नोएडा अथॉरिटी में करोड़ों रुपये के मुआवजा घोटाले और उसमें संलिप्त अधिकारियों के खिलाफ चल रही जांच को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है. 22 साल पुराने अधिग्रहण मामले में दोबारा मुआवजा बांटने के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच कर रही एसआईटी (SIT) को अपनी तफ्तीश पूरी करने के लिए 8 सप्ताह की मोहलत और दे दी है. यह मामला नोएडा अथॉरिटी के निलंबित अधिकारियों कानूनी अधिकारी दिनेश कुमार सिंह और सहायक कानूनी अधिकारी वीरेंद्र सिंह नागर से जुड़ा है.
क्या है पूरा मामला?
इन अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने भू-स्वामियों के साथ मिलीभगत कर 7 करोड़ रुपये से अधिक का नया मुआवजा जारी करवाया. चौंकाने वाली बात यह है कि यह मुआवजा अधिग्रहण के 22 साल बाद दिया गया, जबकि भू-स्वामियों को पहले ही भुगतान किया जा चुका था. सरकारी धन के इस दुरुपयोग ने अथॉरिटी के भीतर एक बड़े संगठित भ्रष्टाचार की ओर इशारा किया है.
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SIT ने सीलबंद लिफाफे में सौंपी स्टेटस रिपोर्ट
मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष SIT ने अपनी जांच रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में पेश की. अदालत को दी गई जानकारी के अनुसार इस घोटाले से प्रभावित 200 से अधिक लोगों में से 114 के बयान दर्ज किए जा चुके हैं. मामले में आरोपी 12 अधिकारियों में से 11 से पूछताछ की जा चुकी है. SIT अब इन अधिकारियों और उनके परिवार के सदस्यों की संपत्तियों की जांच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या उनके पास आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति है.
जांच टीम ने अदालत से अतिरिक्त समय मांगते हुए कहा कि अधिकारियों और उनके परिजनों की संपत्तियों का विवरण अभी पूरी तरह जुटाया जाना बाकी है. साथ ही, मुख्य आरोपी अधिकारियों के विस्तृत बयान दर्ज करने की प्रक्रिया भी अभी पूरी होनी है. कोर्ट ने SIT की दलीलों को स्वीकार करते हुए जांच का दायरा बढ़ाने और विवरण जुटाने के लिए 8 सप्ताह का समय प्रदान किया.
अगले दो महीनों में SIT की जांच का मुख्य केंद्र इन अधिकारियों की आर्थिक कुंडली खंगालना होगा. अगर बेनामी संपत्तियों और अवैध कमाई के सबूत मिलते हैं, तो नोएडा अथॉरिटी के इन अधिकारियों की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं.