1938 का काला इतिहास और 2026 का संकट... कहानी फ्रांस के उस शहर की जहां हो रहा G-7 समिट

फ्रांस के जिस एवियन शहर में राष्ट्रपति ट्रंप ने इजरायल पर अपनी भड़ास निकाली है, उसी एवियन शहर में साल 1938 में एक बहुत बड़ी कॉन्फ्रेंस हुई थी, जिसे अमेरिका के उस समय के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने बुलाया था.

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क्या है फ्रांस के एवियन शहर का इतिहास. (Photo: Reuters) क्या है फ्रांस के एवियन शहर का इतिहास. (Photo: Reuters)

आजतक ब्यूरो

  • नई दिल्ली,
  • 17 जून 2026,
  • अपडेटेड 7:30 AM IST

इस वक्त दुनिया की नजर फ्रांस के एवियन शहर पर है. यही वो शहर है जो एवियन मिनरल वाटर के लिए फेमस है, लेकिन आज यहां G-7 का वार्षिक शिखर सम्मेलन का आयोजन हो रहा है. यहां अगले कुछ घंटों में PM नरेंद्र मोदी और US राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की द्विपक्षीय मुलाकात होने वाली है.

G-7 के कोर समिट के बाद आउटरीच सेशन में मोदी और ट्रंप आमने-सामने आए. ग्रुप फोटो के बाद जब सभी नेता कन्वेंशन हॉल में आए तो ट्रंप अपनी कुर्सी से खड़े हो गए और मोदी का स्वागत किया. दोनों के बीच कुछ देर बातचीत हुई. ये फरवरी 2025 के बाद दोनों नेताओं की पहली मुलाकात है.

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ये मुलाकात ऐसे वक्त में हो रही है, जब भारत-अमेरिका ट्रेड डील फाइनल होने के करीब है. इस डील से दोनों देशों के बाजार एक-दूसरे के लिए आसान होंगे. जनवरी में भारत ने EU के 27 देशों के साथ Mother of All Deals साइन की है, उसके बाद ये डील और अहम हो गई है.

G-7 में भारत की दावेदारी मजबूत

G-7 यानी अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जर्मनी और जापान का ग्रुप. अक्टूबर 1973 में रमजान के महीने के दौरान इजरायल और अरब देशों के बीच एक युद्ध लड़ा गया था, जिसे रमजान युद्ध भी कहते हैं. इस युद्ध में अमेरिका और ज्यादातर पश्चिमी देशों ने इजरायल का समर्थन किया था और इससे नाराज होकर मिडिल ईस्ट के देशों ने अमेरिका और पश्चिमी देशों को कच्चे तेल की सप्लाई बंद कर दी थी.

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ये उस वक्त का सबसे बड़ा तेल संकट था, जिसने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों को आर्थिक संकट में डाल दिया था. और बाद में इन्हीं देशों को पहले G-6 कहा गया और फिर G-7 कहा गया.

भारत इसका स्थाई सदस्य नहीं है, हर साल अतिथि के तौर पर बुलाया जाता है. लेकिन आंकड़े कुछ और कहानी कहते हैं. 1970 में G-7 की ग्लोबल GDP में 63% हिस्सेदारी थी, 1995 में 66%. आज ये घटकर 44% रह गई है. कनाडा दुनिया में 11वें और इटली 8वें नंबर की अर्थव्यवस्था है, जबकि भारत 6वें नंबर पर है. फिर भी स्थाई सीट नहीं मिली. PM मोदी 2019 से लगातार G-7 समिट में जा रहे हैं.

एक तरफ फ्रांस के एवियन शहर में राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी की 16 महीने बाद मुलाकात हुई. दूसरी तरफ राष्ट्रपति ट्रंप इसी शहर में यूरोप के उन नेताओं से मिल रहे हैं, जिन्होंने उन्हें ईरान युद्ध के दौरान एक नहीं बल्कि कई बार ना कहा.

इनमें ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी हैं, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज हैं. इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी हैं, जापान की प्रधानमंत्री सनाई तकाएची हैं और इस शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहे फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों भी शामिल हैं. ये सारे वो नेता हैं, जिनका ईरान युद्ध में अमेरिका से सीधा टकराव हुआ और इस टकराव में राष्ट्रपति ट्रंप ने इन नेताओं को खूब धमकियां दीं.

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लेकिन इन तमाम रिजेक्शन और ना सुनने के बाद अब राष्ट्रपति ट्रंप इस G7 समिट के जरिए खुद को YES BOSS की भूमिका में लाना चाहते हैं. यहां ये घटनाएं खत्म नहीं होतीं. एवियन से ही ट्रंप इजरायल पर भड़के हुए हैं. कल तक I Love Israel कहने वाले ट्रंप आज G-7 मंच से बोले कि अगर अमेरिका नहीं होता तो इजरायल कब का खत्म हो जाता. इजरायल की सेना से बेहतर तो सीरिया हिज्बुल्ला से लड़ सकता है.

तीन महीने पहले ट्रंप ने ही इजरायल के साथ ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया था. अब वो ईरान डील पर जोर दे रहे हैं, जबकि PM नेतन्याहू साफ कह चुके हैं  कि अमेरिका और इजरायल एक नहीं हैं. डील के बाद भी जंग जारी रहेगी.

क्या इतिहास दोहराएगा एवियन?

फ्रांस के जिस एवियन शहर में राष्ट्रपति ट्रंप ने इजरायल पर अपनी भड़ास निकाली है, उसी एवियन शहर में साल 1938 में एक बहुत बड़ी कॉन्फ्रेंस हुई थी, जिसे अमेरिका के उस समय के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने बुलाया था.

इस कॉन्फ्रेंस का मकसद था यूरोप में रह रहे यहूदियों को हिटलर के ज़ुल्मों से बचाना और उन्हें अपने देशों में शरण देना. उस वक्त इस बैठक में शामिल हुए लगभग सभी देशों ने यहूदियों के प्रति सहानुभूति जताई. लेकिन ज्यादातर देशों ने यहूदी शरणार्थियों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया.

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अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा समेत कई देशों ने अपने इमिग्रेशन कोटे नहीं बढ़ाए. इतिहासकारों का मानना है कि इस सम्मेलन की नाकामी ने हिटलर को ये संदेश दिया कि दुनिया यहूदियों की रक्षा के लिए गंभीर 'कदम' उठाने को तैयार नहीं है और बाद में यही घटनाक्रम The Holocaust की त्रासदी तक पहुंचा.

ये वही त्रासदी थी, जिसमें 60 लाख यहूदी को बेरहमी से मार दिया गया था. और आज इसके 88 साल बाद फिर से इसी एवियन शहर में इजरायल को मिडिल ईस्ट में शांति का दुश्मन घोषित किया जा रहा है.

और ये काम भी वो राष्ट्रपति ट्रंप कर रहे हैं, जिन्होंने खुद 3 महीने पहले इजरायल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ युद्ध की शुरुआत की थी. हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप के हमलों के बाद भी इजरायल ने झुकने से इनकार कर दिया है. प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने साफ शब्दों में कहा है कि अमेरिका और इजरायल एक नहीं है. अमेरिका की ईरान से डील के बाद भी इजरायल की जंग जारी रहेगी.

ट्रंप क्यों भड़क रहे हैं इजरायल पर?

यहां बहुत लोग कह रहे हैं कि अमेरिका और ईरान की डील इजराइल के लिए बुरा सपना बन रही है लेकिन हकीकत में इस खबर का विश्लेषण इतना भी आसान नहीं है.

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अगर इजरायल अमेरिकी दबाव में आकर ईरान डील को स्वीकार कर लेता तो राष्ट्रपति ट्रंप को भड़ास निकालने की जरूरत ही नहीं पड़ती. राष्ट्रपति ट्रंप इसीलिए इजरायल पर भड़के क्योंकि इजरायल ने उनकी बात को नहीं मानी और ये कहा कि ये जंग अब भी जारी रहेगी, चाहे डील हो या ना हो. 

अब परीक्षा तो अमेरिका की है क्योंकि अमेरिका, ईरान के साथ जिस डील पर हस्ताक्षर करने वाला है, उसकी पहली शर्त यही है कि उसे सभी मोर्चों पर युद्ध को खत्म करना होगा और इनमें लेबनान भी शामिल है. अगर अमेरिका ऐसी नहीं कर पाया तो उसे इजरायल से अपने रिश्ते तोड़ने पड़ेंगे और फिर मिडिल ईस्ट के क्षेत्र में इजरायल को अकेले ही ईरान और उसके प्रॉक्सी संगठन का सामना करना होगा. और ये उसके लिए आसान नहीं होगा.

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