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लॉकडाउन में छिना रोजगार, गुरुग्राम में शख्स ने भूख से तंग आकर की आत्महत्या

आत्महत्या करने से दो दिन पहले ही शख्स ने अपना मोबाइल बेचा था. कोरोना वायरस से लड़ाई के बीच भूख की तड़प और परिवार की लाचारी ने शख्स को इतना परेशान किया कि उसने अपना 12 हजार का मोबाइल महज ढाई हजार रुपये में बेच दिया.

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बच्चों को खिलाने के लिए दो दिन पहले ही 2,500 में ही बेचा था मोबाइल
बच्चों को खिलाने के लिए दो दिन पहले ही 2,500 में ही बेचा था मोबाइल

  • घर में नहीं बची थी जमा-पूंजी
  • पीछे छोड़ गया चार बच्चे और बीवी

पहले लॉकडाउन की घोषणा के बाद दिल्ली में और दूसरे के बाद मुंबई में दिहाड़ी मजदूर और गरीब तबके के लोग सड़कों पर आ गए. वजह थी भूख. क्योंकि बिना घर-रोजगार, रोजाना 100-200 रुपये कमाने वाला गरीब कब तक बड़े शहरों में घर में बंद होकर रह सकता है. दिल्ली से सटे गुरुग्राम में शनिवार को एक ऐसा ही मामला सामने आया, जहां पेशे से पेंटर एक शख्स ने भूख और बेरोजगारी से परेशान होकर अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर ली.

आत्महत्या करने से दो दिन पहले ही शख्स ने अपना मोबाइल बेचा था. कोरोना वायरस से लड़ाई के बीच भूख की तड़प और परिवार की लाचारी ने शख्स को इतना परेशान किया कि उसने अपना 12 हजार का मोबाइल महज ढाई हजार रुपये में बेच दिया.

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इस पैसे से उनसे अपने चार बच्चे और पत्नी के लिए खाना खरीदा. इन दिनों छोटे से घर में चार बच्चों और पत्नी के साथ दोपहर बिताना असहनीय हो रहा था, इसलिए एक टेबल पंखा भी खरीदा. लेकिन इस ढाई हजार से वो अपने लिए सिर्फ दो दिन की जिंदगी ही खरीद सका और लाचार होकर आत्महत्या कर ली.

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मृतक शख्स का नाम मुकेश है जो बिहार के मधेपुरा का रहने वाला था. मुकेश अपने पीछे चार बच्चे और एक पत्नी छोड़ गया है. सबसे बड़ी लड़की सोनी जो 7 साल की है, उसके बाद गोलू (4 साल), काजल (2 साल) और सबसे छोटा बच्चा रवि जो अभी सिर्फ 5 महीने का है.

मुकेश अपने परिवार के साथ सरस्वती कुंज डीएलएफ फेज 5 की झुग्गियों में रहता था. लॉकडाउन की वजह से मुकेश की जमा-पूंजी खत्म हो गई थी. हालात इतने खराब थे कि उनके पास खाने तक के लिए पैसे नहीं थे. लॉकडाउन की वजह से रोजगार भी नहीं बचा, ऐसे में वो अपने बीवी बच्चों को खाना कहां से खिलाए, ये सोच-सोच कर परेशान हुआ जा रहा था.

हालांकि कुछ दिनों तक दोस्तों से भी पैसा मांगा, लेकिन जब कोई रास्ता नहीं सूझा तो अपना मोबाइल बेच दिया. इस पैसे से उसने परिवार के लिए आटा, चावल और चीनी खरीदा. साथ ही एक टेबल पंखा भी. क्योंकि छोटे से घर में इन दिनों गर्मी की वजह से रहना मुश्किल हो रहा था.

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दो दिनों के बाद फिर से खाने का संकट सामने आ गया. क्योंकि घर में पांच और लोग भी रह रहे हैं. मुकेश को कुछ समझ नहीं आया तो परेशान होकर घर में ही फंदे से लटककर आत्महत्या कर ली.

मुकेश की पत्नी पूनम ने आजतक को बताया कि उसके पास पति के अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं थे, लिहाजा पड़ोसियों ने चंदा जमा करके मुकेश का अंतिम संस्कार किया.

मुकेश की मौत ने सरकार के उस दावे की पोल खोल दी है. जाहिर है सभी राज्य सरकारें दावा कर रही है कि उनके यहां गरीबों के रहने और खाने की कोई दिक्कत नहीं है. यहां तक कि बिहार सरकार ने दूसरे राज्यों से यह भी अपील की थी कि उनके नागरिकों के खाने के लिए सभी जरूरी सामान मुहैया कराएं और इसके बदले में वो संबंधित राज्यों को फंड जारी करेंगे.

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मुकेश की मौत से आसपास की झुग्गियों में रहने वाले गरीब मजदूर परेशान हैं. आजतक से बात करते हुए उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस से हम भले ही बच जाएं लेकिन भूख हमारी जान जरूर ले लेगी.

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