तुर्की की UN स्पीच से गायब हुआ 'कश्मीर' का मुद्दा! क्या BRICS में एंट्री की उम्मीद में बदले सुर?

विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्की की यह रणनीति BRICS में शामिल होने की उसकी महत्वाकांक्षा से जुड़ी हो सकती है. तुर्की ब्रिक्स में सदस्यता की कोशिश कर रहा है, और इसके लिए भारत की सहमति महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत इस समूह के संस्थापक सदस्यों में से एक है. अर्दोआन का यह कदम ऐसे समय में उठाया है जब जम्मू-कश्मीर में चुनाव की प्रक्रिया चल रही है.

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तुर्की के राष्ट्रपति तैयप एर्दोआन। (फाइल चित्र/रॉयटर्स) तुर्की के राष्ट्रपति तैयप एर्दोआन। (फाइल चित्र/रॉयटर्स)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 27 सितंबर 2024,
  • अपडेटेड 11:57 AM IST

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने 24 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में अपने संबोधन के दौरान कश्मीर का ज़िक्र नहीं किया. यह पहला मौका है जब सालों बाद अर्दोआन ने संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर के मुद्दे को नहीं उठाया, जो कि पहले कई बार उनके भाषणों का अहम हिस्सा रहा है.

पांच अगस्त 2019 को जब केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर दिया था तो अर्दोआन ने उसी साल सितंबर में संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर का समर्थन किया था और विशेष दर्जा खत्म करने का खुला विरोध किया था. इसके बाद से अर्दोआन हर साल संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर का मुद्दा उठाते रहे, जिस पर पाकिस्तान हमेशा से ही उसकी सराहना करता रहा है. 

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सवाल: क्या तुर्की को BRICS में एंट्री की उम्मीद?
विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्की की यह रणनीति BRICS में शामिल होने की उसकी महत्वाकांक्षा से जुड़ी हो सकती है. तुर्की ब्रिक्स में सदस्यता की कोशिश कर रहा है, और इसके लिए भारत की सहमति महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत इस समूह के संस्थापक सदस्यों में से एक है. अर्दोआन का यह कदम ऐसे समय में उठाया है जब जम्मू-कश्मीर में चुनाव की प्रक्रिया चल रही है और अक्टूबर के अंत में रूस में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन होने वाला है. अपने भाषण में अर्दोआन ने गाज़ा पर संयुक्त राष्ट्र की निष्क्रियता की आलोचना की और इज़राइल पर फिलिस्तीनी क्षेत्र को "दुनिया का सबसे बड़ा बच्चों और महिलाओं का कब्रिस्तान" बनाने का आरोप लगाया.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
तुर्की का ये कदम ग्लोबल वर्ल्ड में चर्चा का विषय है और हर ओर इसके मायने खोजे जाने की कोशिश हो रही है. एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 'थिंक टैंक अटलांटिक काउंसिल में सीनियर फेलो वजाहत एस ख़ान ने तुर्की के इस रुख पर एक वीडियो पोस्ट कर कहा, ''अर्दोआन यूएनजीए के हर भाषण में कश्मीर का ज़िक्र प्रमुखता से करते थे लेकिन इस बार नहीं किया. इन्होंने साइप्रस का ज़िक्र किया, लेबनान और इसराइल का मुद्दा उठाया. सीरिया की बात की. लीबिया के बारे में कहा और यूक्रेन को भी नहीं भूले लेकिन कश्मीर भूल गए.''

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ख़ान कहते हैं कि, ''अर्दोआन ऐसे विश्व नेता थे जो पिछले कई दशकों से कश्मीर का ज़िक्र करते थे लेकिन उन्होंने कश्मीर की उपेक्षा की. तुर्की पाकिस्तान का दोस्त था लेकिन दोस्ती का क्या हुआ? मलेशिया को भी कश्मीर की अब चिंता नहीं है. मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने कहा कि कश्मीर भारत का अंदरूनी मसला है. 

ब्रिक्स में एंट्री ही नहीं, तुर्की की ये भी है महत्वकांक्षा!
अर्दोआन ने ऐसा क्यों किया? इस सवाल के जवाब सऊदी अरब में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद कहते हैं कि, तुर्की अब पॉलिटिकल इस्लाम से पीछा छुड़ाना चाहता है. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, तलमीज़ अहमद कहते हैं कि- अर्दोआन का रुख बदल गया है. पहले वो पॉलिटिकल इस्लाम का समर्थन करते थे, लेकिन आजकल वो पॉलिटकल इस्लाम के नज़रिए से क्षेत्रीय समस्याओं को नहीं देख रहे हैं. ऐसा इसलिए, क्योंकि सऊदी, यूएई और मिस्र पॉलिटिकल इस्लाम का समर्थन नहीं करते हैं और अर्दोआन इन तीनों देशों से संबंध बढ़ा रहे हैं. ऐसे में तुर्की को अपनी पुरानी राजनीति छोड़नी होगी.  वह कहते हैं कि पाकिस्तान के साथ करीबी भी अर्दोआन के पॉलिटिकल इस्लाम के कारण ही है. ऐसे में यह नीति कमजोर होगी तो तुर्की के लिए पाकिस्तान भी बहुत प्रासंगिक नहीं रहेगा. 

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तुर्की ने कब-कब उठाया था कश्मीर का मुद्दा

साल 2023: पिछले साल अर्दोआन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए कश्मीर के बारे में कहा था, ''भारत और पाकिस्तान के बीच सहयोग और संवाद से कश्मीर में शांति आती है तो इससे दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और संपन्नता की राह खुलेगी.''

साल 2022: अर्दोआन ने संयुक्त राष्ट्र की 77वीं आम सभा को संबोधित किया, कहा था ''75 साल पहले भारत और पाकिस्तान दो संप्रभु देश बने लेकिन दोनों मुल्कों के बीच शांति और एकता स्थापित नहीं हो पाई है. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. हम उम्मीद और प्रार्थना करते हैं कि कश्मीर में उचित और स्थायी शांति स्थापित हो.''

साल 2021:  तुर्की ने कहा कि कश्मीर समस्या का समाधान संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के तहत होना चाहिए.

साल 2020: कश्मीर एक ज्वलंत मुद्दा है और 370 हटाने से यह मुद्दा और जटिल हुआ है.

साल 2019: अर्दोआन ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर में नाकाबंदी है. 

इस तरह से देखें तो कश्मीर पर बिल्कुल कड़ा रुख अख्तियार करने वाला तुर्की धीरे-धीरे नरम होता गया और इस साल तो उसने कश्मीर मुद्दे का जिक्र ही नहीं किया. 
 

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