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बजट से शेयर बाजार में 10 साल की सबसे बड़ी गिरावट, एक दिन में ही डूबे 3.46 लाख करोड़

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का दूसरा बजट शेयर बाजार की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है. बजट आते ही शेयर बाजार ने निराश किया है. हालात ये हो गए कि शेयर बाजार में 10 साल की सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली, जिससे निवेशकों के लाखों करोड़ स्वाह हो गए.

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10 साल की सबसे बड़ी गिरावट है
10 साल की सबसे बड़ी गिरावट है

  • बजट के दिन सेंसेक्‍स 39,735.53 अंक पर बंद हुआ
  • बजट के दिन निफ्टी टूटकर 11,661.85 अंक पर था

बीते 1 फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आम बजट पेश किया. इस बजट में किसान, महिला, युवा, छात्रों के अलावा मध्‍यम वर्ग के लिए कई खास ऐलान किए गए. वहीं कॉरपोरेट सेक्‍टर को भी राहत दी गई है. हालांकि निर्मला सीतारमण के इस बजट से शेयर बाजार का तत्‍काल रिएक्‍शन ठीक नहीं रहा. इसका नतीजा ये हुआ कि एक दिन में निवेशकों के 3.46 लाख करोड़ रुपये डूब गए.

कैसे डूब गए 3.46 लाख करोड़?

दरअसल, बजट से एक दिन पहले यानी 31 जनवरी को सेंसेक्‍स इंडेक्‍स बीएसई पर लिस्टेड कुल कंपनियों का मार्केट कैप 1,56,50,981.73 करोड़ रुपये था. वहीं बजट के दिन यानी 1 फरवरी को मार्केट कैप घटकर 1,53,04,724.97 करोड़ रुपये पर आ गया. इस लिहाज से सिर्फ एक कारोबारी दिन में निवेशकों को 3.46 लाख करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ है.

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10 साल की सबसे बड़ी गिरावट

यहां बता दें कि शनिवार को बजट के दिन सेंसेक्‍स ने 10 साल की सबसे बड़ी गिरावट देखी. कारोबार के अंत में सेंसेक्‍स 987.96 अंक या 2.43 फीसदी के नुकसान से 39,735.53 अंक पर बंद हुआ. इसी तरह निफ्टी 300.25 अंक या 2.51 फीसदी टूटकर 11,661.85 अंक पर आ गया. यहां बता दें कि शनिवार को साप्‍ताहिक अवकाश के दिन शेयर बाजार में कारोबार नहीं होता है, लेकिन इस बार आम बजट की वजह से बाजार खुला था.

क्‍या है बाजार में गिरावट की वजह?

1. शेयर बाजार में गिरावट की सबसे बड़ी वजह बजट में डिविडेंड डिस्ट्रिब्यूशन टैक्स/लाभांश वितरण कर (डीडीटी) को हटाना है. दरअसल, सरकार ने कंपनियों को राहत देने के लिए डीडीटी हटा दिया है. डीडीटी, वो टैक्‍स होता है जो कंपनी की ओर से शेयर धारकों को जारी किए जाने वाले डिविडेंट यानी लाभांश पर लगता है. अब कंपनियों पर ये टैक्‍स नहीं लगेगा लेकिन बजट में शेयरधारकों को डीडीटी पर कोई राहत नहीं दी गई है. यही वजह है कि शेयरधारकों में निराशा का माहौल है. 

2.  डीडीटी के हटाए जाने से सरकार का राजस्व 25,000 करोड़ रुपये तक कम होने वाला है. सरकार ने ये फैसला ऐसे समय में लिया है जब राजकोषीय घाटे में लगातार इजाफा हो रहा है. दरअसल, सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.8 फीसदी कर दिया है. इससे पहले राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 3.3 प्रतिशत रखा गया था. जाहिर सी बात है कि सरकार अपने ही लक्ष्‍य को हासिल नहीं कर सकी है. बढ़ते राजकोषीय घाटे का असर वही होगा जो आपकी कमाई के मुकाबले खर्च बढ़ने पर होता है. खर्च बढ़ने की स्थिति में सरकार को कर्ज लेना पड़ता है.

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3. सरकार अगले वित्त वर्ष में बाजार से 5.36 लाख करोड़ रुपये का कर्ज जुटाएगी. वहीं चालू वित्त वर्ष 2019-20 के मार्च तक 4.99 लाख करोड़ रुपये कर्ज जुटाने का लक्ष्‍य रखा गया है.  इससे पहले सरकार ने कर्ज जुटाने के लिए 4.48 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्‍य रखा था. ऐसे में साफ है कि सरकार को बाजार से अब पहले के मुकाबले अधिक कर्ज लेना पड़ेगा.

4. बजट में अगले वित्त वर्ष में विनिवेश से 2.10 लाख करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा गया है. यह चालू वित्त वर्ष के संशोधित 65,000 करोड़ रुपये के अनुमानित लक्ष्य से करीब तीन गुना है. ऐसे में आशंका है कि सरकार अगले वित्त वर्ष में इस लक्ष्‍य को हासिल करने के लिए LIC की तरह कई अन्‍य कंपनियों में अपनी हिस्‍सेदारी बेच सकती है. यहां बता दें कि 5 जुलाई 2019 को पेश किए गए बजट में चालू वित्त वर्ष में विनिवेश से 1.05 लाख करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन अब इसे संशोधित कर 65,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है.

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5. इसके अलावा बाजार को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स में राहत की उम्मीद थी, जिस पर झटका लगा है. वहीं ऑटो, रियल एस्‍टेट सेक्‍टर को भी बजट में कोई सरप्राइज नहीं मिला है. यही वजह है कि निवेशकों में निराशा का माहौल है.

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