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सरकार को सुप्रीम कोर्ट में झटका, वेदांता मामले में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ के आदेश को रखा बरकरार

सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश के रवा (Ravva) तेल एवं गैस फील्ड से लागत वसूली के मामले में विदेशी मध्यस्थ के आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें वेदांता को ज्यादा लागत वसूलने का अधिकार दिया गया है.  इससे सरकार को करीब 30 करोड़ डॉलर (करीब 2220 करोड़ रुपये) का नुकसान होगा. 

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के खिलाफ दिया आदेश सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के खिलाफ दिया आदेश
स्टोरी हाइलाइट्स
  • सरकार को सुप्रीम कोर्ट में बड़ा झटका
  • वेदांता को तेल एवं गैस मामले में जीत
  • सरकार को हो सकता 2220 करोड़ का नुकसान

वेदांता के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट में सरकार को बड़ा झटका मिला है. सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश के रवा (Ravva) तेल एवं गैस फील्ड से लागत वसूली के मामले में विदेशी मध्यस्थ (Arbitration) के आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें वेदांता को ज्यादा लागत वसूलने का अधिकार दिया गया है. 

इससे सरकार को करीब 30 करोड़ डॉलर (करीब 2220 करोड़ रुपये) का नुकसान होगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मलेशिया के कोर्ट ने मामले का सही तरीके से परीक्षण किया था और उसके आदेश से भारत सरकार की किसी नीति पर चोट नहीं पहुंचती, क्योंकि यह बाद का मामला है. कोर्ट ने कहा कि प्रवर्तन कोर्ट किसी साक्ष्य का फिर से आकलन नहीं कर सकता. 

क्या है मामला 

गौरतलब है कि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने मलेशिया के आर्बिट्रेशन के द्वारा वेदांता लिमिटेड और वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज द्वारा आंध्र प्रदेश के रवा तेल एवं गैस फील्ड के विकास से 49.9 करोड़ डॉलर (करीब 3680 करोड़ रुपये) की लागत वसूली के खिलाफ अपील की थी. सरकार ने इस मामले में सिर्फ 19.8 करोड़ डॉलर (करीब 1460 करोड़ रुपये) की सीमा तय की थी. यह विकास कार्य साल 2000 से 2007 के बीच हुआ था. 

इसके पहले जून महीने के एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों से यथास्थिति बहाल रखने का आदेश दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने वेदांता से यह जवाब मांगा था कि उसे 49.9 करोड़ डॉलर क्यों चाहिये. इसके पहले दिल्ली हाईकार्ट ने भी वेदांता से पहले इस फील्ड पर काम करने वाली केयर्न इंडिया को ज्यादा वसूली के अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ के आदेश को लागू करने की इजाजत दी थी. लेकिन मंत्रालय ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. 

क्या है सरकार का तर्क

सरकार का तर्क था कि ट्राइब्यूनल से सही और गलत दोनों तरह के निर्णय हो सकते हैं और हाईकोर्ट ने इस पर विचार ही नहीं किया. सरकार का तर्क है कि इस बारे में जो कॉन्ट्रैक्ट हुआ है उसमें यह साफ कहा गया है कि केयर्न (अब वेदांता) तय काम करेगी जिसमें 21 कुंओं की खुदाई भी शामिल है और इसके​ लिए उसे अधिकतम 18.89 करोड़ डॉलर और इसका 5 फीसदी अतिरिक्त रकम ही दी जाएगी. लेकिन कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के बाद कंपनी ने गलत आधार पर और मनमाने तरीके से 49.96 करोड़ डॉलर की मांग कर दी.

साल 2008 में शुरू हुआ विवाद 

इस बारे में केयर्न इंडिया और भारत सरकार के बीच समझौता हुआ था. लेकिन साल 2008 में जब विवाद शुरू हुआ तो दोनों पक्ष इसे मलेशिया स्थित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ (arbitration) के पास ले गये. वहां भी भारत सरकार के खिलाफ आदेश दिया गया था. यही नहीं सरकार ने जब इस आदेश के खिलाफ मलेशिया की तीन कोर्ट में अपील की तो वहां भी भारत सरकार की अपील को नामंजूर कर दिया गया. 

किसकी कितनी हिस्सेदारी 

रवा तेल एवं गैस फील्ड में वेदांता के अलावा वीडियोकॉन की हिस्सेदारी थी, लेकिन वीडियोकॉन अब दिवालिया होने का आवेदन कर चुका है जिसकी वजह से उसकी पूरी हिस्सेदारी भी वेदांता को मिल जाएगी. केयर्न के भारतीय कारोबार को वेदांता ने खरीद लिया था और उसके माध्यम से इस तेल एवं गैस फील्ड में वेदांता की 22.5 फीसदी हिस्सेदारी है. इसमें सरकारी कंपनी ONGC की 40 फीसदी और रवा ऑयल की 12.5 फीसदी हिस्सदेारी है. 

 

 

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