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महजबीं बानो से मीना कुमारी तक... फौजिया दास्तानगो की दास्तानगोई में उभर कर आया ट्रेजडी क्वीन का अक्स

रामगढ़ शेखावाटी में आयोजित वेदारण्य हेरिटेज और हीलिंग फेस्टिवल में फौजिया दास्तानगो ने मीना कुमारी की जिंदगी पर आधारित दास्तानगोई प्रस्तुत की. इस सांस्कृतिक कार्यक्रम में कला, संगीत और इतिहास का अनूठा संगम देखने को मिला.

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फौजिया दास्तानो ने मीना कुमारी की दास्तान सुनाकर भावुक कर दिया
फौजिया दास्तानो ने मीना कुमारी की दास्तान सुनाकर भावुक कर दिया

कई दफा ऐसा भी होता है कि अफसाने, सिर्फ अफसानों में नहीं मिलते. अफसाने हर बार किसी की बीती जिंदगी से नहीं बुने जाते.  बाज दफा ऐसा भी हुआ है कि किसी की जिंदगी उसके जीते जी ही अफसाना बन गई हो. वो भी ऐसा अफसाना जिसके गुजर जाने के बाद हर तरफ सफेदी छा जाती है और चारों ओर चुप्पी पसर जाती है. रुपहले-सुनहरे पर्दे पर सितारा बनकर चमकीं 'महज़बीं बानो' की जिंदगी ऐसा ही अफसाना बनकर बीती और जिस रोज वह गुजर गईं, बड़ी खामोशी अपने पीछे एक सफेद चुप्पी छोड़ गईं.

महजबी बानो... शायद आप इस शख्सियत को ऐसे न पहचाने! लेकिन मीना कुमारी को तो पहचानते हैं. ये नाम पढ़ते ही आपके भीतर कितने सारे तराने गूंजने लगे होंगे. 'चलते-चलते, अजीब दास्तां है ये, या फिर रुक जा रात ठहर जा रे चंदा'... इन्हीं सारे तरानों के साथ फौजिया दास्तानगो ने जब मीना कुमारी की दास्तान सुनानी शुरू कीं तो रामगढ़ शेखावाटी की वो पुरानी हवेली न जाने कितने सुरों से भर उठीं.

मौका था रामगढ़ शेखावाटी की मोहर और वेदारण्य हवेली में आयोजित उत्सव वेदारण्य हेरिटेज और हीलिंग फेस्टिवल का. इस दौरान जहां एक और सभ्यता की छांव मिली तो वहीं दूसरी ओर कला की कई विधाओं ने इसमें तमाम रंग भरे. इसी दौरान उत्सव की एक शाम को फौजिया दास्तानगो ने अपने दास्तागोई के हुनर से सजाया. दास्ताने-ए-मीना कुमारी (दास्तान तन्हां चांद की) ने उन्होंने मीना कुमारी की जिंदगी के पन्ने खोलकर रख दिए और सुनने वालों को उनके गम का हमसाझी बना लिया.

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सर्द शाम की बहती हवा गीत और संगीत के साथ मिलकर उस दास्तान के दर्द को वहां मौजूद दिलों पर दर्ज करने लगी. जैसे-जैसे दास्तानगो फौजिया की आवाज कभी नर्म होती, कभी बुलंद, कभी दर्द में डूबती तो कभी वैसे ही उदास जैसी मीना कुमारी की असल जिंदगी थी, सुनने वालों की आखों के आगे मीना कुमारी के साथ जुड़ा ट्रेजडी क्वीन वाला टाइटल आकार लेता जाता.

पैदा होती है मां-बाप के होते हुए भी अनाथ आश्रम की दहलीज पर छोड़ दी गई बच्ची, बाप के प्यार को तरसने वाली बच्ची, सिर्फ पैसों के लालच में फिल्मों में आने वाली लड़की, शादी के बाद शौहर के प्यार को तरसी बेगम और फिर कच्ची ही उम्र में जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर पहुंची एक महान सिने तारिका... आसपास तमाम लोगों की भीड़ होने के बावजूद तनहाई ही जिसकी नियति थी.

फौजिया एक शेर के जरिए इस बात को कहती हैं, 

चांद तन्हा है, आसमा तन्हा,
दिल मिला है कहां-कहां तन्हा।
बुझ गई आस, छुप गया तारा,
थरथराता रहा धुआं तन्हा।

जहां दास्तानगो ने मीना कुमारी की कहानी को शब्द दिए तो वहीं उनकी साथी वैदेही ने अपनी खूबसूरत आवाज से मीना कुमारी के दर्द को सामन रखा. बैजू बावरा फिल्म का गीत 'मोहे भूल गए सांवरिया' एक अनोखी कृति के तौर पर सामने आया और गायिका वैदेही ने रागभैरव में सजे इस गीत को उसी अंदाज में परोसा. 

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बता दें कि पुरानी दिल्ली में जन्मी और पली-बढ़ी फौज़िया उस जगह से आती हैं, जहां कभी 19वीं सदी के अंतिम महान दास्तानगो, मीर बक़ार अली रहे थे. फौजिया कहती हैं कि आज जो दास्तानगोई है वो सिर्फ उस पुराने हुनर की थोड़ी सी ही झलक है. दास्तानगोई तो जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर तफसील से बैठकर हुआ करती थी.

जिनमें एक-एक दास्तानें इतनी लंबी हुआ करती थीं कि कई-कई रोज चला करती थीं. तब जंग के दौर का जिक्र, किसी दूर देश के सफर का जिक्र दास्तानों के विषय हुआ करते थे. आज उन्हीं हुनर को फिर से सजाकर उस परंपरा में नए रंग भरकर उसे लोगों के सामने परोसा जा रहा है. अच्छी बात है कि इस हुनर को लोग काफी पसंद भी कर रहे हैं और नए-नए सब्जेक्ट को दास्तानों के रूप में सुनकर उनकी तारीफ भी कर रहे हैं. इसी से हमें अगली दास्तान पेश करने के लिए हिम्मत मिलती है.

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