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परफॉर्मेंस नहीं पॉलिटिकल वजह से 'पावर लेडी' बनीं निर्मला सीतारमण!

बीते तीन साल के दौरान बतौर कॉमर्स मिनिस्टर निर्मला सीतारमण की ऐसी क्या उपलब्धियां रहीं कि परफॉर्मेंस को आधार बनाकर उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई? या फिर दी गई इस जिम्मेदारी का महज राजनीतिक कारण है कि निर्मला एक 'पावर लेडी' बनकर उभरी हैं.

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ये दांव बीजेपी का दक्षिण राज्यों में पकड़ बनाने के लिए है
ये दांव बीजेपी का दक्षिण राज्यों में पकड़ बनाने के लिए है

केंद्र में मोदी सरकार के सबसे अहम कैबिनेट विस्तार में प्रमुख धारणा थी कि परफॉर्मेंस को आधार मान कर मंत्रियों के विभाग में बड़े फेरबदल किए जाएंगे. इस धारणा के विपरीत निर्मला सीतारमन को कॉमर्स मिनिस्ट्री से प्रमोट कर सीधे डिफेंस की जिम्मेदारी दे दी गई. बीते तीन साल के दौरान बतौर कॉमर्स मिनिस्टर निर्मला सीतारमण की ऐसी क्या उपलब्धियां रहीं कि परफॉर्मेंस को आधार बनाकर उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई? या फिर दी गई इस जिम्मेदारी का महज राजनीतिक कारण है कि निर्मला एक 'पावर लेडी' बनकर उभरी हैं.

बीजेपी के लिए दक्षिण भारत से अबतक वेंकैया नायडू सबसे बड़ा चेहरा था. उन्हें उपराष्ट्रपति बना दिए जाने के बाद पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती दक्षिण में एक नया चेहरा देने की थी. निर्मला तमिलनाडु से हैं. दक्षिण के राज्यों में सभी राजनीतिक दलों से उनके अच्छे संबंध रहे हैं और उनका पूरा राजनीतिक सफर विवादों से दूर रहा है. ऐसे में वेंकैया की जगह लेने के लिए बीजेपी के पास निर्मला से बेहतर कोई और नेता नहीं था.

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तमिलनाडु से होने के साथ-साथ निर्मला की पढ़ाई-लिखाई दिल्ली में हुई है. इसी वजह से अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी पर भी उनकी पकड़ रही है. साथ ही वह तमिल के अलावा अन्य दक्षिण क्षेत्र की भाषाओं में भी संवाद कर सकती हैं. वह पूर्व में पार्टी की प्रवक्ता पद की जिम्मेदारी भी बखूबी निभा चुकी हैं. लिहाजा, निर्मला के रूप में बीजेपी को राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े चेहरे की कमी को पूरा करने का मौका मिल गया है.

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दक्षिण के राज्यों में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2018 में कर्नाटक और आंध्रप्रदेश के विधानसभा चुनाव है. वहीं, कैबिनेट विस्तार से पहले और वेंकैया नायडू के उपराष्ट्रपति बनने के बाद मोदी सरकार में दक्षिण से कोई बड़ा मंत्री नहीं था. निर्मला को प्रमोट कर मोदी सरकार ने इन राज्यों को साफ संकेत दिए हैं कि केंद्र की सरकार में दक्षिण राज्यों की अपनी अहमियत है.

इनके अलावा निर्मला को पावर लेडी बनाने में एक अहम पक्ष यह था कि मोदी सरकार में किसी तेज-तर्रार व्यक्ति के हाथ में डिफेंस मंत्रालय की कमान नहीं दी जानी थी. जिसके चलते बार-बार यह मंत्रालय बतौर अन्य कमान के तौर पर वित्त मंत्री के अधीन रहा. अब डिफेंस की जिम्मेदारी निर्मला को देने के बाद साफ है कि मंत्रालय के सभी छोटे-बड़े फैसले प्रधानमंत्री की निगरानी में लिए जा सकेंगे.

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गौरतलब है कि इन राजनीतिक कारणों से निर्मला को डिफेंस मंत्रालय का कार्यभार दिया गया है, यह इससे भी स्पष्ट होता है कि बीते 3 साल के दौरान बतौर कॉमर्स मिनिस्टर उनकी कोई खास उपलब्धि नहीं रही. पिछले तीन साल के दौरान एक्सपोर्ट के आंकड़े हों या इंडस्ट्रियल सेक्टर के परफॉर्मेंस या फिर लगातार जीडीपी में दर्ज होती गिरावट इस बात को और पुख्ता करती हैं कि निर्मला का योगदान कोई खास नहीं रहा है. आर्थिक फ्रंट पर इस स्थिति के लिए सिर्फ वित्त मंत्री अरुण जेटली को अकेले जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि इन क्षेत्रों में उनके साथ निर्मला का भी दायित्व रहा है.

 

 

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