कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी लीडर से चीनी राजदूत की मुलाकात, बीजिंग बांग्लादेश में चल रहा कौन सी चाल?

शेख हसीना सरकार ने जमात-ए-इस्लामी को कट्टरपंथी और आतंकी प्रवृत्ति वाला संगठन बताकर इस पर प्रतिबंध लगाया था. मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने 2024 में यह प्रतिबंध हटा लिया था.

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बांग्लादेश में चीनी राजदूत याओ वेन ने ढाका में कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान से मुलाकात की. (Photo: ITG) बांग्लादेश में चीनी राजदूत याओ वेन ने ढाका में कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान से मुलाकात की. (Photo: ITG)

आशुतोष मिश्रा

  • ढाका,
  • 12 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:44 PM IST

बांग्लादेश में चीन के राजदूत याओ वेन ने ढाका में कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के कार्यालय का दौरा किया और संगठन को एक 'सुनियोजित राजनीतिक दल' बताया. याओ वेन ने जमात प्रमुख डॉ. शफीकुर रहमान से मुलाकात की. वर्ष 2010 में बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल में युद्ध अपराध मामलों की सुनवाई शुरू होने के बाद यह पहला अवसर है, जब किसी विदेशी राजनयिक ने जमात-ए-इस्लामी के कार्यालय का दौरा किया है. जमात का कार्यालय लंबे समय तक सील रहा था, जिसे हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार के पतन के बाद फिर से खोला गया.

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इस बैठक को कूटनीतिक और राजनीतिक दृष्टि से अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह बांग्लादेश में आम चुनाव से ठीक एक महीने पहले हुई है. चीनी राजदूत याओ वेन के साथ इस दौरान डिप्टी चीफ ऑफ मिशन (DCM) डॉ. लियू युयिन, पॉलिटिकल डायरेक्टर झांगजिंग, रुकी (रु ची) और नफीसा (लियांग शुइन) भी मौजूद रहीं. बैठक के दौरान दोनों पक्षों के बीच चीन और बांग्लादेश के आपसी हितों से जुड़े विभिन्न राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा हुई.

जमात-ए-इस्लामी की ओर से जारी बयान में कहा गया कि चीन और बांग्लादेश के बीच ऐतिहासिक मित्रता दोनों देशों के लोगों के कल्याण और विकास में लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है. संगठन ने यह भी कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में यह द्विपक्षीय संबंध और अधिक मजबूत हो सकते हैं. दोनों पक्षों ने भविष्य में आपसी सहयोग को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की इच्छा जताई. यह मुलाकात ऐसे समय पर हुई है जब बांग्लादेश में आम चुनाव की तैयारियां अंतिम चरण में हैं.

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जमात-ए-इस्लामी इन चुनावों में शेख हसीना विरोधी छात्र आंदोलन से निकली नेशनल सिटिजन्स पार्टी (NCP) के साथ गठबंधन में हिस्सा ले रही है. हाल ही में जमात समर्थित गठबंधन ने ढाका की जगन्नाथ यूनिवर्सिटी में हुए अहम छात्र संघ चुनाव में भी जीत दर्ज की है, जिसे संगठन अपनी बढ़ती राजनीतिक स्वीकार्यता के रूप में देख रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी माहौल में हुई यह मुलाकात न केवल बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति, बल्कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण संकेत देती है.

हसीना सरकार ने बताया था आतंकी प्रवृत्ति वाला संगठन

जमाए-ए-इस्लामी बांग्लादेश (Jamaat-e-Islami Bangladesh) एक कट्टरपंथी राजनीतिक दल है, जिसकी स्थापना 1941 में मौलाना अबुल आला मौदूदी ने की थी. बांग्लादेश बनने (1971) के बाद यह संगठन देश की राजनीति में सक्रिय रहा. जमात इस्लामी कानून (शरीयत) पर आधारित शासन व्यवस्था का समर्थन करता है. जमाए-ए-इस्लामी बांग्लादेश पर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान का समर्थन करने के आरोप लगे, जिस कारण इसके कई नेताओं पर युद्ध अपराध के मुकदमे चले. बांग्लादेश में 2010 के बाद शुरू हुए वॉर क्राइम ट्रायल्स में जमात के कई वरिष्ठ नेताओं को सजा हुई.

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शेख हसीना सरकार ने इसे 'कट्टरपंथी और आतंकी प्रवृत्ति वाला संगठन' बताते हुए प्रतिबंधित किया था. हसीना सरकार के पतन के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार ने इस प्रतिबंध को हटा लिया, जिसके बाद जमाए-ए-इस्लामी फिर से बांग्लादेश की राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हुआ है. जमात का छात्र संगठन 'इस्लामी छात्र शिबिर' देश के विश्वविद्यालयों में प्रभावशाली माना जाता है. वर्तमान में जमाए-ए-इस्लामी चुनावी राजनीति में वापसी और अंतरराष्ट्रीय संपर्क बढ़ाने की कोशिशों को लेकर चर्चा में है.

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