कभी बॉम्बे का ही हिस्सा था यमन... वहां आजादी के बाद भी चलते थे भारत के नोट!

खाड़ी देश कभी ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा हुआ करते थे. ट्रूशियल स्टेट कहा जाता था. इन अरब राज्यों का प्रशासनिक हेडक्वार्टर एक तरह से भारत था. यमन के अदन तक का इलाका भारत के बॉम्बे प्रांत का हिस्सा था.

Advertisement
अदन कभी भारत के बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा हुआ करता था (Photo - Pexels) अदन कभी भारत के बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा हुआ करता था (Photo - Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 17 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 1:42 PM IST

कभी मिडिल ईस्ट और खाड़ी देश भारत का हिस्सा था. यह सुनकर थोड़ी हैरानी होगी, लेकिन यमन, बहरीन, ओमान, यूएई, ये सभी इलाके ब्रिटिश इंडिया के अंदर आते थे और मिडल ईस्ट के ये देश भारत के बॉम्बे प्रांत का हिस्सा माने जाते थे. इन देशों में 1960 के दशक तक भारतीय रुपये चलते थे. ब्रिटेन से आजादी मिलने के बाद तक इन देशों में भारतीय रुपये का दबदबा था. 

Advertisement

बीबीसी रिपोर्ट के मुताबिक, अदन से कुवैत तक फैले अरब संरक्षित इलाके पर दिल्ली से शासन किया जाता था, जिसकी देखरेख भारतीय राजनीतिक सेवा द्वारा की जाती थी. भारतीय सैनिकों द्वारा पुलिसिंग की जाती थी और जो भारत के वायसराय के प्रति जवाबदेह थे.

आधुनिक यमन के अदन तक भारतीय पासपोर्ट जारी किए जाते थे, जो भारत के सबसे पश्चिमी बंदरगाह के रूप में कार्य करता था और बॉम्बे प्रांत के हिस्से के रूप में प्रशासित था. जब महात्मा गांधी ने 1931 में इस शहर का दौरा किया, तो उन्होंने पाया कि कई युवा अरब खुद को भारतीय राष्ट्रवादी मानते थे.

सबसे पहले अदन ही भारत से अलग हुआ था 
1920 के दशक तक, राजनीति में बदलाव आने लगा था. भारतीय राष्ट्रवादियों ने भारत को एक साम्राज्यवादी संरचना के रूप में नहीं, बल्कि महाभारत की भौगोलिक पृष्ठभूमि से जुड़े एक सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में देखना शुरू कर दिया था. इसलिए ब्रिटिश प्रशासन ने एक बार भी से  सीमाएं तय करने का फैसला किया और 1 अप्रैल 1937 को सबसे पहला साम्राज्यवादी विभाजन अदन का हुआ. अंग्रेजों ने अदन को  भारत से अलग कर दिया.

Advertisement

तब किंग जॉर्ज VI का एक टेलीग्राम जोर से पढ़ा गया - लगभग 100 वर्षों तक अदन ब्रिटिश भारतीय प्रशासन का अभिन्न अंग रहा है. मेरे भारतीय साम्राज्य के साथ वह राजनीतिक संबंध अब टूट जाएंगे, और अदन मेरे औपनिवेशिक साम्राज्य का हिस्सा बनेगा. इसका मतलब था कि अंग्रेजों ने काफी पहले से भारतीय सीमाओं को छोटा करना शुरू कर दिया था. क्योंकि, अगर पूरे ब्रिटिश इंडियन स्टेट को आजादी दी जाती तो आज कई खाड़ी देश भारत का हिस्सा होते. 

हालांकि, यह खाड़ी क्षेत्र अगले एक दशक तक भारत सरकार के अधिकार क्षेत्र में ही रहा. जब भारत के विभाजन की बात हो रही थी तब ब्रिटिश अधिकारियों ने इस मुद्दे पर चर्चा की थी कि स्वतंत्रता के बाद भारत या पाकिस्तान में से किसे फारस की खाड़ी का संचालन सौंपा जाए. लेकिन, दोनों ही देशों में से किसी को ये जिम्मेदारी नहीं दी गई.  आखिरकार, ब्रिटिश राज के भारत और पाकिस्तान में विभाजित होने और स्वतंत्रता प्राप्त करने से कुछ महीने पहले, दुबई से लेकर कुवैत तक के खाड़ी राज्य अंततः 1 अप्रैल 1947 को भारत से अलग हो गए.

यह भी पढ़ें: किम जोंग उन की पार्टियों में अंदर क्या होता था? बॉडीगार्ड ने बताया सीक्रेट

महीनों बाद, जब भारतीय और पाकिस्तानी अधिकारियों ने सैकड़ों रियासतों को नए राष्ट्रों में शामिल करने का काम शुरू किया, तो खाड़ी के अरब राज्य इस सूची से गायब थे. तब कुछ ही लोगों ने इस पर ध्यान दिया और आज भी इतने साल बाद, भारत या खाड़ी देशों में से किसी में भी उस समय हुई इस घटना के महत्व को पूरी तरह से समझा नहीं गया.

Advertisement

कई खाड़ी देशों में चलता था भारतीय रुपया
भारत से अलग होने के बाद भी कई सालों तक खाड़ी देशों में भारतीय रुपया ही चलता था. 1960 के दशक तक यमन, दुबई, कतर, कुवैत जैसे राज्यों में भारतीय रुपया चलता था. तब ये इलाके भारत से अलग हो चुके थे और ब्रिटिश राज के अधीन भी नहीं थे. लेकिन, पूरी तरह से संप्रभु भी नहीं हुए थे. तब इन देशों में दीनार और रियाल नहीं चलते थे. इन देशों की आधिकारिक मुद्रा भारतीय रुपया ही थी.

भारत की आजादी के बाद भी खाड़ी क्षेत्र में भारतीय रुपया चलता था. भारतीय रिजर्व बैंक खाड़ी क्षेत्र के लिए अलग से गल्फ रुपया छापती थी. इस तरह यमन में 1951 तक भारतीय रुपया ही आधिकारिक मुद्रा थी. दुबई में 1966 तक भारतीय रुपया चलता था. 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »