसे अपनाया. हर साल नई तकनीक और नए टूल्स सीखते रहे. जब सैलरी कम लगी, तो उन्होंने साइड इनकम के तरीके भी ढूंढ लिए.
लेकिन हाल के समय में जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, वह लोगों को बिल्कुल हैरान कर दे रहे हैं. सवाल यह है कि क्या सच में उनकी नौकरी खतरे में है या वे बस बदलते समय को समझकर सतर्क हो रहे हैं. आंकड़े बताते हैं कि ये मध्य-करियर पेशेवर एक तरफ अनुभव को साथ लेकर चलते हैं और दूसरी ओर खुद को असुरक्षित भी महसूस कर रहे हैं.
क्या बता रहे हैं आंकड़े?
हाल ही में ग्रेट प्लेस टू वर्क इंडिया के वॉयस ऑफ इंडिया सर्वे में पाया गया कि 49 फीसदी मिलेनियल्स को चिंता है कि आने वाले 3 से 5 सालों में एआई उनकी नौकरी या भूमिका को बदल सकता है. यह डर किसी भी दूसरी पीढ़ी के मुकाबले मिलेनियल्स में अधिक है. जरा सोचिए यह वहीं, पीढ़ी है जिसने एक के बाद एक बड़े संकटों का सामना किया और हर बार खुद को संभाल लिया, अब तकनीक और कोड से अपनी जगह छिन जाने के डर में है. यह दिखाता है कि इस बार चुनौती अलग और गहरी महसूस हो रही है.
AI का डर कोई शुरुआती लेवल की घबराहट नहीं
एआई का डर सिर्फ शुरुआती या नए कर्मचारियों की घबराहट नहीं है. सर्वे बताता है कि लगभग 10 में से 4 कर्मचारी इस बात को लेकर चिंता में हैं कि एआई उनकी नौकरी ले सकता है, चाहे वे कितने भी अनुभवी क्यों न हों और हैरानी की बात यह है कि जो लोग चिंतित हैं, उनमें से करीब 40 फीसदी लोग पहले से ही नौकरी छोड़ने का मन बना चुके हैं. यह सिर्फ नए या जूनियर लोग नहीं हैं, जो परेशान हैं. इसमें मैनेजर, टीम लीडर और प्रोजेक्ट हेड जैसे लोग भी शामिल हैं. यानी 30–40 साल की उम्र के वे प्रोफेशनल्स, जिन पर घर की EMI, बच्चों की फीस, बुजुर्ग माता-पिता और कमाई की बड़ी जिम्मेदारी होती है. मिलेनियल्स एक अजीब मोड़ पर खड़े हैं. वे जनरेशन Z की तरह पूरी तरह डिजिटल दुनिया में पैदा नहीं हुए लेकिन वे कंपनी के शीर्ष पर बैठे लीडर भी नहीं हैं. फिर भी, ज्यादातर कंपनियों का असली कामकाज इन्हीं के भरोसे चलता है. दुविधा यह है कि कई कंपनियों में 40 साल के आसपास के कर्मचारियों की छंटनी ज्यादा होती है, क्योंकि उन्हें युवा कर्मचारियों या ऑटोमेशन के मुकाबले महंगा माना जाता है. इसलिए यह चिंता सिर्फ कल्पना नहीं है, बल्कि बदलते समय और काम की दुनिया की सच्चाई से जुड़ी हुई है.
मेंटल हेल्थ पर पड़ रहा है असर
AI को लेकर जो डर दिख रहा है, वह पहले से मौजूद मानसिक और आर्थिक तनाव से जुड़ा हुआ है. डेलॉयट ग्लोबल 2025 Gen Z और मिलेनियल सर्वे में, 44 देशों के 23,000 से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया. इस दौरान कुछ अहम बातें सामने आई है जैसे-
AI को लेकर उत्साह
ग्रेट प्लेस टू वर्क के आंकड़े बताते हैं कि जब कंपनियां AI को बिल्कुल शुरुआती स्तर से आगे बढ़ाकर सही तरीके से लागू करती हैं, तो कर्मचारियों में AI को लेकर उत्साह 53% तक बढ़ जाता है. जो कंपनियां AI अपनाने में आगे हैं, वहां 61 प्रतिशत कर्मचारी महसूस करते हैं कि उन्हें नेतृत्व का पूरा समर्थन मिल रहा है. प्रमाणित और बेहतर वर्कप्लेस में एआई को लेकर 20 फीसदी ज्यादा सकारात्मक सोच देखी गई है यानि असली डर सिर्फ एआई से नहीं है, बल्कि इस बात से है कि उसे कंपनी में कैसे लागू कर रही है. अगर एआई को बिना सही जानकारी और बिना कर्मचारियों के भरोसे के लागू किया जाए तो चिंता और भी बढ़ जाती है. लेकिन जब खुलकर बात की जाती है, सही ट्रेनिंग दी जाती है और लोगों को सीखने का मौका मिलता है, तो आत्मविश्वास भी बढ़ता है. हालांकि, मिलेनियल्स सीखने से नहीं डरते. यही वह पीढ़ी है जिसने सोशल मीडिया मार्केटिंग, कोडिंग, क्रिप्टो और रिमोट काम करने के तरीके खुद सीखे हैं. वे बदलाव के साथ खुद को ढालने में माहिर हैं. उन्हें असली परेशानी एआई से नहीं, बल्कि पारदर्शिता की कमी और अनिश्चितता से होती है.
क्यों चिंता में हैं लोग?
तो फिर सवाल उठता है कि सबसे मजबूत जनरेशन इतनी परेशान क्यों है? इसका कारण है कि मिलेनियल्स ने अस्थिर और मुश्किल परिस्थितियों में जीना सीख लिया है. लेकिन बार-बार परेशानी से बच निकलने का मतलब यह नहीं कि वे अब डरते नहीं हैं. इसके बजाय, इससे वे शुरुआती चेतावनी के रूप में देखते हैं और ज्यादा सतर्क हो जाते हैं. उन्होंने देखा है कि कंपनियां रातोंरात ढह सकती हैं, काम बंद हो सकता है. इसलिए उनकी चिंता गलत नहीं, बल्कि अनुभव से मिली समझ और पैटर्न को पहचानने की क्षमता है.
क्या करना होगा सही?
सवाल अब ये पैदा होता है कि क्या मिलेनियल्स को नौकरी से निकाल देना चाहिए? यह सवाल आपको थोड़ा परेशान कर सकता है. अगर कोई भी जनरेशन बदलाव और अनिश्चितता को संभालने में सबसे ज्यादा एफिशिएंसी दिखाई है, तो वह मिलेनियल्स हैं. उन्होंने खुद को कई बार नए सिरे से ढाला है, एनालॉग और डिजिटल दुनिया दोनों में तालमेल बनाया है, नौकरी और भागदौड़ भरी जिंदगी दोनों को समझा है. तो सवाल यह होना चाहिए कि आखिर इतने मजबूत लोग खुद को क्यों असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.
अगर कोई मिलेनियल सचमुच नौकरी खोने से डर रहा है, तो दो कारण हो सकते हैं-
उसने खुद सीखना बंद कर दिया है.
संगठन ने नेतृत्व करना बंद कर दिया है.
हालांकि, पिछले अनुभवों को देखें तो संभावना ज्यादा है कि संगठन का नेतृत्व उन्हें असुरक्षित महसूस करा रहा है. ये वही लोग हैं जिन्होंने मंदी, स्टार्टअप फेल, नोटबंदी, महामारी और लगातार बदलती कंपनियों का सामना किया है. असल में वे मुश्किल हालात के लिए बहुत अच्छे से तैयार हैं. इसलिए मिलेनियल्स को इतना डरने की जरूरत नहीं है .