साल 2018 की बात है. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जा रही थी. उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के नरैना गांव के रहने वाले जयराय का परिवार भी बहुत खुश था. रात के समय उनके परिवार की दो बेटियां अंतिमा (6) और अंजना (5) शौच के लिए निकली. इसी दौरान सड़क पर एक बाइक सवार ने उन्हें टक्कर मार दी. टक्कर जोरदार थी, जिसकी वजह से दोनों बच्चियों को गंभीर चोट आई. आनन-फानन में उन्हें जिला अस्पताल ले जाया गया. पुलिस भी आई. एक बच्ची का अमाशय फट चुका था. इसकी वजह से डॉक्टरों ने उन्हें बीएचयू के लिए रेफर कर दिया. परिवार बच्चियों को लेकर वाराणसी पहुंचा. डॉक्टरों ने तुरंत ऑपरेशन की बात कहकर दवा लाने के लिए भेज दिया. उस वक्त जयराय की जेब में महज कुछ सौ रुपए पड़े हुए थे. ऐसे में हजारों रुपए की दवा कैसे खरीदे, इसी सोच में पड़े हुए थे.
उस वक्त इस घटना की सूचना मिलने पर एक पुलिस अफसर दोनों बच्चियों को देखने पहुंचे. अस्पताल जाकर जब उन्होंने जयराय की चिंता देखी तो तुरंत अपना एटीएम निकालकर उनके हाथ में दे दिया. उनसे कहा कि जितने पैसे इलाज के चाहिए जाकर निकाल लो. दोनों बच्चियों के इलाज में एक लाख से अधिक पैसे खर्च हुए थे. वो सब उस पुलिस अफसर ने अपने एटीएम से दिया. जयराय का परिवार उस पुलिस अफसर का एहसान आजतक नहीं भूला है. उस अफसर का नाम त्रिपुरारी पांडेय था, जो उस वक्त सकलडीहां के क्षेत्राधिकारी थे. त्रिपुरारी पांडेय इस वक्त हमारे बीच में नहीं हैं. मल्टी ऑर्गन फेल्योर की वजह से लखनऊ के एक अस्पताल में उनका 30 अक्टूबर को निधन हो गया. लेकिन उनके किए कर्म आज भी लोगों के जेहन में जिंदा हैं. इतना ही नहीं वो एक दिलेर और बहादुर पुलिस अफसर थे.
गरीबों के लिए मसीहा, अपराधियों के लिए काल थे
त्रिपुरारी पांडेय की उम्र 55 साल ही थी. लेकिन गंभीर बीमारी की वजह से उनकी तबियत लगातार बिगड़ रही थी. उनको लखनऊ के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था. वहां लंबे इलाज के बाद मल्टी ऑर्गन फेल्योर की वजह से उनका निधन हो गया. यूपी पुलिस से लेकर केंद्रीय मंत्री महेंद्र पांडेय ने भी उनके निधन पर दुख जताया है. कानपुर और चंदौली में तैनाती के दौरान उन्होंने जिस तरह काम किया था, वो काबिले-तारीफ था. वो एक तरफ गरीबों के लिए दिल में हमदर्दी रखते थे, तो दूसरी तरफ अपराधियों के काल थे. अपराधी उन्हें बाबा के नाम से पुकारते थे. जरायम की दुनिया में उनके नाम की दहशत थी. उन्होंने कई बड़े गिरोहों को साफ कर दिया था, जिनमें बावरिया गिरोह और संजय ओझा गिरोह का नाम प्रमुख है. एआरटीओ के वसूली सिंडीकेट को तोड़ने के बाद पूरे यूपी में उनका नाम हो गया.

सिपाही से डीएसपी तक सफर संघर्षों से भरा था
साल 1988 में त्रिपुरारी पांडेय ने बतौर सिपाही पुलिस महकमा ज्वाइन किया था. लेकिन सिपाही होते हुए भी वो किसी अफसर से ज्यादा तेज थे. उनके मुखबिरों का जाल गजब का था. उनके थाना क्षेत्र में कोई भी अपराध होता, सबसे पहले वो उसका खुलासा कर देते थे. उनके बेहतरीन काम को देखते हुए साल 1998 में उनको पहला आउट ऑफ टर्न प्रमोशन मिला. कांस्टेबल बनने के 10 साल बाद वो हेड कांस्टेबल बन गए. साल 2002 में एसआई की परीक्षा पास करने के बाद सब-इंस्पेक्टर बन गए. इस दौरान अपराधियों के खिलाफ उनका संघर्ष जारी रहा. उन्होंने कई बड़े केस सॉल्व किए. यही वजह है कि साल 2005 में उनको दोबारा ऑफ टर्न प्रमोशन मिल गया. वो उनके कंधों पर तीन स्टार चमकने लगे. वो इंस्पेक्टर बन चुके थे. साल 2016 में डिपार्टमेंटल रूटीन प्रमोशन होने के बाद डीएसपी बना दिए गए.
आजमगढ़ में जन्म, कानपुर में बिताई जिंदगी
त्रिपुरारी पांडेय का जन्म 6 जुलाई 1966 को आजमगढ में हुआ था. पुलिस विभाग में आने के बाद उन्होंने अपने करियर का लंबा समय कानपुर में बिताया था. वो करीब 25 वर्षों तक कानपुर के अलग-अलग थानों और सर्कल में तैनात रहे. पिछले साल एक केस की विवेचना में फंसने के बाद उनका ट्रांसफर कर दिया गया. वो कानपुर हिंसा केस के मुख्य विवेचक थे. आरोप है कि इस जांच में कई बड़े खेल हुए थे. इसमें उनका नाम भी आया, जिसके बाद शासन स्तर से उनका तबादला कर दिया गया. कानपुर पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया गया कि डीएसपी को तुरंत रिलीव कर दिया जाए. उनको पीटीएस जालौन भेज दिया गया. जालौन का ये पुलिस ट्रेनिंग स्कूल बीहड़ इलाके में बना है. कहा जाता है कि दंडित करने के लिए पुलिस अफसरों को यहां भेजा जाता है. लेकिन यहां जाने के बाद भी त्रिपुरारी पांडये ने नेक कार्य जारी रखा.
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गरीब बेटियों के लिए पिता और भाई का फर्ज
त्रिपुरारी पांडेय को गरीब बेटियों को पिता और भाई माना जाता था. उन्होंने खुद एक बार बताया था कि गरीब बच्चियों की शादी का संकल्प ले रखे हैं. जब उनको कोई भी गरीब परिवार याद करता है, तो वह अपने संकल्प को पूरा करने के लिए मौके पर जा पहुंचते हैं. ऐसा ही एक वाकया चंदौल में हुआ था. वो उस वक्त सकलडीहा में तैनाती के दौरान आम लोगों से जुड़ गए थे. यही वजह है कि कानपुर वापस आने के बाद भी वहां के लोगों के संपर्क में थे. उनको एक दिन पता चला कि सकलडीहा कोतवाली क्षेत्र के नरैना गांव में पटेल समाज के गरीब परिवार की बेटी की शादी पैसों की वजह से नहीं हो रही है. उन्होंने कानपुर से चंदौली जाकर धूमधाम से गरीब बेटी की शादी कराई. अपनी पत्नी के साथ मिलकर उसका कन्यादान किया. इस दौरान जमानिया कोतवाली की कोतवाल वंदना सिंह भी वहां पूरे समय मौजूद रही थी.