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तो सरकारी तेल कंपनियों को ईंधन नहीं देगी निजी रिफाइनरी...

सरकार यदि पेट्रोल और डीजल की कीमतें तय करने का मॉडल बदलती है, तो एस्सार ऑयल और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी निजी क्षेत्र की तेल रिफाइनरी कंपनियां संभवत: सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों को ईंधन की बिक्री नहीं करेंगी.

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सरकार यदि पेट्रोल और डीजल की कीमतें तय करने का मॉडल बदलती है, तो एस्सार ऑयल और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी निजी क्षेत्र की तेल रिफाइनरी कंपनियां संभवत: सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों को ईंधन की बिक्री नहीं करेंगी.

वित्त मंत्रालय चाहता है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें उन्हें बाजार में प्राप्त होने वाले मूल्य के बराबर हो. अभी तेल का खुदरा करोबार करने वाली कंपनियों के लिए तेल का दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रचलित क्रय मूल्य, उस पर भाड़ा तथा 2.5 प्रतिशत आयात शुल्क को जोड़कर तय किया जाता है.

सरकारी विपणन कंपनियों को नियंत्रित मूल्य पर बिक्री से होने वाली राजस्व हानि की गणना इस आयात मूल्य समानता वाले माडल के तहत ही की जाती है.

वित्त मंत्रालय निर्यात-मूल्य समानता का मॉडल अपनाए जाने की वकालत कर रहा है, जिसमें आयात शुल्क और भाड़े का अंश शामिल नहीं होगा. इससे ईंधन सब्सिडी का बोझ कम होगा. पर इस प्रस्तावित माडल से निजी रिफाइनरियों को प्रति बैरल 3 से 4 डॉलर की प्राप्ति कम हो सकती है.

उद्योग सूत्रों का कहना है कि निजी क्षेत्र की रिफाइनरी कंपनियों का मानना है कि यदि उन्हें निर्यात मूल्य समानता आधारित मॉडल पर तेल बेचना पड़ा, तो वे घरेलू बाजार में तेल बेचने की बजाय निर्यातोन्मुख इकाई (ईओयू) या विशेष निर्यात क्षेत्र (सेज) इकाई स्थापित कर विदेश में तेल बेचेंगी. इससे उन्हें सात साल तक आयकर से छूट के अलावा शुल्क मुक्त आयात जैसी रियायते भी प्राप्त होंगी, और उत्पाद शुल्क भुगतान भी नहीं करना होगा.

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रिफाइनरी कंपनियों ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को स्पष्ट रूप से कह दिया है कि वे निर्यात आधारित मूल्य के हिसाब से वाहन तथा कुकिंग गैस नहीं बेचेंगी.

इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम तथा भारत पेट्रोलियम अपने पेट्रोल पंपों से जो डीजल बेचती हैं उनमें से 20 प्रतिशत की आपूर्ति एस्सार और रिलायंस द्वारा की जाती है.

दोनों कंपनियों की गुजरात रिफाइनरियों से आपूर्ति नहीं मिलने की स्थिति में सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों के पास घरेलू मांग की पूर्ति करने के लिए सिर्फ आयात का विकल्प बचेगा. ईंधन का आयात घाटे का सौदा होगा, क्योंकि उन्हें परिवहन लागत तथा सीमा शुल्क की भरपाई नहीं होगी.

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