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सुझाव मानते, तो 2जी पर 4 गुना होता फायदा: पूर्व कैबिनेट सचिव

2जी घोटाले पर नए खुलासाओं का दौर अभी थमा नहीं है. पूर्व कैबिनेट सचिव केएम चंद्रशेखर के एक दावे ने सियासी गलियारों में फिर से हलचल मचा दी है.

मनमोहन सिंह मनमोहन सिंह

2जी घोटाले पर नए खुलासाओं का दौर अभी थमा नहीं है. पूर्व कैबिनेट सचिव केएम चंद्रशेखर के एक दावे ने सियासी गलियारों में फिर से हलचल मचा दी है.

पूर्व कैबिनेट सचिव केएम चंद्रशेखर ने खुलासा है किया कि उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 2जी स्पेक्ट्रम के लिए प्रवेश शुल्क ऊंचा रखने का सुझाव दिया था. उनके सुझाव के अनुसार चलने पर सरकार को 35,000 करोड़ रुपये का राजस्व मिलता, जो वास्तव में हासिल हुए कुल राजस्व की तुलना में चार गुना अधिक है.

2जी की जांच में मिलेगी मदद
चंद्रशेखर ने 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के समक्ष कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 4 दिसंबर, 2007 को पत्र लिखकर यह सुझाव दिया था. बीजेपी सदस्यों ने जेपीसी की बैठक का बहिष्कार किया. चंद्रशेखर जून, 2007 से जून, 2011 तक कैबिनेट सचिव रहे. उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री ने उनसे 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन पर ट्राई की सिफारिशों के वित्तीय प्रभाव का आकलन करने को कहा था. इस बारे में मीडिया में आई खबरों तथा प्रधानमंत्री कार्यालय को मिले पत्रों के बाद यह निर्देश मिला था.

राजस्‍व की हानि पर मंथन
बैठक के बाद जेपीसी के चेयरमैन पीसी चाको ने कहा, ‘चंद्रशेखर ने संभवत: फोन का घनत्व बढ़ने, महंगाई तथा उपभोक्ता आधार में बढ़ोतरी के मद्देनजर प्रवेश शुल्क बढ़ाने की संभावना का सुझाव दिया था.’ चाको ने पूर्व कैबिनेट सचिव द्वारा प्रधानमंत्री को भेजे नोट का हवाला देते हुए कहा, ‘यदि नीलामी होती है और यदि नीलामी नहीं है, तो राजस्व पर क्या असर पड़ेगा. विभिन्न पहलुओं तथा 2001 के शुल्क (1658 करोड़ रुपए) की 2008 में सूचकांकों के आधार पर तुलना करने पर यह करीब करीब 35,000 करोड़ रुपये बैठेगा.’

सरकार ने 2जी स्पेक्ट्रम का आवंटन जनवरी, 2008 में किया था. उस समय अखिल भारतीय लाइसेंस और सम्बद्ध स्पेक्ट्रम के लिए प्रवेश शुल्क 1,658 करोड़ रुपये रखा गया था. उसके आधार पर सरकार को 9,000 करोड़ रुपये का राजस्व मिला था.

सिन्हा ने पत्र में कहा, ‘मेरे विचार से, इस बारे में कोई विवाद नहीं हो सकता कि घोटाला असामान्य प्रकृति का है और समिति को अलग प्रक्रिया अपनाने का अधिकार है जैसा कि पूर्व में अन्य जेपीसी ने लोकसभा अध्यक्ष की अनुमति से किया.’ उन्होंने तर्क दिया कि सिंह ने इसी मुद्दे पर संसद की लोकलेखा समिति के सामने उपस्थित होने की पेशकश की थी और उन्हें जेपीसी के समक्ष गवाही देने में कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए.

कांग्रेस का मत सबसे जुदा
बहरहाल, कांग्रेस को टू जी मामले की जांच कर रही जेपीसी के सामने प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री को बुलाने की भाजपा की मांग के पीछे टू जी स्पेक्ट्रम आवंटन में हिस्सेदारी रखने वाले

उद्योग घरानों को बचाने का प्रयास नजर आता है. कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा, ‘जेपीसी में छूट का दायरा 1998 से 2009 तक बढ़ा है. इस प्रक्रिया में तीन साझेदार- कार्यपालक, नियामक और उद्योग घराने हैं. कार्यपालक और नियामकों से गहन पूछताछ हुई लेकिन उद्योग जगत से जुड़े लोगों से पूछताछ नहीं हुई. मंत्रियों को तलब करने की मांग उद्योग जगत के लोगों को बचाने का जरिया हो सकती है.’

तिवारी भी जेपीसी के सदस्य हैं. उन्होंने समिति की पिछली बैठक में मांग की थी कि नीरा राडिया के टेपों की लिखित प्रतिलिपी जेपीसी के समक्ष मुहैया कराई जाए ताकि राजनीतिकों और उद्योग घरानों की सांठगांठ को समझा जा सके. शनिवार को समिति की बैठक में पूर्व मंत्रिमंडलीय सचिव केएम चंद्रशेखर गवाह के तौर पर पेश होंगे.

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