TMC में बगावत के बीच 'खामोश' हैं शत्रुघ्न सिन्हा! किस बात का कर रहे इंतजार

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद से टीएमसी के एक के बाद एक नेता ममता बनर्जी का साथ छोड़ते जा रहे हैं. टीएमसी टूट की कगार पर खड़ी, लेकिन अभिनेता से नेता बने शत्रुघ्न सिन्हा पूरी तरह खामोशी अख्तियार किए हुए हैं. शत्रुघ्न की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है?

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शत्रुघ्न सिन्हा की खामोशी से टीएमसी में बेचैनी (Photo-TMC) शत्रुघ्न सिन्हा की खामोशी से टीएमसी में बेचैनी (Photo-TMC)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 09 जून 2026,
  • अपडेटेड 1:00 PM IST

पश्चिम बंगाल में मचे घमासान के बीच कोलकाता की कालीघाट से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक सिर्फ एक ही हलचल है कि ममता बनर्जी का अभेद्य किला पूरी तरह से दरक गया है. तृणमूल कांग्रेस विधायकों के बाद सांसदों की खुली बगावत ने 'दीदी' की सियासी जमीन को हिलाकर रख दिया है. 

काकोली घोष दस्तीदार ने बागी तेवर अपना रखा है तो कीर्ति आजाद और महुआ मोइत्रा पूरी तरह ममता बनर्जी के साथ मजबूती से खड़ी हुई है. इस सियासी महाभारत के बीच, एक ऐसी 'खामोशी' है जिसने टीएमसी आलाकमान की रातों की नींद उड़ा रखी है. वो खामोशी बॉलीवुड के 'शॉटगन' और आसनसोल से टीएमसी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा की है. 

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शत्रुघ्न सिन्हा अपने कड़क अंदाज और 'खामोश' डायलॉग से बड़े-बड़ों को चुप करा दिया करते थे, लेकिन टीएमसी में हो रही घटना क्रम पर पूरी तरह मौन हैं. जब टीएमसी दोफाड़ होने की कगार पर खड़ी है तो शत्रुघ्न सिन्हा पर सस्पेंस गहरा गया है कि वो किसके साथ हैं? क्या वह ममता बनर्जी के संकटमोचक बनेंगे या फिर इस उम्र में एक और नया राजनीतिक दांव खेलने की तैयारी में हैं.

शत्रुघ्न सिन्हा की खामोशी के मायने
राजनीति के जानकारों का मानना है कि शत्रुघ्न सिन्हा की यह चुप्पी सामान्य नहीं है. टीएमसी के भीतर मची रार पर जहां पार्टी का हर छोटा-बड़ा नेता अपनी बात रख रहा है, वहीं आसनसोल के सांसद का एक भी आधिकारिक बयान न आना कई बड़े सवाल खड़े करता है. 'शॉटगन' अपने सियासी जीवन के इस पड़ाव पर किसी भी तरह की गुटबाजी या पाला-बदल के खेल से दूर रहना चाहते हैं या फिर वेट एंड वाच मोड में है. 

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शत्रुघ्न सिन्हा अभी तक न ही बागी सांसदों के साथ खड़े नजर आए हैं और न ही टीएमसी के 20 सांसदों के द्वारा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखने वालों में है. टीएमसी सांसदों की बगावत करने वालों में शत्रुघ्न सिन्हा का नाम दूर-दूर तक नहीं है. किसी भी गुट के द्वारा उनके नाम नहीं लिए गए हैं. बागी सांसद काकोली घोष भी उन्हें न अपने साथ बता रही हैं और न ही ममता बनर्जी के साथ हैं. 

शत्रुघ्न सिन्हा को ममता का मिला साथ
शत्रुघ्न सिन्हा का राजनीतिक कद बहुत बड़ा है, वह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं और देश की राजनीति की नब्ज को बखूबी पहचानते हैं. इसीलिए पूरी तरह खामोशी अख्तियार किए हैं. शत्रुघ्न सिन्हा को ममता का साथ, तब मिला था, जब बीजेपी से बाहर हो चुके थे और कांग्रेस में जाकर सियासी ताकत देख चुके थे. 

शत्रुघ्न सिन्हा की एंट्री मार्च 2022 में टीएमसी में हुई थी. बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा बाद में आसनसोल से टीएमसी के सांसद चुने गए. ममता बनर्जी ने साल 2022 के उपचुनाव में आसनसोल लोकसभा सीट से उतारकर बंगाल की राजनीति में स्थापित किया. साल 2024 के लोकसभा चुनाव दोबारा से जीतने में सफल रहे. 

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ममता बनर्जी ने गैर-बंगाली नेता को पार्टी के भीतर जो सम्मान और राजनीतिक तरजीह दी, जिसके चलते ही शत्रुघ्न सिन्हा फिलहाल किसी तरह से बागी गुट के साथ नहीं खड़े दिख रहे. शत्रुघ्न सिन्हा को आसनसोल जैसी हिंदी भाषी बहुल सीट से टिकट दिया गया, जहां उन्होंने रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की. 

शत्रुघ्न सिन्हा के सामने सियासी विकल्प
शत्रुघ्न सिन्हा के सामने राजनीतिक बिसात पर तीन बड़े रास्ते खुले हैं. वह फूंक-फूंककर अपना अगला कदम तय कर रहे हैं. शत्रुघ्न सिन्हा को राजनीतिक रूप से दोबारा ममता बनर्जी ने सियासी संजीवनी दी है. आसनसोल सीट से संसद भेजने का पूरा श्रेय ममता बनर्जी को जाता है. एक विकल्प यह है कि वह अपनी पुरानी छवि के अनुरूप वफादारी का रास्ता चुनें और इस मुश्किल वक्त में ममता बनर्जी के साथ मजबूती से खड़े रहकर बागियों को कड़ा संदेश दें. 

पार्टी के भीतर एकतरफा फैसलों से जो 14 सांसद नाराज चल रहे हैं, उनकी शिकायतें नई नहीं हैं. सूत्रों का कहना है कि टीएमसी के भीतर कुछ सांगठनिक बदलावों और फैसलों से शत्रुघ्न सिन्हा भी पूरी तरह सहज नहीं थे. दल-बदल कानून के तहत संसद में अपनी सदस्यता बचाने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत है, ऐसे में शत्रुघ्न सिन्हा बागियों के साथ जाते हैं तो उन्हें सत्ता के साथ रहने का लाभ मिल सकता है, लेकिन इस उम्र में बागी गुट का नेतृत्व स्वीकार करेंगे?

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शत्रुघ्न सिन्हा का पुराना रिश्ता बीजेपी से रहा है. भले ही पीएम मोदी और अमित शाह की के खिलाफ जाकर बीजेपी छोड़ी थी, लेकिन बीजेपी में आज भी उनके कई पुराने मित्र मौजूद हैं. राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट है कि बंगाल में बीजेपी इस बगावत पर बारीक नजर रखे हुए है. हालांकि, शत्रुघ्न सिन्हा के लिए दोबारा बीजेपी का रुख करना वैचारिक रूप से मुश्किल हो सकता है, लेकिन राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं होता.

'गूगली' खेलने की तैयारी में क्या शत्रुघ्न!
महुआ मोइत्रा से लेकर कल्याण बनर्जी लगातार यह कह रही हैं कि बंगाल की जनता गद्दारों को माफ नहीं करती. ऐसे में शत्रुघ्न सिन्हा के कोई भी बयान सामने नहीं आया है. टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व की धड़कनें इसलिए बढ़ी हैं क्योंकि वे जानते हैं कि अगर शत्रुघ्न सिन्हा ने अपनी खामोशी तोड़ी और वह बागी गुट के पक्ष में खड़े हो गए, तो ममता बनर्जी के लिए इस बगावत को कुछ असंतुष्टों की साजिश बताकर खारिज करना नामुमकिन हो जाएगा.

'शॉटगन' की एक आवाज दिल्ली से लेकर कोलकाता तक की राजनीति का पासा पलट सकती है. अब देखना यह होगा कि जब शत्रुघ्न सिन्हा अपनी खामोशी तोड़ेंगे, तो उनका पहला 'शॉट' किस तरफ लगेगा. नजरें आसनसोल के इस दिग्गज के अगले कदम पर टिकी हैं. 
 

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