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लॉकडाउन की वजह से UPI लेनदेन में गिरावट, RTGS की बढ़ी डिमांड

लॉकडाउन का असर यूपीआई भुगतान प्रणाली पर पड़ा है. मार्च महीने में यूपीआई के जरिए लेनदेन में बड़ी गिरावट दर्ज की गई.

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3 मई तक के लिए बढ़ा है लॉकडाउन
3 मई तक के लिए बढ़ा है लॉकडाउन

  • मार्च में यूपीआई लेनदेन की संख्या 124.68 करोड़ रह गई है
  • अब अप्रैल में बड़ी गिरावट की आशंका जाहिर की जा रही है

लॉकडाउन की वजह से मार्च महीने में यूपीआई लेनदेन में कमी आई है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक मार्च में यूपीआई लेनदेन की संख्या घटकर 124.68 करोड़ रह गई, जबकि फरवरी में 132.57 करोड़ थी. इसी तरह यूपीआई लेनदेन का मूल्य भी फरवरी के 2.23 लाख करोड़ रुपये से घटकर मार्च में 2.06 करोड़ रुपये रह गया.

मार्च के आंकड़ों के बाद अब अप्रैल में बड़ी गिरावट की आशंका जाहिर की जा रही है. दरअसल, मार्च में सरकार ने कोरोना वायरस महामारी के प्रकोप को रोकने के लिए 25 मार्च से पूरे देश में लॉकडाउन लागू किया था, जिससे यूपीआई लेनदेन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है.

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हालांकि लॉकडाउन के वास्तवित असर का पता अप्रैल के आंकड़े आने के बाद पता चलेगा. यहां आपको बता दें कि भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) द्वारा विकसित यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) तत्काल भुगतान प्रणाली है. कुछ महीनों को छोड़ दें तो यूपीआई लेनदेन की संख्या और मूल्य, दोनों लगातार बढ़े हैं.

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इसी तरह, आईएमपीएस (तत्काल भुगतान सेवा) लेनदेन की संख्या भी मार्च में घटकर 21.68 करोड़ रह गई, जबकि फरवरी में यह आंकड़ा 24.78 करोड़ था. इस दौरान लेनदेन का मूल्य भी 2.14 लाख करोड़ रुपये से घटकर 2.01 लाख करोड़ रुपये रह गया.

इस बीच रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक आरटीजीएस (तत्काल सकट निपटान) लेनदेन में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. फरवरी के मुकाबले मार्च में आरटीजीएस 34 प्रतिशत बढ़कर 120.47 लाख करोड़ रुपये हो गया.

UPI-आईएमपीएस-आरटीजीएस

यूपीआई एक अंतर बैंक फंड ट्रांसफर की सुविधा है, जिसके जरिए स्मार्टफोन पर फोन नंबर और वर्चुअल आईडी की मदद से पेमेंट की जा सकती है. वहीं, आईएमपीएस के जरिए ग्राहकों को तत्काल भुगतान सेवा मिलती है. इसके जरिए ग्राहक एक दिन में दो लाख रुपये तक भेज सकते हैं. वहीं अगर आरटीजीएस की बात करें तो जैसे ही आप पैसा ट्रांसफर करें, कुछ ही देर में वह खाते में पहुंच जाएगा. आरटीजीएस दो लाख रुपये से अधिक के ट्रांसफर के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

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