UP Election 2027: यूपी चुनाव से पहले ओवैसी की सियासी दस्तक, जानिए किसके वोट बैंक में लगेगी सेंध

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तपिश अभी से महसूस होने लगी है. AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने बहराइच के मटेरा इलाके का रुख कर अपने सियासी इरादे जाहिर कर दिए हैं.

Advertisement
सवाल यह भी है कि आखिर ओवैसी ने अपने अभियान की शुरुआत के लिए बहराइच के मटेरा को ही क्यों चुना? (Photo: ITG) सवाल यह भी है कि आखिर ओवैसी ने अपने अभियान की शुरुआत के लिए बहराइच के मटेरा को ही क्यों चुना? (Photo: ITG)

आजतक ब्यूरो

  • लखनऊ,
  • 14 जून 2026,
  • अपडेटेड 6:00 PM IST

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी शतरंज की बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है. 2027 विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपने-अपने मोहरे चलने शुरू कर दिए हैं. इसी कड़ी में AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने बहराइच के मटेरा से अपनी राजनीतिक मौजूदगी का बड़ा संकेत दिया है.

हैदराबाद से निकले ओवैसी का यह दौरा सिर्फ एक रैली भर नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीतिक तस्वीर में नई संभावनाओं और नए समीकरणों की तलाश के रूप में देखा जा रहा है.

Advertisement

बहराइच का नाम आते ही इतिहास, आस्था और राजनीति एक साथ सामने आ जाते हैं. यही वह इलाका है जहां महाराजा सुहेलदेव और सैयद सालार मसूद गाजी की कहानी आज भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाती है. ऐसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में ओवैसी की रैली ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं.

यह भी पढ़ें: ममता का सांसद सयानी घोष और सुदीप बंदोपाध्याय पर सख्त एक्शन, TMC के अहम पदों से हटाया

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश का मुस्लिम मतदाता केवल पारंपरिक दलों के साथ रहेगा या फिर अपनी अलग राजनीतिक आवाज तलाशने की कोशिश करेगा?

मटेरा में आयोजित जनसभा में ओवैसी ने साफ संकेत दिया कि AIMIM उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में चुनाव लड़ेगी. उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी गठबंधन के विकल्पों पर काम कर रही है और उचित समय पर इसकी घोषणा की जाएगी. ओवैसी का यह बयान ऐसे समय आया है जब समाजवादी पार्टी अपने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक गठबंधन को मजबूत करने में जुटी हुई है.

Advertisement

ओवैसी की एंट्री ने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है. क्या AIMIM मुस्लिम राजनीति में अपनी अलग जगह बना पाएगी? क्या समाजवादी पार्टी के PDA वोट बैंक में सेंध लगेगी? या फिर इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिलेगा? यही सवाल अब राजनीतिक विश्लेषण का केंद्र बन चुके हैं.

उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने ओवैसी पर हमला बोलते हुए कहा कि वे धर्म और जाति के आधार पर राजनीति करते हैं. उनके मुताबिक, ऐसी राजनीति की उत्तर प्रदेश में कोई जमीन नहीं है और भाजपा 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' के सिद्धांत पर काम करती है. भाजपा का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जनता का विश्वास उसके साथ है.

हालांकि AIMIM इस पूरे अभियान को संगठन विस्तार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की लड़ाई के रूप में पेश कर रही है. पार्टी का तर्क है कि मुस्लिम समाज को अपनी राजनीतिक भागीदारी और नेतृत्व के सवाल पर नए विकल्पों की जरूरत है. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में AIMIM लगातार अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश कर रही है.

यह भी पढ़ें: असम में 18+ उम्र वालों का नहीं बनेगा आधार, सीएम हिमंता का फैसला, कहा- अवैध बांग्लादेशी को कार्ड न मिल पाए

Advertisement

अगर विधानसभा सीटों के सामाजिक समीकरण देखें तो उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यीय विधानसभा में लगभग 143 सीटें ऐसी मानी जाती हैं जहां मुस्लिम मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. इनमें करीब 70 सीटों पर मुस्लिम आबादी 20 से 30 प्रतिशत के बीच है, जबकि 73 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से अधिक है. इनमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल के कई इलाके शामिल हैं.

इसी सामाजिक गणित को देखते हुए ओवैसी की राजनीति को समझने की कोशिश की जा रही है. हालांकि समाजवादी पार्टी फिलहाल इसे कोई बड़ी चुनौती मानने को तैयार नहीं है. पार्टी नेताओं का कहना है कि PDA का सामाजिक आधार मजबूत है और ओवैसी की राजनीति का असर सीमित रहेगा.

चुनावी आंकड़े भी फिलहाल समाजवादी पार्टी के दावों को कुछ हद तक मजबूती देते हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 38 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली. उसका वोट शेयर सिर्फ 0.24 प्रतिशत रहा. इसके बाद 2022 विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 95 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन नतीजा फिर वही रहा. पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी और उसका वोट शेयर 0.49 प्रतिशत पर पहुंचा.

इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि चुनावी राजनीति केवल जीत और हार के आंकड़ों से नहीं चलती. कई बार लगातार चुनाव लड़ना, संगठन खड़ा करना और सामाजिक आधार बनाना भी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा होता है. संभव है कि ओवैसी उत्तर प्रदेश में इसी तरह की राजनीति कर रहे हों.

Advertisement

अब सवाल यह भी है कि आखिर ओवैसी ने अपने अभियान की शुरुआत के लिए बहराइच के मटेरा को ही क्यों चुना? इसके पीछे कई राजनीतिक और सामाजिक कारण बताए जा रहे हैं. मटेरा विधानसभा क्षेत्र मुस्लिम बहुल सीट माना जाता है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 45 प्रतिशत है. यह सीट पिछले तीन चुनावों से समाजवादी पार्टी के कब्जे में है और वर्तमान में यहां से मरिया शाह विधायक हैं.

दूसरा बड़ा कारण बहराइच का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है. 11वीं शताब्दी में श्रावस्ती के राजा महाराजा सुहेलदेव और महमूद गजनवी के भांजे सैयद सालार मसूद गाजी के बीच यहीं युद्ध हुआ था. इस युद्ध में महाराजा सुहेलदेव ने सालार मसूद को पराजित किया था. बाद में सालार मसूद की मजार भी इसी क्षेत्र में स्थापित हुई. मटेरा और आसपास के इलाकों में आज भी सालार मसूद गाजी की दरगाह का प्रभाव देखा जाता है. ऐसे में यह इलाका राजनीतिक और प्रतीकात्मक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी भी इस पूरे घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रखे हुए है. कारण साफ है. अगर विपक्षी वोटों में बंटवारा होता है तो उसका सीधा फायदा बीजेपी को मिल सकता है. यही वजह है कि बीजेपी नेताओं का दावा है कि ओवैसी की राजनीति अंततः विपक्ष को ही नुकसान पहुंचाएगी.

Advertisement

फिलहाल 2027 का चुनाव दूर है, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में माहौल बनना शुरू हो चुका है. कई बार एक रैली, एक बयान या एक प्रतीकात्मक यात्रा आने वाले चुनाव की दिशा तय कर देती है. ओवैसी की बहराइच रैली ने भी कुछ ऐसा ही असर पैदा किया है. अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि AIMIM कितनी सीटें जीतेगी, बल्कि यह है कि उत्तर प्रदेश की चुनावी लड़ाई में असदुद्दीन ओवैसी किसके वोट बैंक को सबसे ज्यादा प्रभावित करेंगे.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »