जून 2012 में तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा राष्ट्रपति पद के लिए चुने जाने के बाद प्रणब मुखर्जी ने कहा कि 'मेरी पार्टी और यूपीए-2 की ओर से राष्ट्रपति पद के लिए मुझे उम्मीदवार चुना गया है. मैं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का अभार व्यक्त करता हूँ और इस निर्णय को विनम्रता पू्र्वक स्वीकार करता हूँ.'
2012 में कांग्रेस ने भावी राजनीतिक संभावनाओं के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाला एक और काम किया. वो काम था प्रणब दा को सक्रिय राजनीति के पथ से हटाकर राष्ट्रपति बनाकर रायसीना हिल का रास्ता दिखा देना. अनुशासित सिपाही की तरह प्रणब दा ने इसे भी चुनौती की तरह लिया. प्रणब दा राष्ट्रपति बन गए लेकिन पिछले 5 साल में कांग्रेस किस गर्त में पहुंच गई, ये किसी से छुपा नहीं है.
सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने कथित शाइनिंग एनडीए को धूल चटा दी थी. कांग्रेस के एक सुर में आग्रह करने के बाद भी सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनने को तैयार नहीं हुईं. यूपीए का नेतृत्व करने के लिए कांग्रेस ने डॉ मनमोहन सिंह को चुना. जबकि प्रणब मुखर्जी कहीं ज्यादा राजनीतिक अनुभव और प्रशासनिक योग्यता रखते थे. यूपीए के 10 साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री बेशक डॉ सिंह थे लेकिन कांग्रेस के लिए हर मुश्किल मौके पर प्रणब मुखर्जी ने संकटमोचक की भूमिका निभाई.
2004 में मौका एक बार फिर कांग्रेस को नया प्रधानमंत्री देने का था. चुनाव के नतीजों के बाद सोनिया गांधी नैचुरल च्वाइस थी तो प्रणब मुखर्जी खुद सबसे प्रबल दावेदार थे. लेकिन राजनीति को प्रणब इस बार भी मंजूर नहीं थे. सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद पर बैठने से इंकार कर दिया लेकिन नंबर प्रणब का भी नहीं आया. मौका मिला मनमोहन सिंह को जो खुद राजनीति का हुनर प्रणब दा से सीख रहे थे.
कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में सोनिया गांधी भी इस हद तक मजबूर हुई कि उन्हें पार्टी की कमान छोड़नी पड़ी थी. मुद्दा उनके विदेशी मूल का था और यह कि उन्हें भारत की राजनीति का कोई जमीनी अनुभव नहीं था. इस आरोपों को धता करने के लिए प्रणब दा ने मोर्चा संभाला और उसके बाद सोनिया को जमीनी राजनीति से रूबरू कराने के साथ-साथ उनके भारतीय होने पर उठे सवालों को बेमानी किया. इसके लिए अपनी राजनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए प्रणब दा ने एक बार फिर कांग्रेस की कमान सोनिया के हाथ में तय की.
उनकी इस प्रतिभा की कायल सोनिया ने भी इसके बाद अपने सभी राजनीतिक फैसलों को लेने में प्रणब दा को बगल में रखा. पार्टी के करीबियों का मानना है कि सोनिया की कमान वाली कांग्रेस में पार्टी में वही होता था जो प्रणब दा सोनिया से कहते थे. वहीं सोनिया भी खुले तौर पर दावा कर चुकी थीं कि इंदिरा गांधी के दौर में उन्होंने हमेशा प्रणब दा को एक महत्वपूर्ण सलाहकार की भूमिका में देखा था लिहाजा उनके लिए भी प्रणब की अहमियत पार्टी में सर्वोपरि थी.
कांग्रेस में कभी इंदिरा गांधी के बेहद करीबी रहे प्रणब को एक बार फिर सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस में अहम किरदार मिला. नरसिंहा राव और सीताराम केसरी के दौर में जहां यह माना जाने लगा था कि पार्टी से हमेशा हमेशा के लिए गांधी परिवार को दरकिनार कर दिया गया है वहीं प्रणब ने अहम भूमिका अदा करते हुए एक बार फिर सोनिया को कांग्रेस के शीर्ष पर स्थापित कर दिया.
प्रणब मुखर्जी 1969 में पहली बार राज्य सभा में चुनकर आए. फरवरी 1973 में पहली बार केंद्रीय मंत्री बनने के बाद मुखर्जी ने पिछले चालीस साल में कांग्रेस की या उसके नेतृत्व वाली सभी सरकारों में मंत्री पद संभाला है. वर्ष 1996 से लेकर 2004 तक केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार रही लेकिन 2004 में यूपीए के सत्ता में आने के बाद से ही प्रणब मुखर्जी केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी के लिए अहम भूमिका निभाते रहे.
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद बनी राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में प्रणब मुखर्जी को शामिल नहीं किया गया. नतीजा यह कि प्रणब ने कांग्रेस का दामन छोड़ दिया और राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस के नाम से नई पार्टी बना ली. लेकिन 1991 में बनी पीवी नरसिंहा राव की कांग्रेस सरकार से एक बार फिर पार्टी में उनकी वापसी हुई. नरसिंहा राव ने प्रणब को योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया और यहीं से शुरू हुई सोनिया गांधी के साथ उनकी नई केमिस्ट्री.