कभी मिडिल ईस्ट और खाड़ी देश भारत का हिस्सा था. यह सुनकर थोड़ी हैरानी होगी, लेकिन यमन, बहरीन, ओमान, यूएई, ये सभी इलाके ब्रिटिश इंडिया के अंदर आते थे और मिडल ईस्ट के ये देश भारत के बॉम्बे प्रांत का हिस्सा माने जाते थे. इन देशों में 1960 के दशक तक भारतीय रुपये चलते थे. ब्रिटेन से आजादी मिलने के बाद तक इन देशों में भारतीय रुपये का दबदबा था.
बीबीसी रिपोर्ट के मुताबिक, अदन से कुवैत तक फैले अरब संरक्षित इलाके पर दिल्ली से शासन किया जाता था, जिसकी देखरेख भारतीय राजनीतिक सेवा द्वारा की जाती थी. भारतीय सैनिकों द्वारा पुलिसिंग की जाती थी और जो भारत के वायसराय के प्रति जवाबदेह थे.
आधुनिक यमन के अदन तक भारतीय पासपोर्ट जारी किए जाते थे, जो भारत के सबसे पश्चिमी बंदरगाह के रूप में कार्य करता था और बॉम्बे प्रांत के हिस्से के रूप में प्रशासित था. जब महात्मा गांधी ने 1931 में इस शहर का दौरा किया, तो उन्होंने पाया कि कई युवा अरब खुद को भारतीय राष्ट्रवादी मानते थे.
सबसे पहले अदन ही भारत से अलग हुआ था
1920 के दशक तक, राजनीति में बदलाव आने लगा था. भारतीय राष्ट्रवादियों ने भारत को एक साम्राज्यवादी संरचना के रूप में नहीं, बल्कि महाभारत की भौगोलिक पृष्ठभूमि से जुड़े एक सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में देखना शुरू कर दिया था. इसलिए ब्रिटिश प्रशासन ने एक बार भी से सीमाएं तय करने का फैसला किया और 1 अप्रैल 1937 को सबसे पहला साम्राज्यवादी विभाजन अदन का हुआ. अंग्रेजों ने अदन को भारत से अलग कर दिया.
तब किंग जॉर्ज VI का एक टेलीग्राम जोर से पढ़ा गया - लगभग 100 वर्षों तक अदन ब्रिटिश भारतीय प्रशासन का अभिन्न अंग रहा है. मेरे भारतीय साम्राज्य के साथ वह राजनीतिक संबंध अब टूट जाएंगे, और अदन मेरे औपनिवेशिक साम्राज्य का हिस्सा बनेगा. इसका मतलब था कि अंग्रेजों ने काफी पहले से भारतीय सीमाओं को छोटा करना शुरू कर दिया था. क्योंकि, अगर पूरे ब्रिटिश इंडियन स्टेट को आजादी दी जाती तो आज कई खाड़ी देश भारत का हिस्सा होते.
हालांकि, यह खाड़ी क्षेत्र अगले एक दशक तक भारत सरकार के अधिकार क्षेत्र में ही रहा. जब भारत के विभाजन की बात हो रही थी तब ब्रिटिश अधिकारियों ने इस मुद्दे पर चर्चा की थी कि स्वतंत्रता के बाद भारत या पाकिस्तान में से किसे फारस की खाड़ी का संचालन सौंपा जाए. लेकिन, दोनों ही देशों में से किसी को ये जिम्मेदारी नहीं दी गई. आखिरकार, ब्रिटिश राज के भारत और पाकिस्तान में विभाजित होने और स्वतंत्रता प्राप्त करने से कुछ महीने पहले, दुबई से लेकर कुवैत तक के खाड़ी राज्य अंततः 1 अप्रैल 1947 को भारत से अलग हो गए.
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महीनों बाद, जब भारतीय और पाकिस्तानी अधिकारियों ने सैकड़ों रियासतों को नए राष्ट्रों में शामिल करने का काम शुरू किया, तो खाड़ी के अरब राज्य इस सूची से गायब थे. तब कुछ ही लोगों ने इस पर ध्यान दिया और आज भी इतने साल बाद, भारत या खाड़ी देशों में से किसी में भी उस समय हुई इस घटना के महत्व को पूरी तरह से समझा नहीं गया.
कई खाड़ी देशों में चलता था भारतीय रुपया
भारत से अलग होने के बाद भी कई सालों तक खाड़ी देशों में भारतीय रुपया ही चलता था. 1960 के दशक तक यमन, दुबई, कतर, कुवैत जैसे राज्यों में भारतीय रुपया चलता था. तब ये इलाके भारत से अलग हो चुके थे और ब्रिटिश राज के अधीन भी नहीं थे. लेकिन, पूरी तरह से संप्रभु भी नहीं हुए थे. तब इन देशों में दीनार और रियाल नहीं चलते थे. इन देशों की आधिकारिक मुद्रा भारतीय रुपया ही थी.
भारत की आजादी के बाद भी खाड़ी क्षेत्र में भारतीय रुपया चलता था. भारतीय रिजर्व बैंक खाड़ी क्षेत्र के लिए अलग से गल्फ रुपया छापती थी. इस तरह यमन में 1951 तक भारतीय रुपया ही आधिकारिक मुद्रा थी. दुबई में 1966 तक भारतीय रुपया चलता था.
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