प्रख्यात अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया ने कहा कि भारत को कोरोना संकट का फायदा उठाते हुए चीन से बाहर निकलने वाली कंपनियों को अपने यहां आकर्षित करना चाहिए.
उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी के मद्देनजर संभव है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन से अपने ऑपरेशन को दूसरी जगह ले जाएं, जिसका भारत को फायदा उठाना चाहिए और औपचारिक क्षेत्र में अच्छे वेतन वाली नौकरियां तैयार करने के लिए दीर्घकालिक सोच के साथ काम करना चाहिए.
नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष पनगढ़िया फिलहाल कोलंबिया विश्वविद्यालय में इकोनॉमी के प्राध्यापक हैं. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि मौजूदा संकट ने यह उजागर किया है कि किसी ऐसे झटके से भारतीय श्रमिक कितने असुरक्षित हैं.
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दूर की सोचने का है समय
पनगढ़िया ने न्यूज एजेंसी पीटीआई से कहा, 'अब दूर की सोचने का समय है. संकट को व्यर्थ गंवा देना ठीक नहीं होगा. टीका उपलब्ध होने के बाद ही मौजूदा संकट खत्म होगा. निश्चित रूप से हमें उससे आगे सोचना होगा.'
गौरतलब है कि अब ज्यादातर जानकार यह मानने लगे हैं कि कोरोना के बाद वाले दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी मैन्युफैक्चरिंग और अन्य ऑपरेशन चीन से हटाना चाहेंगी और यह भारत जैसे उसके पड़ोसी देशों के लिए एक बड़ा मौका है.
बिजनेस टुडे में छपी एक खबर के अनुसार कोरोना वायरस के कारण चीन में विदेशी कंपनियों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. इस माहौल में लगभग 1000 विदेशी कंपनियां भारत में एंट्री की सोच रही हैं. इनमें से करीब 300 कंपनियां भारत में फैक्ट्री लगाने को लेकर पूरी तरह से मूड बना चुकी हैं. इस संबंध में सरकार के अधिकारियों से बातचीत भी चल रही है.
श्रमिकों के साथ हुआ अन्याय
पनगढ़िया ने कहा, ‘विकास के लिए 70 साल के प्रयास के बाद भी हमने अपने श्रमिकों को मुख्य रूप से छोटे-छोटे खेतों (उसमें से सात करोड़ औसतन चौथाई हेक्टेयर से कम आकार के जोत वाले हैं) और अनौपचारिक क्षेत्र में या स्वरोजगार के छोटे-मोटे धंधों में काम करने के लिए छोड़ दिया है, जिससे उन्हें हर दिन मुश्किल से गुजारा करने भर की आमदनी हो पाती है.'
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छोटे और मझोले उद्योगों को बढ़ावा देना होगा
पनगढ़िया ने जोर देकर कहा कि कोविड-19 संकट ने यह साफ कर दिया है कि भारत को बेहतर भुगतान वाली औपचारिक क्षेत्र की नौकरियों की जरूरत है और इसके लिए जरूरी है कि श्रमिक छोटे खेतों और कामधंधों से निकलकर अधिक उत्पादक तथा बेहतर भुगतान करने वाली नौकरियों में लगें.
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