15 अगस्त से नीदरलैंड और बेल्जियम में हॉकी विश्व कप शुरू होगा. भारतीय टीम एक बार फिर पदक जीतने के इरादे से उतरेगी. खिलाड़ियों के हाथों में तिरंगा होगा, करोड़ों भारतीय उनकी जीत की दुआ करेंगे. लेकिन इस बार विश्व कप में एक ऐसी खामोशी भी होगी, जिस पर शायद ही किसी की नजर जाए.
28 साल बाद पहली बार विश्व कप में एक भी भारतीय अंपायर या तकनीकी अधिकारी नहीं होगा.
यह सिर्फ एक नाम के छूट जाने की कहानी नहीं है. यह उस विरासत के खो जाने की कहानी है, जिसे भारतीय अंपायरों ने दशकों की मेहनत से बनाया था.
एक दौर था, जब भारतीय अंपायरों की सीटी पर दुनिया के सबसे बड़े मुकाबलों का फैसला होता था. अमरजीत सिंह बावा, तरलोक सिंह भुल्लर, सतिंदर शर्मा और आरवी रघु प्रसाद जैसे नाम विश्व हॉकी में सम्मान के साथ लिए जाते थे. यूरोपीय देशों के दबदबे के बीच उन्होंने अपनी निष्पक्षता और क्षमता से अलग पहचान बनाई थी.
लेकिन 2026 का विश्व कप भारतीय अंपायरिंग के लिए एक कड़वी हकीकत लेकर आया है. खिलाड़ियों के दम पर भारत विश्व हॉकी की महाशक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है, मगर अंपायरिंग में उसका प्रतिनिधित्व पूरी तरह खत्म हो गया है.
पूर्व अंतरराष्ट्रीय अंपायर आरवी रघु प्रसाद कहते हैं कि बड़े टूर्नामेंटों में चयन केवल नाम से नहीं होता. इसके लिए प्रो लीग और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार अच्छा प्रदर्शन करना पड़ता है. सवाल यह है कि भारतीय अंपायरों को वह मंच ही कितना मिल रहा है, जहां वे खुद को साबित कर सकें?
सतिंदर शर्मा याद करते हैं कि उन्होंने और उनके पूर्ववर्तियों ने यूरोप के बीच जाकर अपनी पहचान बनाई थी. बीजिंग ओलंपिक 2008 में भारतीय टीम क्वालिफाई नहीं कर सकी थी, लेकिन वह अकेले भारतीय अधिकारी के रूप में वहां मौजूद थे. आज स्थिति उलट गई है. टीम विश्व कप में है, लेकिन अंपायरिंग में भारत का नाम नहीं है.
हैरानी की बात यह है कि हॉकी इंडिया की सूची में पुरुष और महिला वर्ग मिलाकर सैकड़ों अंपायर और तकनीकी अधिकारी दर्ज हैं. इसके बावजूद एफआईएच पैनल तक पहुंचने वाले भारतीयों की संख्या बेहद कम है. यानी समस्या संख्या की नहीं, गुणवत्ता, एक्सपोजर और दीर्घकालिक योजना की है.
पूर्व अंपायरों का मानना है कि घरेलू प्रतियोगितियों में सीटी बजाने और विश्व हॉकी में फैसले लेने के बीच बहुत बड़ा अंतर है. अगर भारतीय अंपायरों को प्रो लीग और बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों का अनुभव नहीं मिलेगा, तो वे एफआईएच के चयन मानकों तक कैसे पहुंचेंगे?
... लेकिन कहानी सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती
इस पेशे का दूसरा चेहरा और भी कठिन है. खिलाड़ियों को शानदार प्रदर्शन के बाद सरकारी नौकरी, पुरस्कार और आर्थिक सुरक्षा मिल जाती है. वहीं अंपायरों के हिस्से अक्सर सिर्फ जुनून आता है. कभी 20 रुपये रोज भत्ते से शुरुआत करने वाले अमरजीत सिंह बावा बताते हैं कि अंपायरों को सम्मान दिलाने के लिए भी लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी. एक समय ऐसा था, जब उन्हें पदक या स्मृति-चिह्न तक नहीं दिए जाते थे.
रघु प्रसाद की बात सबसे ज्यादा चुभती है. करीब 200 अंतरराष्ट्रीय मैचों में अंपायरिंग करने के बाद भी उन्हें संन्यास के बाद निजी नौकरी की तलाश करनी पड़ी. उनका सवाल सीधा है- 'ऐसे हालात में कोई मां-बाप अपने बच्चे को अंपायर क्यों बनाना चाहेंगे?' शायद यही भारतीय हॉकी की सबसे बड़ी चिंता है.
अगर इस पेशे में सम्मान, आर्थिक सुरक्षा और स्पष्ट करियर नहीं होगा, तो नई पीढ़ी क्यों आएगी? और जब नई पीढ़ी नहीं आएगी, तो विश्व कप जैसे मंचों पर भारत की सीटी कैसे सुनाई देगी?
भारत 2036 ओलंपिक की मेजबानी का सपना देख रहा है. खेल महाशक्ति बनने की बात कर रहा है. लेकिन खेल की असली ताकत सिर्फ खिलाड़ी नहीं होते. अच्छे कोच, तकनीकी अधिकारी और विश्वस्तरीय अंपायर भी किसी खेल संस्कृति की पहचान होते हैं.
इस बार विश्व कप में भारत गोल करेगा, जीत भी सकता है. मगर एक आवाज ऐसी होगी, जो सुनाई नहीं देगी- वो है भारतीय सीटी की आवाज.
इनपुट- PTI
आजतक स्पोर्ट्स डेस्क