छठ पर्व की शुरुआत शनिवार से हो चुकी है. इस व्रत का पहला दिन नहाय खाय होता है. व्रती महिला या पुरुष नदी में स्नान करके (गंगा स्नान का विधान अधिक है) शुद्ध हो जाता है और फिर व्रत का संकल्प करके पूजन के लिए तैयार होता है. पहला दिन शरीर मार्जन का होता है इसलिए सिर्फ एक समय भोजन किया जाता है वह भी सात्विक. इस सात्विक भोज में चना की दाल लौकी की सब्जी और भात शामिल होता है. यही भोजन करके खुद को व्रत के लिए तैयार किया जाता है और सूर्य पूजा के अनुष्ठान की शुरुआत हो जाती है.
संसार की चेतना के आधार हैं सूर्यदेव
सूर्य देव संसार की चेतना के आधार हैं, इसलिए वेदों से लेकर पुराणों तक सूर्य पूजा के कई उल्लेख मिलते हैं. वैदिक ग्रंथों में सूर्य को हिरण्य गर्भ कहा गया है. इस तरह सूर्य को पहला नाम हिरण्यगर्भ मिला जिसमें ब्रह्मांड के समाहित होने की कल्पना की गई है. फिर अलग-अलग पुराणों में अलग-अलग कारणों से सूर्य देव को कई नाम मिले हैं. वेदों में सूर्य को विवस्वान भी कहा गया है. वहीं, ब्रह्मांड पुराण में सूर्य का एक नाम मार्तंड भी लिया गया है. मार्तंड को आप मातृ अंड कह सकते हैं. असल में जब अदिति ने सूर्य उपासना करके उन्हें गर्भ में धारण कर लिया तो वह हर दिन सूर्य देव की उपासना में कठिन व्रत करने लगीं.
देवी अदिति ने ऐसे दिया था सूर्य को जन्म
एक दिन उनके पति कश्यप ऋषि ने उन्हें समझाते हुए कहा कि इतने कठिन व्रत-अनुष्ठान गर्भस्थ शिशु के लिए ठीक नहीं हैं. ऐसे में अदिति ने अंड रूप में गर्भ में पल रहे शिशु को योगबल से बाहर निकाला. वह एक दहकते, सुनहले आग के पिंड के रूप में जन्मे और जब वह जन्मे तो संसार दिव्य प्रकाश से भर गया. इस तेज पिंड से डरकर दैत्य भाग खड़े हुए और स्वर्ग पर देवताओं का अधिकार फिर से हो गया. सूर्य अपने इसी अंडज रूप में आकाश में स्थापित हो गए, जिसका दर्शन हमें हर रोज होता है.
काल का प्रतीक हैं सूर्यदेव
इसी तेज पुंज से निकला मानव रूप ही इंद्र की सभा में सूर्यदेव के रूप में शामिल है, जो कि अलग-अलग कहानियों अलग-अलग किरदारों के रूप में सामने आते हैं. यह सात घोड़े वाले रथ पर सवार हैं. काल यानी समय निर्धारण के प्रतीक हैं. इनके रथ का पहिया ही कालचक्र है. यह दिन-रात के कारण हैं और मौसम, जलवायु, वर्षा के समय और उसकी मात्रा को भी तय करते हैं. वेदों में सूर्य के इसी रूप को विवस्वान नाम भी मिला है.
गीता में भी आता है सूर्यदेव का जिक्र
गीता में भी जब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग का ज्ञान देते हैं तो वह बताते हैं कि मैं पहले भी यह ज्ञान कई लोगों को सिखा चुका हूं और जिन्होंने इसे समझ लिया वह मेरे हो गए, या फिर मेरा स्वरूप पा गए. इसके बाद वह बताते हैं सबसे पहले तो मैंने ये ज्ञान विवस्वान (सूर्य) को दिया. सूर्य ने कर्मयोग मनु को सिखाया और मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु को इसका ज्ञान दिया. अब मैं यही ज्ञान तुम्हें देता हूं. लोगों को सिखा चुका हूं और जिन्होंने इसे समझ लिया वह मेरे हो गए, या फिर मेरा स्वरूप पा गए. इसके बाद वह बताते हैं सबसे पहले तो मैंने ये ज्ञान विवस्वान (सूर्य) को दिया. सूर्य ने कर्मयोग मनु को सिखाया और मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु को इसका ज्ञान दिया. अब मैं यही ज्ञान तुम्हें देता हूं.
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्,
विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्. (श्रीमद भगवद्गीता, 4.1)
विष्णु पुराण में सूर्यवंश की स्थापना
विष्णु पुराण के अनुसार, हरि इच्छा से उनकी नाभि से कमल खिला. इसी कमल में पराग कणों के रूप में ब्रह्मा का विकास हुआ. कमल के मूल में पड़े बीज से शिव की उत्पत्ति हुई. ब्रह्मा के पुत्र मरीचि हुए, मरीचि से कश्यप का जन्म हुआ और कश्यप के पुत्र विवस्वान सूर्य हुए. विवस्वान से मनु का जन्म हुआ. विवस्वान का पुत्र होने के कारण मनु को वैवस्वत मनु कहा जाता है. मनु से इक्ष्वाकु जन्मे और इस तरह कुलों में सबसे कुलीन सूर्य कुल या सूर्यवंश की स्थापना हुई.
यहां एक भ्रम ये हो सकता है कि, मनु का जन्म तो ब्रह्माजी के अंश से हुआ है और उनकी पत्नी शतरूपा हैं तो फिर सूर्य के पुत्र मनु कैसे हुए हैं. असल में समय की गणना, सिर्फ वर्षों और शताब्दियों और युगों तक सीमित नहीं है, बल्कि इनका फैलाव कल्प और मन्वंतर तक हुआ है. हर मन्वंतर के अलग-अलग मनु हुए हैं और ऐसा हो सकता है कि सबके समय-समय में पुराण कथाएं भी अलग-अलग रही हैं. इसकी बानगी राम चरित मानस में भी मिलती हैं, जब शिवजी की पत्नी सती त्रेतायुग में जाकर श्रीराम की परीक्षा लेती हैं, जबकि रामजन्म तब हुआ ही नहीं था. इससे नाराज शिव सती का त्याग कर देते हैं और सती अपने पिता दक्ष के यज्ञ में खुद को भस्म कर लेती हैं.
बाद में इन्हीं सती का जन्म पार्वती के रूप में होता है, जो शिवजी से विवाह करती हैं और खुद कई मौकों पर रामकथा का हिस्सा भी बनती हैं. इसलिए ब्रह्ना के पुत्र मनु और सूर्य के पुत्र मनु को अलग-अलग समझा जा सकता है. फिर भी न समझ आए तो तो यह वैदिक सूक्ति याद रखनी चाहिए, 'एकं सत विप्रः बहुधा वदंति.'
सूर्य देव के अनेक नाम
सूर्य देव के इनके अलावा भी अन्य 12 नाम हैं. उन्होंने दिनकर, भुवनेश्वर, सविता देव, भानु, रवि, आदिपुरुष और आदिदेव नाम से भी जाना जाता है. फिर उन्हें कई तरह के नाम साहित्य और काव्य में भी मिले हैं. जैसे उन्हें संध्यापति भी कहा जाता है. रात्रि का अंत करने के कारण वह दिवारि भी कहलाते हैं और अपनी किरणों से संसार को प्रकाशित करने के कारण उन्हें प्रभाकर भी का जाता है. सूर्य को उनकी असंख्य तेज किरणों के कारण रश्मि मते कहा जाता है. भगवान भुवन भास्कर की सवारी सात घोड़े हैं. सातों घोड़े भगवान सूर्य में हजारों किरणों को समाहित करते हैं. इस कारण इन्हें सप्तसती भी कहा गया है.