बस एक गलती! शेख हसीना का तख्तापलट करने वाले छात्र चुनाव में फिसड्डी क्यों रह गए

बांग्लादेश चुनाव में तारिक रहमान की दूरदर्शिता ने BNP को ऐतिहासिक जीत दिलाई. दूसरी तरफ छात्र नेताओं को बताया कि सड़क की ताकत को बैलेट में बदलना आसान नहीं होता. NCP को समझना होगा कि जोश को संगठन में और नारों को वोट में बदलने का हुनर अभी साधना बाकी है.

Advertisement
चुनाव में नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) के चीफ नाहिद इस्लाम को जीत मिली है (फोटो- AFP) चुनाव में नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) के चीफ नाहिद इस्लाम को जीत मिली है (फोटो- AFP)

विष्णु रावल

  • नई दिल्ली,
  • 15 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 3:54 PM IST

राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं. न दोस्त, न दुश्मन. तारिक रहमान ने यह बात समय रहते समझ ली. निर्वासन, मुकदमों और सियासी ठंडेपन के लंबे दौर के बाद उन्होंने धैर्य से अपना खेल बुना. दूसरी तरफ शेख हसीना के तख्तापलट की पटकथा लिखने वाले छात्र नेता, चुनावी अंकगणित में गच्चा खा गए.

अब नतीजा सबके सामने है. बांग्लादेश चुनाव में तारिक की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने रिकॉर्डतोड़ जीत दर्ज की है. वहीं शेख हसीना का तख्तापलट करने वाले छात्रों की नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) फिसड्डी साबित हुई.

Advertisement

300 सीटों वाली इस चुनावी लड़ाई में मतदान 299 सीटों पर हुआ था. एक उम्मीदवार की मृत्यु के कारण एक सीट पर चुनाव टाल दिया गया. वहीं, अदालत ने चटग्राम-3 और चटग्राम-8 सीटों के नतीजे जारी करने पर रोक लगा रखी है.

जारी नतीजों के हिसाब से Bangladesh Nationalist Party ने 212 सीटें जीतीं. दूसरी तरफ Jamaat-e-Islami गठबंधन 77 सीटों पर थम गया. बाकी 8 सीटें ‘अन्य’ के हिस्से में गईं. शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग के चुनाव लड़ने पर रोक थी.

रहमान की जीत से ज्यादा छात्रों की हार के चर्चे

इस पूरे चुनाव में जमात और BNP के अलावा तीसरा चर्चित दल National Citizen Party (NCP) ही थी. बीते साल बने इस राजनीतिक दल ने शेख हसीना के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन किया था, जिसकी वजह से आखिरकार उनकी सरकार गिर गई थी. मोहम्मद यूनुस को बांग्लादेश की कमान मिलने के पीछे भी इस दल का अहम रोल रहा.

Advertisement

माना जा रहा था कि बांग्लादेश चुनाव में भी NCP कमाल कर दिखाएगी. लेकिन बैलेट बॉक्स की भाषा अलग निकली. NCP ने 30 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और जीत मिली सिर्फ छह पर.

पार्टी के बड़े चेहरे नाहिद इस्लाम और हसनत अब्दुल्ला को तो जीत हासिल हुई है, लेकिन ये कामयाबी उतनी बड़ी नहीं रही, जिसकी उम्मीद लगाई जा रही थी.

अब इसके पीछे की वजह तलाशी जा रही है, और सबकी जुबान पर एक ही बात है.... जमात ए इस्लामी का साथ.

पुराने 'दोस्त' से रहमान ने झाड़ा पल्ला, छात्रों ने मिलाया हाथ

जिस जमात-ए-इस्लामी संग हाथ मिलाने का छात्रों की पार्टी को नुकसान हुआ, वो इतिहास में तारिक रहमान की पार्टी BNP की साथी रह चुकी है. लेकिन इस बार तारिक ने जमात से दूरी बनाई रखी, जिसका उनको तगड़ा फायदा हुआ.

NCP के संयोजक नाहिद इस्लाम (बाएं) और जमात-ए-इस्लामी के लीडर शफीकुर रहमान. (AP फोटो)

दरअसल, जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश के बनने से भी पुरानी पार्टी है. 1971 के मुक्ति संग्राम में इसने पाकिस्तान का साथ दिया. इसके मिलिशिया साथी (रजाकार, अल-बद्र और अल-शम्स) ने पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर जुल्म किए. इनमें बुद्धिजीवियों की टारगेटेड हत्याएं, बड़े पैमाने पर रेप और हिंदू माइनॉरिटी का नरसंहार शामिल था. जमात को नरसंहार, बलात्कार और मानवता के खिलाफ अपराध का दोषी तक ठहराया गया.

Advertisement

इसलिए बांग्लादेश बनने के बाद, शेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर रहमान ने इस पर बैन भी लगा दिया था. लेकिन बाद में उनकी हत्या के बाद जब जियाउर रहमान की सत्ता आई. उन्होंने बांग्लादेश के संविधान से धर्मनिरपेक्ष शब्द हटा दिया. इससे धर्म आधारित राजनीतिक दलों को काम करने की इजाजत मिल गई. इसका सीधा फायदा जमात को हुआ.

फिर जमात ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) से हाथ मिला लिया. फिर BNP की सरकारों में मंत्री पद तक हासिल कर लिए. हालांकि, बाद में शेख हसीना के सत्ता में लौटते ही दोबारा जमात पर बैन लगा दिया गया था. फिर जब बीते साल उनका तख्तापलट हुआ, तो जमात की 'हथकड़ियां' फिर खुल गईं. जमात ने कई बार तर्क दिया है कि 1971 के आरोप राजनीतिक हैं और उन्हें अदालत में चुनौती दी गई है.

भारी पड़ी NCP की कैलकुलेशन 

सीटों के बंटवारे पर असहमति, जमात की बदनाम छवि की वजह से BNP ने इस बार जमात को 'दूर से नमस्ते' कर दिया. दूसरी तरफ चुनाव से पहले ही छात्र दल NCP को शक था कि अकेले दम पर लड़ाई लंबी नहीं चलेगी. क्योंकि जमीन पर जोश था, लेकिन संगठन की जड़ें अभी कच्ची थीं. 

मगर सहारा जिस कंधे का चुना गया, वह था Jamaat-e-Islami. यहीं से कहानी में मोड़ आ गया. तब से ही पार्टी के भीतर दरारें दिखने लगीं. नेताओं ने सार्वजनिक असहमति जताई और आखिरकार पार्टी छोड़ दी. वहीं, सबसे ज्यादा असहज वे वोटर्स हुए जो खुद को मध्यमार्गी या प्रगतिशील मानते थे. उनको धर्म की गंदी राजनीति करने वाली जमात का साथ कतई पसंद नहीं आया.

Advertisement

पार्टी के संयोजक नाहिद इस्लाम ने गठबंधन का बचाव किया था. उनका कहना था कि विचारधारा नहीं, चुनावी रणनीति के तहत सोच-समझ कर फैसला लिया गया है. लेकिन उनका ये तर्क शायद वोटर्स के गले नहीं उतरा.

यूनुस से करीबी का हुआ नुकसान?

अब तक ये साफ तौर पर नहीं कहा जा सकता. लेकिन यूनुस से करीबी शायद छात्र दल को नुकसान पहुंचा गई. दरअसल, यूनुस राज में भी बांग्लादेश का कुछ भला नहीं हुआ. सुरक्षा व्यवस्था, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार, महंगाई जैसे मुद्दे चरम पर रहे.

यूनुस सरकार में NCP से जुड़े कुछ छात्र सलाहकार थे. उनमें से दो को तो जमात और BNP ने एकजुट होकर हटवाया तक था. वहीं, यूनुस पर ये भी आरोप लगे कि उन्होंने चुनाव में देरी इसलिए की थी, ताकि NCP को पार्टी के रूप में जमीनी स्तर पर मजबूत होने का वक्त मिल जाए.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement